पुस्तक समीक्षा : लघुकथा संग्रह- खारी बूंदें

Book Review
समीक्षक- प्रताप सिंह सोढ़ी

खारी बूंदें (लघुकथा संग्रह)
: सहज संप्रेषणीय लघुकथाएं
स्थूल का सूक्ष्म में रुपांतरण प्रकृति का अवरोही नहीं आरोही नियम है। यही है वास्तविक उद्यमिता जिससे चेतना का लघुत्तम संप्रेषण होता है। यह नियम जिस काल अथवा अंतराल में पूर्णता को प्राप्त होकर जिस किसी भी माध्यम से अभिव्यक्त होता है, वह काल या अंतराल उन्नयन का रचना काल बन जाता है, बशर्ते मानवीयता और मानव कल्याण से वह संबद्ध एवं उद्देश्य पूर्ण हो।
लघुकथा अपनी संकेंद्रितता, संवेदना की सांद्रकता के कारण कहानी और उपन्यास से अलग एक स्वतंत्र विधा है। कथाकार चेतना भाटी का खारी
बूंदें है। इसमें 145 लघुकथाएं हैं। दरअसल 'खारी बूंदें' की लघुकथाएं अपने मूल में खारापन समेटते हुए भी मिठास का आभास देती हैं।

इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये आवश्यकता के अनुरुप सुष्ठु(in a proper manner) है।
शब्दों के प्रयोग में काफी सक्रिय एवं सतर्क प्रतीत होती हैं। यही कारण है कि इन लघुकथाओं में इस दृष्टि से कोई फालतूपन नहीं आ पाया है।

उपयुक्त शिल्प के अनुसार भाषा का सटीक प्रयोग हुआ है। शब्द प्रबंध ऐसा है कि पाठक पढ़ते हुए भाषा के प्रवाह में बहने लगता है और रचना पाठक से सीधा सरोकार स्थापित करके उसके ह्रदय में स्थान बनाने में सक्षम हो जाती है।
आज महानगर सीमेंट कॉन्क्रीट के जंगल होते जा रहे हैं। गगनचुंबी बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले निवासी, प्रकृति की मनोरम छटा से वंचित रहते हैं। न उनके कमरों में धूप आ पाती है और न ही स्वच्छ हवा और न ही खुले आसमान का नजारा देखने की को मिलता है। गांव से शहर अपनी बेटे के पास रहने आई मां उसके फ्लेट में अपने गांव जैसा प्राकृतिक वातावरण पा आनंद विभोर होती है।

फ्लेट में अठखेलियां करती सूर्य की किरणें उनके दर्द भरे पांवों की मालिश करती है। दरवाजे की चौखट से लटका लघु आसमान उसे दिखाई देता है। वृक्षों की फुनगियों का प्रतिबिम्ब खिड़की के शीशों से परावर्तित हो कर अद्भुत छटा बिखेरता है। बस यही कुछ आनंदमयी बूंदे कांक्रीट के रेगिस्तान में उसे जीवित रखे हुए हैं। ग्रामीण एवं शहरी पर्यावरण का तुलनात्मक विश्लेषण 'बूंदें जीवन की' में हुआ है। लघुकथा 'पानी-पानी' में एक ज्वलंत समस्या को उठाया गया है। चारों तरफ सीमेंट की पक्की सड़कें।

सड़कों एवं मकानों के बीच की जगह भी पक्की कर ली गई है। धरती माता सीमेंट कोटेड हो गई हैं। भारी वर्षा होने से घरों में पानी घुस जाने से भारी नुकसान होता है। सड़कों पर पानी जमा हो जाता है। सीमेंट कॉन्क्रीट की सड़कों में पानी जमीन में उतरता नहीं। जमीन कच्ची होती तो सारा पानी सोख लेगी । ऐसे में पानी का लेवल जमीन में बहुत नीचे तक पहुंच जाता है और गर्मियों में नागरिकों को पानी की भारी किल्लत उठाना पड़ती है। सडकें और रास्ते कच्चे हों ताकि धरती पानी को अपने भीतर समा सके।

ऐसी योजना से पानी की मुसीबत से भी निजात मिल सकती है। यह लघुकथा अपने सार्थक उद्देश्य से सचाई बयान करती है।

'मातृ दिवस का उपहार' संग्रह की एक अच्छी लघुकथा है। नितांत आलसी बिट्टू जो अपनी हैरानी भरी हरकतों से घर भर को अपनी ओर आकर्षित करता है। वह जल्दी उठ कर नहा-धो लेता है, अपना कमरा साफ करता है, अखबार पढ़ता है। बड़ी मम्मी जब उससे पूछती है कि - बिट्टू आज सब कैसे कर दिया?
बड़ी मम्मी आज मदर्स डे है - यह सुन बड़ी मम्मी का चेहरा खिल उठता है। उसे लगता है जैसे उसे मदर्स डे का श्रेष्ठ उपहार मिल गया है। इस लघुकथा में बिट्टू के बाल मन में मां के प्रति उपजी श्रद्धा का मार्मिक चित्रण हुआ है।

एकाकीपन पुरुष के लिए सबसे बड़ी सजा है और स्त्री के लिए तो यह सजा भी है और कजा भी। पुकार - लघुकथा एक ऐसी स्त्री की कथा-व्यथा है जो परिवार में अपने बहू-बेटे से तिरस्कृत हो संवादहीनता के दंश पा बुरी तरह से आहत है। वह गहन पीड़ा एवं घर में पसरे सन्नाटे से मुक्त होना चाहती है। घर के बाहर जब कोई उसके बेटे वीरेन को पुकारता है तो उसका लाभ उठा कर वह अपने बेटे का नाम जोर-जोर से पुकारने लगती है। अपने बेटे का बार-बार नाम लेने से उसे सुकून मिलता है और उसकी भीतर पनप रही घुटन से राहत भी मिलती है। उसका बेटा तो उसके पास ही बैठा है। एकाकी जीवन की मनःस्थिति एवं उससे उत्पन्न पीड़ा का बड़ा सजीव चित्रण लघुकथा में हुआ है।
एक मुस्लिम युवक रहीम की कर्तव्यनिष्ठा उस समय प्रकट होती है जब वह कर्फ्यू में भी हर वर्ष हर तालिका पर्व पर अपनी मालकिन को पूजा की सामग्री पहुंचाता है। जबकि मालकिन कर्फ्यू के त्रासदी भरे माहौल में इस पर्व को भूल गई होती हैं। पूजन सामग्री-लघुकथा सांप्रदायिक सद्भाव एवं कर्तव्यपरायणता की तर्ज मानी करती है।

आज जीवन के बदलते मूल्यों ने मानवीय संवेदना को कुंठित कर दिया है। एक अफसर बेटा अपनी मां की गंभीर बीमारी का समाचार पा उसे देखने गांव इसलिए नहीं जा पाता कि ना जाने कितने दिन उसे वहां रुकना पड़े। वह जानता है कि उसकी मां अब बच नहीं सकती। इसलिए उसकी मृत्यु का समाचार पा वह गांव जाएगा। 'अंतिम समाचार' लघुकथा आज मनुष्य के भीतर पनपती स्वार्थपरता का निर्मम यथार्थ प्रस्तुत करती है।
सहायक -लघुकथा पोस्टल डिपार्टमेंट से सेवानिवृत्त उस कर्मचारी की निष्ठा एवं सहयोगात्मक प्रवति को उद्घाटित करती है जो पोस्ट ऑफिस में एक अकेला कर्मचारी परेशान हो काम कर रहा है। बाकी का स्टाफ छुट्टी पर था। वह सेवानिवृत्त कर्मचारी उस अकेले कर्मचारी की सहायता के लिए आता है और सब काम निपटा रहा है। सेवानिवृत्त कर्मचारी की परदुःखकातरता एवं संवेदनशीलता का बड़ा सजीव चित्रण इस लघुकथा में हुआ है।
दुःस्वप्न - प्रकृति के प्रति मनुष्य की निर्ममता को प्रदर्शित करती है। कटते वृक्ष, विधवा होती छाया, आक्सीजन की भारी कमी, मानवता को विनाश की ओर ले जा रही है। बालक स्वप्न में ऑक्सीजन की कमी महसूस कर बेचैन हो कर चीख उठता है। मां जब पूछती है कि कोई सपना देखा क्या?
तो वह बताता है कि वातावरण में ऑक्सीजन नहीं रही और उसके अभाव में उसने अपने पिता को खो दिया।

बालक के भीतर पनपे इस दुःस्वप्न ने पर्यावरण में व्याप्त घुटन को दर्शाया गया है। अगर अभी से इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो सर्वनाश को रोका नहीं जा सकता।
ओएसिस, इतिहासों की थप्पी, कपोत गृहिणी, चील झपट्टा, जानकर भी,
अंकुर, छवि का भ्रम,विस्तार एवं खारी बूंदें संग्रह की लघुकथाएं अपनी संप्रेषणीयता से पाठक से सीधा संबंध स्थापित करती हैं।

चेतना जी चूंकि कहानियां भी लिखती है, अतः इस विधा का परिवेश उनकी प्रायः लघुकथाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। वे बड़ी सहजता से किसी ज्वलन्त समस्या को उठाती हैं और उसके निराकरण का संकेत भी अपनी लघुकथाओं में बिना किसी उपदेश के कर देती हैं।

सहज संप्रेषणीय ये लघुकथाएं विविध विषयों को समेट हुए हैं। मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि चेतना भाटी की लघुकथाएं रचनाधर्मिता के प्रति सहज ही आश्वस्त करती हैं।
पुस्तक - खारी बूंदें- लघुकथा संग्रह
लेखिका- चेतना भाटी
प्रकाशक- आर्यन प्रकाशन
132/2 कागज भवन
गली बताशान, चावड़ी बाजार, दिल्ली- 110006
मूल्य- 300 रुपए



और भी पढ़ें :