गाँधी और गुरुदेव के बीच हास परिहास

गाँधी जयंती पर विशेष

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एक दूसरे का बेहद सम्मान करने वाले महात्मा गाँधी और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के आपसी संबंधों का एक दिलचस्प पहलू वे मजेदार टिप्पणियाँ हैं जिसमें इन दो महान विभूतियों के उच्च हास्यबोध के साथ-साथ गंभीर चिंतन मनन की झलक मिलती है।

महात्मा गाँधी की महानता पर गुरुदेव को कभी संदेह नहीं था लेकिन उनकी सफलता पर जरूर था। उन्होंने गाँधी की मृत्यु से दस साल पहले कहा था शायद वह (गाँधी) सफल न हों।

मनुष्य को उसकी दुष्टता से मुक्त कराने में वह उसी तरह असफल रहें जैसे बुद्ध रहे, जैसे ईसा रहे। मगर उन्हें हमेशा ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जिसने अपना जीवन आगे आने वाले सभी युगों के लिए एक शिक्षा की तरह बना दिया।

प्रसिद्ध गाँधीवादी कृष्ण कृपलानी लिखित टैगोर की जीवनी के अनुसार एक वाकया 1915 में उस समय हुआ जब महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद शांति निकेतन गए। सुधारवादी गाँधी ने शांतिनिकेतन में तमाम बदलाव और प्रयोग करवाए। गाँधी की पैनी नजरों ने यह भी देख लिया कि गुरुदेव रात्रि के भोजन में मैदे से बनी और देसी घी में तली पूरियाँ (लूची) खाते हैं।

ऐसे में सत्यनिष्ठ गाँधी ने मौका न चूकते हुए गुरुदेव से कहा कि जिन्हें आप मजे से खाते चले जा रहे हैं वह आपके लिए जहर है। इस पर गुरुदेव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया बेशक यह मीठा जहर ही है क्योंकि मैं लगभग आधी सदी से इन्हें खाता चला आ रहा हूँ।

भाषा|
महाकवि टैगोर गाँधी की इस नीति से सहमत नहीं थे कि चरखे से सूत कातना भारत की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने का अचूक नुस्खा है। उन्हें कांग्रेस पार्टी द्वारा सूत कताई का राजनीति लाभ उठाना भी रास नहीं आता था। गाँधी के चरखा कार्यक्रम के लिए खुद को नितांत असमर्थ बताते हुए उन्होंने कहा मैं सूत की बजाय किस्से बेहतर तरीके से कात सकता हूँ।

 

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