अलविदा जन-जन के लाड़ले अटल जी, अनूठे थे उनके तेवर


आज का दिन अत्यंत दुख से सराबोर है। जन-जन के लाड़ले हमारे पूर्व प्रधानमंत्री बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। वे कवि थे, राजनेता थे, साहित्यकार थे, पत्रकार थे।
सबसे बड़ी बात यह कि वे मानवीय गुणों से भरपूर एक उच्च कोटि के इंसान थे।

हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में राष्ट्रीय ख्‍याति प्राप्त करने वाले अटलजी ने सन 1950 ई. में 'दैनिक स्वदेश' के संपादक का कार्यभार संभाला। जिस दिन इसका उद्‍घाटन कार्यक्रम संपन्न हुआ वह लखनऊ शहर के लिए एक ऐतिहासिक दिन था। हिन्दी पत्रकारिता के दधीचि संपादकाचार्य पं. अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी के साथ-साथ प्रख्यात विद्वान डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी भी वहाँ उपस्थित थे। लखनऊ के ही नहीं, प्रदेश के अनेक विद्वान, कवि, साहित्यकार, राष्ट्रभाषा-प्रेमी अर राष्ट्रभक्त वहाँ बड़े उत्साह से आए थे। पत्र कुछ दिन तक जोर-शोर से निकलता रहा। आर्थिक संकट धीरे-धीरे पत्र को घेरने लगे। सरकारी विज्ञापन मिलते ही नहीं थे। बड़े दुखी मन से अटलजी को इसे बंद करना पड़ा। अपने अंतिम संपादकीय 'अलविदा' में उन्होंने मन की पीड़ा को व्यक्त किया है।

लखनऊ से अटल जी दिल्ली चले आए। वहां उन्होंने 'वीर अर्जुन' के संपादक का दायित्व संभाला। अनुभव की परिपक्वता, विचारों की गंभीरता और भाषा की स्पष्टता ने 'वीर अर्जुन' की ख्‍याति बढ़ा दी। इस पत्र के संपादकीय की दिल्ली के बुद्धिजीवियों और राष्ट्रीय राजनेताओं में खूब चर्चा होती थी। अटल जी की कलम में कुछ ऐसा जादू रहा कि पत्र की प्रति हाथ में आते ही लोग पहले संपादकीय पढ़ते थे, बाद में समाचार आदि। आज भी वे जो कुछ लिखते हैं, वह औरों से भिन्न और चिंतनपरक होता है। उन्होंने कलम की साधना की है, ग्रंथों का अनुशीलन किया है।

जनसंघ के संस्थापक सदस्य
जनसंघ के संस्थापक सदस्य होने के नाते अटल जी के कंधों पर अब गुरुतर भार आ गया। भारतीय मनीषा के आचार्य, राष्ट्रीय मान-सम्मान के संरक्षक पूज्य डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को एक ऐसे कर्मठ, निष्ठावान और भारतीय संस्कृति के ज्ञाता को अपने निजी सचिव के रूप में रखने की आवश्यकता प्रतीत हुई। उन्होंने उन सभी गुणों और संभावनाओं को तरुण अटल में भाँप लिया और अपने निजी सचिव के रूप में रख लिया। अटलजी महान नेता डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी के साथ छाया की तरह लगे रहे। उनके व्याख्यानों के आयोजन का प्रबंध अटलजी ही करते थे।

डॉ. मुखर्जी की सभाओं में जनता का मेला उमड़ता था। अटलजी भी इन सभाओं को संबोधित करते थे। उनके व्याख्यानों की शैली डॉ. मुखर्जी को बहुत पसंद थी। अपना हाथ हवा में लहराते हुए, विनोदपूर्ण शैली में जब वे चुटीले व्यंग्य करते थे, तो तालियों की गड़गड़ाहट से सभास्थल गूँज उठता था। अब अटलजी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बन गई।

राजनीति में प्रवेश
कवि और पत्रकार अटल जी सक्रिय राजनीति में आ गए। सन 1955 में श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित ने लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। वे लखनऊ से सांसद थीं। चुनाव की तिथि घोषित हुई। अटलजी जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में कूद पड़े, किंतु साधनहीनता के कारण वे विजयी न हो सके। इससे उनके उत्साह में कमी नहीं आई, क्योंकि उनके चुनाव भाषणों में श्रोताओं, विशेषकर युवकों की भीड़ अधिक रहती थी।

सन् 1957 में द्वितीय आम चुनाव हुए। अटल जी बलरामपुर से संसद के लिए जनसंघ के प्रत्याशी थे। इस चुनाव में हिंदू मतदाताओं के साथ मुसलमान मतदाताओं ने भी उन्हें अपना मत दिया। उनकी सभाओं की भीड़ देखकर विरोधी दलों के छक्के छूटने लगे। प्रतिद्वंद्वी दलों का एक न एक राष्ट्रीय नेता अटल जी को पराजित करने के लिए वहाँ चुनाव सभा करता रहा किंतु विजयश्री ने अटल जी का ही वरण किया। अपनी विजय पर उन्होंने अपार जनसमूह की सभा में कहा था - यह विजय मेरी नहीं, यह बलरामपु‍र क्षेत्र के समस्त नागरिकों की है। आपने मुझे प्यार-दुलार दिया। मैं वचन देता हूँ कि एक सांसद के रूप में इस क्षेत्र की सेवा एक राष्ट्रभक्त सेवक के रूप में करूँगा। ऐसा ही किया भी उन्होंने।

संसद में प्रथम भाषण
धोती, कुर्ता और सदरी पहने, भरे-भरे गोल चेहरे वाले गौरवर्णी अटल जी संसद में अपना प्रथम भाषण देने जब उठे तो उस ठवनि से युवा मृगराज भी लजा जाता। सभी दृष्टियां उन पर टिक गईं। लोग हिन्दी में उन्हें नहीं सुनना चाहते थे किंतु वे क्यों मानते। उन्होंने तो राष्ट्रभाषा की सेवा का व्रत ही ले रखा था। उनका संबोधन हिन्दी में सुनकर अनेक सांसद उठकर बाहर चले गए। पर अटलजी अबाध रूप से बोलते रहे। ये दिन उनके धैर्य और संयम के थे। उन्होंने हिन्दी के अलावा अँगरेजी में न बोलने का दृढ़ संकल्प ले लिया था। एक दिन ऐसा आया कि संसद सदस्यों ने उनकी भाषण-शैली और तथ्य प्रस्तुति कला की प्रशंसा करना शुरू कर दिया। और उसके बाद जब तक अटलजी संसद में रहे, उनके भाषण सुनने के लिए सांसद दौड़-दौड़कर संसद में कक्ष में पहुँच जाते। वे एक सर्वमान्य सर्वश्रेष्ठ सांसद रहे जिनके भाषण के समय न कोई टोका-टाकी होती और न ही कोई शोरशराबा। उस समय पत्रकार दीर्घा भी खचाखच भरी रहती।

संसद में अटल जी
1957 से 1962 दूसरी लोकसभा (बलरामपुर), 1962 से 1967 राज्यसभा (उत्तरप्रदेश), 1967 से 1971 चौथी लोकसभा (बलरामपुर), 1972 से 1977 पाँचवी लोकसभा (ग्वालियर), 1977 से 1979 छठी लोकसभा (नई दिल्ली), 1979 से 1984 सातवीं लोकसभा (नई दिल्ली), 1986 से 1991 राज्यसभा (मध्यप्रदेश), 1991 से लेकर वर्ष 2004 तक के लोकसभा चुनाव लखनऊ से लड़ते और जीतते रहे। इसके बाद उन्होंने स्वास्थ्‍य कारणों से सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।

भारतीय जनता पार्टी के प्रथम राष्ट्रीय अध्‍यक्ष
6 अप्रैल 1980 का दिन अटल जी के जीवन में विशेष महत्वपूर्ण रहा। इसी दिन बंबई में भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ और अटल जी उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए गए। इस महाधिवेशन में आपका जो भव्य स्वागत किया गया वह ऐतिहासिक था। शोभायात्रा में देश के कोने-कोने से आए पच्चीस हजार से अधिक लोगों ने अपने जननायक को अभूतपूर्व सम्मान प्रदान किया।

अभिनंदन और सम्मान
25 जनवरी, 1992 को उन्हें पद्‍मविभूषण से अलंकृत किया गया। 28 सितंबर, 1992 को उन्होंने उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान ने 'हिंदी गौरव' के सम्मान से सम्मानित किया। 20 अप्रैल 1993 को उन्हें कानपुर विश्वविद्यालय ने मानद डी.लिट्‍ की उपाधि प्रदान की। 1 अगस्त 1994 को वाजपेयी को 'लोकमान्य तिलक सम्मान' पारितोषिक प्रदान किया गया जो उनके सेवाभावी, स्वार्थत्यागी तथा समर्पणशील सार्वजनिक जीवन के लिए था। 17 अगस्त, 1994 को संसद ने उन्हें सर्वसम्मति से 'सर्वश्रेष्ठ सांसद' का सम्मान दिया।

प्रकाशित रचनाएँ
1. मृत्यु या हत्या 2. अमर बलिदान 3. कैदी कविराय की कुंडलियाँ 4. न्यू डाइमेंसन ऑफ फॉरेन पॉलिसीज 5. लोकसभा में अटल जी 6. अमर आग है 7. मेरी इक्यावन कविताएँ 8. कुछ लेख, कुछ भाषण 9. राजनीति की रपटीली राहें 10. बिन्दु-बिन्दु विचार 11. सेक्युलरवाद 12. मेरी संसदीय यात्रा 13. सुवासित पुष्प 14. संकल्प काल 15. विचार बिंदु 16. शक्ति से शांति 17. न दैन्यं न पलायनम् 18. अटल जी की अमेरिका यात्रा 19. नई चुनौती : नया अवसर।

अटल जी के लेख और कविताएँ राष्ट्र धर्म, पाञ्चजन्य, नई कमल ज्योति, धर्मयुग, कादम्बिनी, नवनीत आदि में प्रकाशित हुए हैं।

भारत के प्रधानमंत्री बने
अटल जी 11वीं लोकसभा में लखनऊ से सांसद के रूप में विजयी हुए और भारतीय लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें 16 मई, 1996 को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई, किंतु उन्होंने विपरीत परिस्थितियों के कारण 28 मई, 1996 को स्वयं त्यागपत्र दे दिया।

दोबारा प्रधानमंत्री बने
सन् 1998 के चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। चुनावों के पूर्व उसने देश की अन्य कई पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे। भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को राष्ट्रपति महोदय ने सरकार बनाने के लिए उपयुक्त पाया और अटलजी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। अटल जी ने 19 मार्च 1998 को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। तीसरी बार प्रधानमंत्री बने,13 अक्टूबर 1999 को अटल जी ने तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और इस सरकार ने अपना पाँच वर्षों का कार्यकाल पूरा किया।




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