डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन के बारे में 10 रोचक तथ्य
Dr Syama Prasad Mukherjee History: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के उन प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने शिक्षा, राष्ट्रनिर्माण और राजनीति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे एक प्रख्यात शिक्षाविद, विधिवेत्ता, सांसद और दूरदर्शी राजनीतिक नेता थे। कम आयु में विश्वविद्यालय के कुलपति बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्य करने तक, उनका सार्वजनिक जीवन अनेक उल्लेखनीय उपलब्धियों से भरा रहा।
वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना कर उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नई वैचारिक दिशा देने का प्रयास किया, जिसका प्रभाव आगे के दशकों में भी दिखाई दिया। आज भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उनके राष्ट्रसेवा के संकल्प, शिक्षा के प्रति समर्पण, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक योगदान के लिए याद किया जाता है।
1. सबसे कम उम्र के कुलपति
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी मेधावी छात्र थे। उन्होंने केवल 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता (कोलकाता) विश्वविद्यालय के कुलपति का पद संभाला था। वह इस पद पर बैठने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे।
2. स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री
जब 1947 में भारत आजाद हुआ, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। वे देश के पहले उद्योग और आपूर्ति मंत्री (Minister for Industry and Supply) बने। सन् 1943 से 1946 तक वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे थे।
3. नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा
जब नेहरू सरकार ने 1950 में पाकिस्तान के साथ 'नेहरू-लियाकत समझौते' पर हस्ताक्षर किए, तो डॉ. मुखर्जी इसके सख्त खिलाफ थे। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में उन्होंने केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
4. भारतीय जनसंघ की स्थापना
मंत्रिमंडल से हटने के बाद, उन्होंने 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ (BJS) की स्थापना की। यही संगठन आगे चलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रूप में पुनर्गठित हुआ।
5. एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे
वे जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 के घोर विरोधी थे। उन्होंने कश्मीर में अलग झंडे, अलग संविधान और वहां जाने के लिए परमिट (Permit) की व्यवस्था का कड़ा विरोध किया और 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' का यह प्रसिद्ध नारा दिया।
6. बिना परमिट कश्मीर में प्रवेश और गिरफ्तारी
उस समय भारत के नागरिकों को भी कश्मीर जाने के लिए परमिट की जरूरत होती थी। डॉ. मुखर्जी ने इस कानून को चुनौती देने के लिए मई 1953 में बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश किया, जिसके बाद उन्हें वहां की सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
7. बैरिस्टर की उपाधि और राजनीति में प्रवेश
उन्होंने इंग्लैंड (लंदन) के 'द ऑनरेबल सोसाइटी ऑफ लिंक्न्स इन' से कानून की पढ़ाई की और 1927 में बैरिस्टर बने। भारत लौटने के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुए।
8. बंगाल विभाजन में अहम भूमिका
जब 1947 में भारत का विभाजन हो रहा था, तब उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष किया कि मुस्लिम लीग पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल न कर पाए। उन्हीं के प्रयासों के कारण हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा बना रहा।
9. 'महाबोधि सोसाइटी' के अध्यक्ष
वे केवल राजनीति तक सीमित नहीं थे। वे बौद्ध धर्म और संस्कृति के प्रति गहरा सम्मान रखते थे। वे महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे और उन्होंने सांची में बौद्ध अवशेषों को सुरक्षित रखने और एशियाई देशों में इसके प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
10. रहस्यमयी परिस्थितियों में निधन
23 जून 1953 को कश्मीर में नजरबंदी के दौरान ही अस्पताल में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु आज भी एक रहस्य बनी हुई है, क्योंकि उनकी मां और कई बड़े नेताओं ने इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की थी, जिसे तत्कालीन सरकार ने स्वीकार नहीं किया था। उन्हें 'महान देशभक्त और शहीद' के रूप में याद किया जाता है।
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