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इन कारणों से 40 पार की महिलाओं को वेट लॉस में होती है परेशानी
why is weight loss so hard during perimenopause: 40 की उम्र के आसपास महिलाओं के लिए वजन कम करना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस उम्र में शरीर कई तरह के हार्मोनल और शारीरिक बदलावों से गुजरता है, जो वजन घटाने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं या मुश्किल बना सकते हैं। आइए उन मुख्य कारणों पर विस्तार से चर्चा करें:
1. पेरीमेनोपॉज (Perimenopause):
यह वह समय है जब महिला का शरीर रजोनिवृत्ति (Menopause) की ओर बढ़ना शुरू करता है, आमतौर पर 40 के दशक के मध्य से शुरू होता है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे प्रमुख महिला हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होता है। एस्ट्रोजन का स्तर कम होने से शरीर में फैट का वितरण बदल सकता है, खासकर पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है, जिसे कम करना मुश्किल होता है।
यह वह समय है जब महिला का शरीर रजोनिवृत्ति (Menopause) की ओर बढ़ना शुरू करता है, आमतौर पर 40 के दशक के मध्य से शुरू होता है। इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे प्रमुख महिला हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होता है। एस्ट्रोजन का स्तर कम होने से शरीर में फैट का वितरण बदल सकता है, खासकर पेट के आसपास चर्बी जमा होने लगती है, जिसे कम करना मुश्किल होता है।
2. एस्ट्रोजन हार्मोन का असंतुलन:
एस्ट्रोजन न केवल प्रजनन स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मेटाबोलिज्म और शरीर में फैट के जमाव को भी प्रभावित करता है। एस्ट्रोजन के स्तर में कमी से इंसुलिन संवेदनशीलता कम हो सकती है, जिससे शरीर के लिए ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है और फैट स्टोरेज बढ़ सकता है।
एस्ट्रोजन न केवल प्रजनन स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह मेटाबोलिज्म और शरीर में फैट के जमाव को भी प्रभावित करता है। एस्ट्रोजन के स्तर में कमी से इंसुलिन संवेदनशीलता कम हो सकती है, जिससे शरीर के लिए ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है और फैट स्टोरेज बढ़ सकता है।
3. मेटाबोलिज्म (Metabolism) का धीमा होना:
उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से मेटाबोलिज्म की दर धीमी हो जाती है। इसका मतलब है कि शरीर आराम करते समय भी कम कैलोरी बर्न करता है। 40 की उम्र के बाद मांसपेशियों का नुकसान भी शुरू हो सकता है, जो मेटाबोलिज्म को और धीमा कर देता है क्योंकि मांसपेशियां फैट की तुलना में अधिक कैलोरी बर्न करती हैं।
उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से मेटाबोलिज्म की दर धीमी हो जाती है। इसका मतलब है कि शरीर आराम करते समय भी कम कैलोरी बर्न करता है। 40 की उम्र के बाद मांसपेशियों का नुकसान भी शुरू हो सकता है, जो मेटाबोलिज्म को और धीमा कर देता है क्योंकि मांसपेशियां फैट की तुलना में अधिक कैलोरी बर्न करती हैं।
4. इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance):
इंसुलिन एक हार्मोन है जो ब्लड शुगर को कोशिकाओं में ऊर्जा के लिए ले जाने में मदद करता है। उम्र बढ़ने, शारीरिक गतिविधि की कमी और हार्मोनल बदलावों के कारण कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो सकती हैं, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ सकता है और शरीर अधिक फैट जमा करने लगता है।
इंसुलिन एक हार्मोन है जो ब्लड शुगर को कोशिकाओं में ऊर्जा के लिए ले जाने में मदद करता है। उम्र बढ़ने, शारीरिक गतिविधि की कमी और हार्मोनल बदलावों के कारण कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो सकती हैं, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। इससे ब्लड शुगर का स्तर बढ़ सकता है और शरीर अधिक फैट जमा करने लगता है।
5. थायरॉइड (Thyroid) की समस्या:
थायरॉइड ग्रंथि मेटाबोलिज्म को नियंत्रित करने वाले हार्मोन का उत्पादन करती है। 40 की उम्र के आसपास महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म (थायरॉइड हार्मोन का कम उत्पादन) की समस्या आम हो सकती है। हाइपोथायरायडिज्म से मेटाबोलिज्म धीमा हो जाता है, जिससे वजन बढ़ना और वजन कम करने में कठिनाई हो सकती है।
थायरॉइड ग्रंथि मेटाबोलिज्म को नियंत्रित करने वाले हार्मोन का उत्पादन करती है। 40 की उम्र के आसपास महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म (थायरॉइड हार्मोन का कम उत्पादन) की समस्या आम हो सकती है। हाइपोथायरायडिज्म से मेटाबोलिज्म धीमा हो जाता है, जिससे वजन बढ़ना और वजन कम करने में कठिनाई हो सकती है।
6. मसल लॉस (Muscle Loss):
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों का स्वाभाविक नुकसान होता है, जिसे सार्कोपेनिया (Sarcopenia) कहा जाता है। मांसपेशियां कैलोरी बर्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए मांसपेशियों का नुकसान मेटाबोलिज्म को धीमा कर देता है और वजन कम करना मुश्किल हो जाता है।
उम्र बढ़ने के साथ मांसपेशियों का स्वाभाविक नुकसान होता है, जिसे सार्कोपेनिया (Sarcopenia) कहा जाता है। मांसपेशियां कैलोरी बर्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए मांसपेशियों का नुकसान मेटाबोलिज्म को धीमा कर देता है और वजन कम करना मुश्किल हो जाता है।
7. कोर्टिसोल हार्मोन (Cortisol Hormone) का स्तर बढ़ना:
तनाव, नींद की कमी और हार्मोनल बदलावों के कारण कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ सकता है। कोर्टिसोल पेट के आसपास फैट जमाव को बढ़ावा दे सकता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ा सकता है, जिससे वजन कम करना मुश्किल हो जाता है।
तनाव, नींद की कमी और हार्मोनल बदलावों के कारण कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर बढ़ सकता है। कोर्टिसोल पेट के आसपास फैट जमाव को बढ़ावा दे सकता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ा सकता है, जिससे वजन कम करना मुश्किल हो जाता है।
8. नींद की कमी:
पर्याप्त नींद न लेने से हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है, खासकर भूख और मेटाबोलिज्म को नियंत्रित करने वाले हार्मोन। नींद की कमी से भूख बढ़ाने वाले हार्मोन घ्रेलिन का स्तर बढ़ जाता है और भूख कम करने वाले हार्मोन लेप्टिन का स्तर कम हो जाता है, जिससे अधिक खाने और वजन बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है।
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