सूखे का गहराता संकट

भीषण गर्मी, में देरी और प्री मानसून की कमी ने इस साल देश में सूखे के संकट को गंभीर बना दिया है। आईआईटी, गांधीनगर के वैज्ञानिकों के मुताबिक देश का लगभग आधा हिस्सा सूखे से प्रभावित है और इसमें भी 16 फीसदी इलाके तो भीषण सूखे की मार झेल रहे हैं। इस स्थिति की जानकारी रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए हासिल हुई है।
आईआईटी के एसोसिएट प्रोफेसर विमल मिश्र के मुताबिक देश में सूखे की स्थिति के अध्ययन के लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम उनकी टीम द्वारा चलाया जाता है। इस सिस्टम को आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने ही विकसित किया है। आने वाले सालों में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के चलते सूखे के ज्यादा आसार हैं। इन वैज्ञानिकों ने जमीनी पानी (ग्राउंड वॉटर) के गैरजिम्मेदाराना तरीके से इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए चेतावनी दी है कि अगर हमने ग्राउंड वॉटर के स्रोतों को और नहीं बढ़ाया तथा उन्हें ठीक से नहीं संभाला तो आने वाले सालों में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

ड्राउट अर्ली वार्निंग सिस्टम (ड्यूज) के अध्ययन के मुताबिक भी देश के 44 फीसदी हिस्से कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। दरअसल, इस वर्ष मानसून का आगमन ही 8 दिन की देरी से हुआ है और उसका भारत-यात्रा बहुत ही धीमी गति से आगे बढ़ रही है। साथ ही कई राज्यों में प्री मानसून की बारिश भी सामान्य से काफी कम हुई है जिसकी वजह से भयावह पैदा हो गया है और कृषि पैदावार में भी कमी आने की आशंका गहरा रही है।

दरअसल, इस साल मार्च से मई तक होने वाली प्री मानसून वर्षा में औसत 21 प्रतिशत की कमी आई है। भारतीय विभाग के अनुसार उत्तर-पश्चिम भारत में प्री मानसून वर्षा में 37 फीसदी की, जबकि प्रायद्वीपीय भारत में 39 फीसदी की कमी रही। हालांकि फोनी तूफान की वजह से हुई वर्षा ने मध्य भारत, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में इस कमी की भरपाई कर दी, लेकिन प्रशांत महासागर में अल नीनो की वापसी के अंदेशे से इस बार मानसून के कमजोर होने की आशंका मंडरा रही है।
गैर सरकारी मौसम एजेंसी स्काईमेट के अनुसार, इस साल बारिश के औसत से कम, 93 प्रतिशत ही रहने की उम्मीद है। कुछ समय पहले मौसम विभाग ने 96 प्रतिशत बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त किया था। स्काईमेट के मुताबिक मध्य भारत में सबसे कम, सिर्फ 91 प्रतिशत बारिश होने की संभावना है। वर्ष 2018 में मानसून की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रहने के बावजूद बड़े बांधों में पिछले वर्ष के मुकाबले से 10-15 फीसदी कम पानी है।

केंद्रीय जल आयोग की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले सप्ताह के दौरान देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 27.265 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर) जल संग्रह हुआ। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का मात्र 17 प्रतिशत है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु गंभीर रूप से सूखे का सामना कर रहे हैं। पिछले दिनों चेन्नई के संकट की खबर आई। वहां इसी सप्ताह 4 जलाशय सूख गए और अब बहुत कम मात्रा में पानी बचा हुआ है। संकट दूर करने के लिए वहां एक करोड़ लीटर पानी विशेष ट्रेन के जरिए भेजा जाएगा।

देश के बाकी महानगरों का सूरत-ए-हाल भी बहुत बेहतर नहीं है। बेंगलुरु का भूजल स्तर पिछले 2 दशक में 10-12 मीटर से गिरकर 76-91 मीटर तक जा पहुंचा है। दिल्ली का भूजल भी लगातार कम हो रहा है। महाराष्ट्र पिछले 47 साल का सबसे बड़ा सूखा झेल रहा है। अन्य कई राज्य भी इसकी चपेट में आ गए हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले एक वर्ष में जल संकट की इस समस्या से 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे, वहीं 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी इस गंभीर समस्या की चपेट में होगी।

सच तो यह है कि मौसम में आ रहा बदलाव लगातार हमारे जनजीवन पर गहरा असर डाल रहा है। इस बदलाव को अच्छी तरह समझकर उसके अनुरूप नीतियां बनानी होंगी। वर्ष 2018 बारिश में लगातार कमी का पांचवां साल था। जाहिर है, बारिश में लगातार कमी आती जा रही है। इसे नोटिस में लेने की जरूरत है। हम यह मानकर नहीं बैठ सकते कि हालात कभी बदल भी सकते हैं। सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय का गठन कर यह जताने की कोशिश की है कि वह हालात की गंभीरता को लेकर सचेत है, लेकिन यह एक फालतू की चोंचलेबाजी है, क्योंकि केंद्रीय स्तर पर जल संसाधन मंत्रालय तो पहले से ही अस्तित्व में है।

असल दरकार तो एक ऐसे विशेष तंत्र की है जो मानसून के आकलन और उसके मुताबिक रणनीति तैयार कर सके। राहत के लिए अभी तमाम फौरी उपाय तो किए ही जाने चाहिए, लेकिन कई दीर्घकालीन कदम भी उठाने होंगे। जल प्रबंधन के साथ सूक्ष्म सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी, सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देने के साथ ही पौधारोपण जैसे कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा।

 

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