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ओ कान्हा !
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देवेंद्र शर्मा कान्हा़, हम सब भूल गए, मुरली की वो तानें। सिंथेनाइजर बजाओ, तो दुनिया तुमको माने।। माना तुमने चराई हैं भाँति-भाँति की गायें। नेता को यदि चरा सको, तो मान तुम्हें हम जाएँ।। रास रचाया यमुना के तट, प्रेम में सब थे डूबे। प्रेम हुआ अब गायब, सबके खतरनाक मँसूबे।। माखन तुमने खाया था, ग्वाल बाल के संग। अब चमचे हैं लगा रहे, माखन बॉस के अंग।। कान्हा, बहतीं अब कहाँ, दूध-दही की नदियाँ।अब तो मदिरा ही मदिया है, यहाँ से लेकर वहाँ।।राधा-सा अब प्रेम कहाँ? ना मीरा-सी भक्ति। भौतिक युग में सबकी है बस, पैसे पर आसक्ति।। गीता का अब ज्ञान कहाँ? कर्म को भूले लोग। क्रोध, मोह, मद, लोभ के, लगे हैं सबको रोग।। सबका जीवन बना है, युद्धभूमि कुरूक्षेत्र। हैं मोहांध धृतराष्ट्र सब, दिखावटी हैं नेत्र।।कान्हा ! हर कोई बना है यहाँ दु:शासन निर्मम। लेकर तुम आ जाओ, 'चीर बढ़ाने वाला सिस्टम।।