पुस्तक समीक्षा : दिलकश फूलों का एहसास करवाता है कविता संग्रह 'तोष'

Garima Mishra Book
Book Review Tosh
* : मनुष्यता का अभिनंदन करती कविताएं

समीक्षक- पंडित सुरेश नीरव (अंतरराष्ट्रीय कवि एवं साहित्यकार)

समकालीन साहित्य के सृजन आकाश में इन दिनों एक नाम साहित्यिक दीप्ति-प्रदीप्ति और रचनात्मकता की पूरी गरिमा के साथ प्रभाषित हुआ है और वह नाम है -'तोष'। अंग्रेजी साहित्य में पीएच.डी. गरिमा मिश्र को उर्दू और हिंदी के अल्फाज़ से शायराना बर्ताव करने की ऐसी महारत हासिल है कि इनके लिखे गद्य में भी गीतों और ग़ज़लों की ख़ुशबू आती है। अध्यापन ने जहां इनकी भाषा और अभिव्यक्ति को एक अप्रतिम अनुशासन दिया है तो वहीं संगीत की शिक्षा ने भाषा को ललित-लयात्मकता प्रदान की है।

गरिमा मिश्र के अभी तक -दो काव्य कथा संकलन आ चुके हैं- नीराजन, जिंदगी कभी धूप कभी छांव, और बहुत जल्दी ही एक और तोष नाम से पाठकों के समक्ष आने को है। इस के साथ ही एक उपन्यास भावानुबंध भी प्रकाशन के लिए बिल्कुल तैयार है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में गरिमा मिश्र की रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। इसके अलावा फेसबुक पर तोष नाम से आपका एक पेज भी है जो अपनी नितांत साहित्यिक गतिविधियों के कारण ही अपना एक अलग अस्तित्व बना चुका है।

अब अगर कविताओं की बात करें तो गरिमा मिश्र की कविताएं अपने आप में मनुष्यता के उत्थान का एक सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर मंजुल घोष हैं। समकालीन सरोकारों से लैस इनकी कविताओं में जो कह दिया गया है, उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण वह है जो अनकहा रह गया है। शब्दों के नेपथ्य में जो अर्थवान चुप्पी टहल-कदमी करती है उस चुप्पी को सुनने की जो समझ है वह समझ ही इन कविताओं का ऋषि-प्राण है। जो समझ को समझा-समझाकर समझदार बनाने में पूरी तरह समर्थ हैं। यथा-

कुछ अपने हिस्से के, कुछ उसके हिस्से के कविता को देखिए-
मिरे हिस्से के मकान की
हर दीवार खाली है
मैं बारहा बाहोशो हवास
तुम्हारे वुजूद को चस्पा कर दिया
करती हूं
खाली तस्वीर के फ्रेम में
हर रोज बदल कर तस्वीरें उसी दीवार
को सजाती हूं जहां कभी टिका कर
खाब मिरे चले गए थे तुम।

इन पंक्तियों को पढ़ कर सचमुच ऐसा महसूस होता है मानो यकबयक कोई खालीपन और सन्नाटे के अंधे कुएं में गिर गया है और वहीं गरिमा की कविताएं एक सीढ़ी बन जाती है उसको खालीपन के कुंए से मनुष्य को बाहर निकलने के लिए। सचमुच अवसाद के घुप्प अंधेरे में उम्मीद का एक रौशन दीया बन जाती हैं यह कविताएं। गरिमा की कविता की भाषा में एक खिड़की खुलती हैं, जहां से अनुभूतियां झांकती हैं अभिव्यक्ति हो जाने के लिए। संवेदनाएं अपने पूरे कुनबे के साथ इन कविताओं की भाषा के घर में रहती हैं। कभी-कभी लगता है मानो कहीं किसी सन्नाटे के दरवाज़े पर जैसे कोई आवाज़ दस्तक दे रही हो-

एक लम्हा को जो
आवाजों के दरवाजे
खटखटाए तो जान सुनो
कितने किस्से लबो पैरहन
में सिमट आए
हो साथ नहीं फिर भी
क्यों मुतासिर हूं इतनी तुमसे
जैसे दूर कहीं दिखते साए हैं।

बहुत गहरे अगर इन कविताओं की पड़ताल की जाए तो ये कविताएं शब्दों के जरिए शब्दों के पार ले जाने की एक खामोश यात्रा है, तभी तो गरिमा कहती हैं कि-

कोई बात तो कही होती
जो लफ्जों के इतर होती
जब कहा जो तल्ख कहा
बाज दफे एक वाकया जो
दौरे शिकन रहा हर लम्हा
रहा तो बस वही दरम्या रहा।

साथ-साथ रहकर नजदीकियों के दरम्यान पनपती दूरियां हमारे रिश्तों को रेल की पटरियों की तरह बना देती हैं, जो मीलों साथ-साथ चलने के बाद भी कभी मिलती नहीं हैं। इस विसंगति को बड़ी ही शाइस्तगी से गरिमा ने अपनी कविताओं में रेखांकित किया है-

बाज दफा एक राह चुनी थी हमने
हुए गुम फकत हौसले रहे बसर के
रहा बस मासूम सा खयाल
एक साथ चलने का
तुम उस छोर चले हम इस छोर
न राह ही खत्म हुई
न ही लम्हे सिल पाए
न मंजिल ही नजर में आई
न तुम साथ आए न हम साथ आए....!!

ऐसी कष्टदायक, त्रासक और दंशदायी स्थितियों में भी व्यष्टि और समष्टि की समवेत दृष्टि से उपजा दृष्टिकोण इन कविताओं का व्यास-सत्य है जो विसंगतियों के दंडकारण्य में भी आदर्शों के राम को तलाश लेना का माद्दा रखती हैं। एक ऐसा ही सकारात्मक आव्हान देखिए-

आओ राम,
हे राम पुनः एक बार आ जाओ
जन-जन को सत्य मार्ग दिखलाओ
है फैला तमस अज्ञान का, बिखेर उजियारा प्रेम भक्ति का
प्रत्येक भारतवंशी में बल बुद्धि से तुम घर कर जाओ....
कितना विपरीत समय है काल के हाथ हर कोमल स्वप्न धरे हैं..
छंट रहा घना तिमिर अंधियारा अब हर देहरी भाव दीप जले हैं
एक आस का भोर तारक दिखलाता परिवर्तित परिदृश्य हमें है
एक मान चंद्र को धर मस्तक कितने आतुर हृदय खङे हैं
हे राम तुम्हारे होने से युग के युग पल्लवित हुए
हो पोषक तुम सत्य संधान के अब चरितार्थ सब ध्येय हुए हैं
पुनः नवल लहर उठेगी एक ध्वनि इतिहास रचने को
अमृत सी वाणी फैला, जयघोष राम का कण-कण करे है
कल पुन प्रतिष्ठित होगी मर्यादा आस्था विश्वास की
तीव्र मंद्र सुर से कपित हृदय सत्य की प्रशाल धरे है
जयघोष करो करो जयमाल प्रतीक्षा है अवतार की
सुख रस बहता विजय भाल से मन देहरी आरात्रिका करे है
हे राम, विश्राम करो थके हुए युग बीत गए
पुनः शक्ति का संचय करने आर्त मन आह्वान करे है
कर नीराजन नेह ज्योति से पर पीड़ा हरने तुम आए
साक्षात दृष्टि में तुम स्थापित कर जोड़े आनत् हम खड़े हैं
हे राम पुनः एक बार आ जाओ….

सच!! समय की हथेली से नैतिक मूल्य रेत की तरह जब झर रहे हों तो सारी मनुष्यता आस भरी दृष्टि से मर्यादा पुरुषोत्तम राम की ओर ही टकटकी लगाए हुए है, जो पुनः मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना कर सकें। प्रकारांतर से ये कविताएं नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का शाब्दिक और सारस्वत अनुष्ठान हैं।

इन कविताओं को पढ़कर एक एहसास ऐसा भी होता है मानो हिन्दी के पौधे की नर्म-रेशमी शाखों पर उर्दू के दिलकश फूल खिल गए हों। जिनकी ख़ुशबू से पढ़ने वाले की रूह तक महक जाती है। कुल मिलाकर गरिमा मिश्र की कविताओं को पढ़ना एक ऐसे लोक से गुजरना है जहां नूर और ख़ुशबू की मुसलसल बारिश होती रहती है और इसे पढ़नेवाला भीतर तक भीगे बिना रह नहीं सकता। इनकी कविताओं से एक बार आप मानसिक रिश्तेदारी बना कर तो देखिए।




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