आस-पास का सच
कैलाश मंडलेकर
आलोक सेठी के कविता संग्रह का नाम है 'इर्द-गिर्द।' यह उनकी दूसरी किताब है। पहली किताब, 'तुरपाई, उधड़ते रिश्तों की' कुछ समय पहले ही आई है, जिसमें आलोक ने हमारे समय के अनेक रचनाकारों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियों एवं अनुभूतिपरक रचनाओं को शामिल करके अपने काव्य संस्कार तथा खंडित होते सामाजिक मूल्यों को लेकर चिंताएँ जाहिर की हैं।
'इर्द-गिर्द' में आलोक सेठी की विशुद्ध मौलिक कविताएँ हैं, जो अपने आसपास के सच को पूरी ईमानदारी से बयान करती हैं। 'इर्द-गिर्द' के मार्फत बहुत गहरे में आलोक कहना चाहते हैं कि मनुष्य जन्म से भले ही एक स्वायत्त और स्वतंत्र इकाई हो, किंतु उसके इर्द-गिर्द हर वक्त एक व्यापक पारिवारिकता और विराट जनसमुदाय विद्यमान रहता है, जो निरंतर उसकी स्वायत्तता को स्पंदित भी करता है और परिष्कृत भी।
आदमी के इर्द-गिर्द जीवंत मनुष्यों का एक बड़ा समुदाय हर क्षण मौजूद रहता है और दुर्भाग्य यह है कि वह इस सबसे सर्वथा विलग और विरक्त होता जा रहा है। रचनाकार के आसपास जो कुछ घट रहा है, बन रहा है अथवा मिट रहा है, उस सबकी संवेदनापरक अभिव्यक्ति इस कविता संग्रह में दर्ज है।
इन दिनों जबकि हमारे रिश्तों की तरलता सूखने की कगार पर है, तब आलोक अपनी कविताओं में उन्हें पुनर्जीवित करने में तल्लीनता से जुटे हैं। वे होस्टल में पढ़ रही बेटी को याद करके उदास होते हैं। जिस बेटी की उपस्थिति से पूरे घर को एक रौनक और खूबसूरती मिलती थी, वह पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चली गई और पूरा घर उसकी अनुपस्थिति से आहत है।
रचनाकार का संवेदनशील मन बहन को भी लगभग इतनी ही भावुकता से याद करता है। उसकी स्मृतियाँ उस वक्त और ज्यादा प्रखर हो जाती हैं, जब रेडियो पर राखी के गीत बजते हैं। बड़े भाई का छोटों के लिए प्यार तथा माँ का वात्सल्य रिश्तों को न केवल नए संदर्भ देता है, बल्कि खंडित होते सामाजिक मूल्यों को फिर से गढ़ने का उपक्रम भी करता है।
आलोक को गीता का सच्चा अनुयायी वह लगता है, जो गीता को सिर्फ कंठस्थ ही नहीं करता वरन् उसे कर्म में भी परिणत करता है। बिना किसी देखरेख और तरतीब के जंगल में फूलने वाला पलाश रचनाकार को आकर्षित करता है।
'क्षमा' नामक कविता सुई के स्वभाव पर केंद्रित है, जो धागे से मिलकर फटे हुए को जोड़ने का सुयोग करती है। मानवीय स्वभाव में जो बैर और क्रोध है, उसे क्षमा और विनम्रता में बदलने के लिए सुई और धागे का प्रतीक बहुत अनूठा और अनुकरणीय है।
भारतीय परिवारों में पत्नी के प्रति जो पारंपरिक रवैया है, उसे खारिज करते हुए आलोक पत्नी को उसका सम्मानजनक व्यक्तित्व लौटाना चाहते हैं। इसी प्रकार 'बचपन', 'सातांक्लॉज', 'पहलू', 'बँटवारा' आदि शीर्षकों से दी गई कविताएँ इस संग्रह को पठनीय और व्यापक बनाती हैं।
छोटे और कस्बाई शहरों का कॉलोनीकरण होना भी रचनाकार को आहत करता है। 'शहर हो गया मेरा खंडवा' में रचनाकार की यह चिंता उस व्यापक संदर्भ को रेखांकित करती है, जिसके तहत नगरों के वैराट्य का बोझ आत्मीयता को कुचल रहा है। 'फुरसत' नामक कविता में भी इस तरह के संदर्भों की चर्चा है।
* पुस्तकः इर्द गिर्द
* लेखकः आलोक सेठी
* प्रकाशकः क्वॉलिटी पब्लिशिंग कंपनी, भोपाल
* मूल्यः 200 रुपए।
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'इर्द-गिर्द' में आलोक सेठी की विशुद्ध मौलिक कविताएँ हैं, जो अपने आसपास के सच को पूरी ईमानदारी से बयान करती हैं। 'इर्द-गिर्द' के मार्फत बहुत गहरे में आलोक कहना चाहते हैं कि मनुष्य जन्म से भले ही एक स्वायत्त और स्वतंत्र इकाई हो, किंतु उसके इर्द-गिर्द हर वक्त एक व्यापक पारिवारिकता और विराट जनसमुदाय विद्यमान रहता है, जो निरंतर उसकी स्वायत्तता को स्पंदित भी करता है और परिष्कृत भी।
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इन दिनों जबकि हमारे रिश्तों की तरलता सूखने की कगार पर है, तब आलोक अपनी कविताओं में उन्हें पुनर्जीवित करने में तल्लीनता से जुटे हैं। वे होस्टल में पढ़ रही बेटी को याद करके उदास होते हैं। जिस बेटी की उपस्थिति से पूरे घर को एक रौनक और खूबसूरती मिलती थी, वह पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चली गई और पूरा घर उसकी अनुपस्थिति से आहत है।
रचनाकार का संवेदनशील मन बहन को भी लगभग इतनी ही भावुकता से याद करता है। उसकी स्मृतियाँ उस वक्त और ज्यादा प्रखर हो जाती हैं, जब रेडियो पर राखी के गीत बजते हैं। बड़े भाई का छोटों के लिए प्यार तथा माँ का वात्सल्य रिश्तों को न केवल नए संदर्भ देता है, बल्कि खंडित होते सामाजिक मूल्यों को फिर से गढ़ने का उपक्रम भी करता है।
आलोक को गीता का सच्चा अनुयायी वह लगता है, जो गीता को सिर्फ कंठस्थ ही नहीं करता वरन् उसे कर्म में भी परिणत करता है। बिना किसी देखरेख और तरतीब के जंगल में फूलने वाला पलाश रचनाकार को आकर्षित करता है।
'क्षमा' नामक कविता सुई के स्वभाव पर केंद्रित है, जो धागे से मिलकर फटे हुए को जोड़ने का सुयोग करती है। मानवीय स्वभाव में जो बैर और क्रोध है, उसे क्षमा और विनम्रता में बदलने के लिए सुई और धागे का प्रतीक बहुत अनूठा और अनुकरणीय है।
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छोटे और कस्बाई शहरों का कॉलोनीकरण होना भी रचनाकार को आहत करता है। 'शहर हो गया मेरा खंडवा' में रचनाकार की यह चिंता उस व्यापक संदर्भ को रेखांकित करती है, जिसके तहत नगरों के वैराट्य का बोझ आत्मीयता को कुचल रहा है। 'फुरसत' नामक कविता में भी इस तरह के संदर्भों की चर्चा है।
* पुस्तकः इर्द गिर्द
* लेखकः आलोक सेठी
* प्रकाशकः क्वॉलिटी पब्लिशिंग कंपनी, भोपाल
* मूल्यः 200 रुपए।
