rose day | एक ''रोज डे'' यह भी
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यह गुलाब बहाना है उन्हें हिम्मत देने का, प्यार देने का, उन्हें विश्वास दिलाने का कि कैंसर अंत नहीं बल्कि शुरुआत है जिंदगी की जंग जीतने की। अधिकांश लोग कैंसर का नाम सुनते ही इसे जिंदगी का अंत मान लेते हैं। मगर सच तो यह है कि 'हिम्मत' ही इस बीमारी को हरा सकती है...और यदि विश्वास न हो तो आजमा के देख लीजिए, आप जितना अधिक विश्वास रखते जाएँगे यह बीमारी आपसे उतनी ही दूर भागती जाएगी।
'रोज डे' मनाने के पीछे भी एक ऐसी शख्सियत की हिम्मत है जिसने डॉक्टरों की घोषणा को भी धता बता दिया। यह शख्सियत भी कोई बड़ी नहीं बल्कि 12 वर्ष की मासूम मिलिन्डा रोज, जिसे वर्ष 1994 में ब्लड कैंसर से पीड़ित पाया गया था। हालाँकि मिलिन्डा का मामला डॉक्टर्स अंतिम समय में पता कर पाए थे इसलिए उन्होंने बताया कि मिलिन्डा अब सिर्फ एक से दो सप्ताह तक ही जीवित रह सकती है।
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... हम इस 'रोज डे' पर उन्हें विश्वास दिलाना चाहते हैं कि यदि वे हिम्मत जुटाएँगे तो इस जिंदगी की जंग को आसानी से जीत लेंगे और दूसरों के लिए प्रेरणा बनेंगे।
