पुस्तक समीक्षा : अद्धभुत प्रेम गाथा का बेहतरीन उपन्यास 'रेवा में बहते मयूर पंख'

book review Nidhi Jain
बेहतरीन लेखिका की 'रेवा में बहते मयूर पंख' सशक्त हस्ताक्षर है अद्धभुत प्रेम गाथा का। यह कहानी है कल-कल बहती रेवा की, जो साक्षी रही इतिहास के उन पन्नों की जिसमें सिमटा था कालजयी प्रेम, संगीत, सांस्कृतिक पराकाष्ठा, पराक्रम, शौर्य, यश, मान, अभिमान, षड्यंत्र, बिछोह।


लेखिका ने किसी कुशल चितेरे की तरह सारंगपुर की गलियों को, नदी के तट को, सखियों की हंसी-ठिठोली को, पिता-भाई के अपार स्नेह को, त्योहारों के कोलाहल को, रीति-रिवाजों की रौनक को, जीवन के यापन को और सबसे ऊपर संगीत के आरोह-अवरोह को उपन्यास के कैनवास में उकेरा है।
यह उपन्यास बहुत इत्मीनान और तसल्ली चाहता है। शब्द-शब्द पर मन अटकता है। खासकर सुर-लय की बारीकियों पर मन और नजर दोनों ठहरती जाती है और उसे जर्रा-जर्रा आत्मसात करने की इच्छा मुखरित होती है। यह गहन शोध उपन्यास में हर जगह परिलक्षित है और पाठकों को बांधे रखने में सफल है।

शासक और शासित के बीच का सामंजस्य किस तरह इतिहास को मोड़ता है, इसका उत्तम उदाहरण कदमताल करता आंखों के सामने से गुजरता है। मांडू के उज्ज्वल विगत के सुनहरे पन्नों ने मन में दो भावों को एकसार बहाया है। शानदार उत्कर्ष और दुख:दायी पतन। समय के चक्र-कुचक्र की देन भले ही कारण हो, पर ऐसे अद्वितीय काल का यूं अवसान पीड़ादायक होता है। इन पन्नों को अक्षरत: पाठकों तक पहुंचाने में लेखिका की कलम पूर्णतया सफल हुई है।

उपन्यास में नदी को माध्यम बनाकर लेखिका निधि जैन ने जिस कसावट से शब्दों की महीन बुनावट बुनी है, उसके लिए बेहतरीन एक छोटा शब्द है।

उन स्थानों का उल्लेख यहां निहायत जरूरी हो जाता है, जहां उपन्यास की उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है। प्रथमत: आंखें तीसरे पृष्ठ पर ठिठकती हैं और उन पंक्तियों को आत्मसात करती हैं। उपन्यास की पृष्ठभूमि स्वत: इन्हीं शब्दों में निहित हो जाती है।
प्रेम कहानियां बारिशों
में नाचते वे मयूर हैं,
जिनके पंख देह त्यागने
के बाद भी सदियों संभाले जाते हैं।

उपन्यास में आगे हल्के से पदचाप करते मयूर पंख मार्ग प्रशस्त करते चलते हैं। हर शब्द, हर पंक्ति का अपने स्थान पर होने का एक ध्येय है जिसे सरसरी तौर पर नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इससे आगे आने वाले शब्दों के सौंदर्य का हनन होता है। तभी पहले ही कहा कि यह उपन्यास इत्मीनान चाहता है। कुछ पंक्तियों को फिर मुड़-मुड़कर पढ़ा, परखा और सोच देर तक उसी के आसपास विचरती रही। बानगी के तौर पर रूपमती के रूप-लावण्य को दर्शातीं पंक्तियां-

रूपमती जैसी रूप सौंदर्य की अनुपम मूर्ति, सुगंधित महक और खुशहाली बिखेरती, मधुर कंठ स्वर वाली, तीखे नैन, कनक वर्ण, कोमलांगी।

रागों को बिखेरतीं पंक्तियां-
रात्रि की विदाई और संध्या की स्वागत बेला में गाए जाने वाले राग संधिप्रकाश कहलाते हैं। कुछ राग ऋतुप्रधान होते हैं, जैसे मेघ मल्हार, राग बंसत।

राग के 10 लक्षण होते हैं- ग्रह, अंश, न्यास, उपन्यास, षाड़वत्य, ओड़वत्य, अल्पत्व, बहुतत्व, मंद और तार।

स्त्रियों के साज-श्रृंगार का वर्णन-
गांव की स्त्रियां अपनी सामर्थ्य के अनुसार हाथ में कड़े, गले में सांखली, कमर में कंदोरा, पांव में पायजेब, कर्णफूल, रखड़ी, गले में ठुस्सी और माला, हाथों में चूड़ा, बाजरी, उंगलियों में बींटी, माथे पर झेला पहनकर और गोटा लगी लुगड़ा-ओढ़नी पहन वे सभी स्वर्ग की अप्सराओं को मात दे रही थीं।

शाही दस्तखान- अफगानी और मालवी भोजन की लजीज रसोई दावतखाने में बड़े-बड़े चांदी के थालों में सजाकर रखी हुई थी। भुने हुए गोश्त की खुशबू, मैदे का नान, फल, शरबत, मिठाइयां सभी कुछ भोजन में शामिल था।
ब्याह के रस्म-ओ-रिवाज- किस तरह सिगड़ी, पगड़ी, पामणा बई सुद्ददा के न्योते देने हैं। (सिगड़ी- चूल्हा बंद रहेगा, पूरा घर आमंत्रित है), पगड़ी (सिर्फ पुरुष आमंत्रित है), पामणा (घर में आए अतिथि सहित सब आमंत्रित हैं)। काकी ने केसर से कह घर की भक्कारी (गहरी अलमारी) में से सामान निकलवाया और चार कांगण (अनाज नापने का बर्तन) भर दाल दलवाई। हल्दी कूटकर रख ली। काकी की यह तैयारी पापड़, बड़ी के मुहूर्त के लिए और दूल्हे की पीठी (हल्दी के उबटन) के लिए काम आने वाली थी।

भाई के ब्याह पर भेजा नजराना- बाज ने तोहफे में पैरहन और रकम के अलावा खुरासानी इमली, रायण, आम, अंगूर भेजे हैं, साथ में पारिजात के फूलों की सूखी डंडियां भी भेजी हैं।

रानी रूपमती के वस्त्र- रानी की खूबसूरती बढ़ाने के लिए किमखाब, जरदोजी के किम वाली पैरहन, बहुमूल्य जेवरात, जरबफ्त कबा (कलाबूत के धागों द्वारा काम किया हुआ रेशमी वस्त्र) पहुंचाया गया।
संगीत की शानदार महफिल का आगाज- मियां तानसेन संगीत समारोह में शामिल होने के लिए मांडू आ चुके थे। चंदेरी से बैजनाथ मिश्र ध्रुपद गायक के रूप में पधारे। ये रागबहार गाकर फूल खिलाने में माहिर थे तो राग मालकौंस गाकर पत्थर पिघलाने का भी हुनर रखते थे। गुजरात से नरसिंह मेहता के शिष्य पधारे थे और कई भालण कवि भी। संत एकनाथ अभंग गाने के लिए प्रसिद्ध थे। ख्यातिप्राप्त बीनकार सम्मुख सिंह भी अपनी कला दिखाने के लिए मांडू तशरीफ लाए थे।

यह तो मात्र बानगी के तौर पर ली गई पंक्तियां हैं। इस उपन्यास की चुनर में ऐसे अनगिनत वाकये सितारों की तरह जड़े अपनी चमक बिखेर रहे हैं। लेखिका की मालवी, हिन्दी और उर्दू अल्फाजों पर समान पकड़ है, जो इस उपन्यास के तमाम पन्नों पर रू-ब-रू होती है। अल्फाजों को इस तरह पिरोया गया है कि वे पाठकों के मन में गहरे तक दस्तखत देते हैं।

रेवा के पवित्र जल, मालवा की सौंधी खुशबू, पराक्रम और कालजयी प्रेम पाती लिए यह उपन्यास पूरी ओजस्विता से अपने मयूर पंख फैलाने में सफल हुए हैं। वरिष्ठ लेखिका निधि जैन का यह उपन्यास अनंत आकाश को छुए, ऐसी शुभेच्छा के साथ।

पुस्तक- रेवा में बहते मयूर पंख
लेखिका- निधि जैन



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