जम्मू और कश्मीर में क्यों जरूरी है परिसीमन?

केंद्र सरकार में किए जाने पर विचार कर रही है। यदि जम्मू और कश्मीर में परिसीमन हुआ तो राज्य के तीन क्षेत्रों जम्मू, कश्मीर और विधानसभा की सीटों में बदलाव हो जाएगा। इससे जम्मू और कश्मीर की राजनीति में भी बदलाव हो जाएगा। लेकिन सवाल यह उठता है कि जम्मू और कश्मीर में क्यों जरूरी है परिसीमन और वर्तमान परिस्थितियों में क्या यह संभव है?
जम्मू कश्मीर का क्षेत्रफल : जम्मू और कश्मीर के वर्तमान नक्शे को देखें तो यहां का 58 प्रतिशत भू-भाग लद्दाख है, जहां जीरो है। यह क्षेत्र बौद्ध बहुल है। राज्य में 26 प्रतिशत भू-भाग जम्मू का है, जो कि हिन्दू बहुल है। यहां पर भी कोई आतंकवाद नहीं है। अब बच जाती है कश्मीर घाटी जहां का क्षेत्रफल सिर्फ 16 प्रतिशत है और यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। जम्मू और लद्दाख को मिला दें तो 84 प्रतिशत क्षेत्र हिन्दू और बौद्ध बहुल है, जबकि 16 प्रतिशत क्षेत्र मुस्लिम बहुल है। संपूर्ण राज्य की राजनीति पर अब तक 16 प्रतिशत क्षेत्र के राजनीतिज्ञों का ही कब्जा रहा है।
कश्मीर घाटी में 10 जिले हैं जिनमें से 4 जिले ऐसे हैं जहां अलगाववादी और आतंकवादी सक्रिय हैं। ये जिले हैं सोपियां, पुलवामा, कुलगांव और अनंतनाग। इन चार जिलों को छोड़ दें तो संपूर्ण घाटी और जम्मू आतंकवाद और से मुक्त है। लेकिन, संपूर्ण देश में यह भ्रम फैला है कि संपूर्ण जम्मू और कश्मीर जल रहा है।
जम्मू और कश्मीर की जनसंख्‍या : 2002 के विधानसभा चुनाव में कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच मतदाताओं की संख्‍या में सिर्फ 2 लाख का फर्क था। जम्मू में 31 लाख वोटर रजिस्टर्ड थे और कश्मीर एवं लद्दाख को मिलाकर 29 लाख रजिस्टर्ड वोटर थे। कश्मीर और लद्दाख को मिलाकर जब जम्मू में ज्यादा वोटर थे तो फिर भी कश्मीर के हिस्से में ज्यादा विधानसभा सीटें क्यों हैं?

दरअसल, परिसीमन का आधार ही जनसंख्‍या होता है। ज्यादा जनसंख्या वाले क्षेत्र में ज्यादा विधानसभा सीटें होना चाहिए थीं। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। क्यों नहीं हो सका? परिसीमन का मतलब होता है किसी राज्य की सीमा के निर्वाचन क्षेत्र के निर्धारण करने की प्रक्रिया। संविधान में प्रत्येक 10 वर्ष में परिसीमन करने का प्रावधान है।
यदि ऐसा होता तो जम्मू के खाते में ज्यादा सीटें होतीं। मतलब जम्मू का व्यक्ति कहीं मुख्यमंत्री बनता, लेकिन राजनीति के चलते ऐसा हो नहीं सका। ऐसे में ज्यादातर समय राज्य की राजनीति पर अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार का कब्जा रहा।

जम्मू और कश्मीर की विधानभा सीटें : जम्मू और कश्मीर में कुल 111 विधानसभा सीटें हैं। वर्तमान में जम्मू और कश्मीर की विधानसभा में कुल 87 सीटों पर चुनाव होता है, जिसमें से 46 सीटें कश्मीर में, 37 सीटें जम्मू में और 4 सीटें लद्दाख में हैं। 24 सीटें वह हैं जो पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर में हैं, जहां चुनाव नहीं होता है। वर्तमान में 87 विधानसभा सीटों में से बहुमत के लिए 44 सीटों की जरूरत होती है। कश्मीर में 46 सीटें हैं जहां से ही बहुमत पूर्ण हो जाता है।
संविधान के सेक्शन 47 के मुताबिक 24 सीटें खाली रखी जाती हैं। दरअसल, खाली 24 सीटें पाक अधिकृत कश्मीर के लिए छोड़ी गईं थीं। जम्मूवासी चाहते हैं कि ये 24 सीटें जम्मू में जोड़ दी जाएं। 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यहां कुल 37 में से 25 सीटें जीत चुकी है।
कब हुआ था विधानसभा की सीटों का गठन : वर्ष 1947 में जन्मू और कश्मीर का भारत में कानूनी रूप से विलय हुआ था। उस समय जम्मू और कश्मीर में महाराजा हरिसिंह का शासन था। दूसरी ओर कश्मीर घाटी में मुस्लिमों के बीच उस वक्त शेख अब्दुल्ला की लोकप्रियता थी। जबकि महाराजा हरिसिंह की जम्मू और लद्दाख में लोकप्रियता थी। लेकिन शेख अब्दुल्ला पर जवाहरलाल नेहरू का वरदहस्त था इसीलिए नेहरू ने राजा हरिसिंह की जगह शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया।
वर्ष 1948 में शेख अब्दुल्ला को जम्मू और कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद राजा हरिसिंह की शक्तियों को समाप्त कर दिया गया। इसके बाद शेख अब्दुल्ला ने राज्य में अपनी मनमानी शुरू कर दी। 1951 में जब जम्मू और कश्मीर की विधानसभा के गठन
की प्रक्रिया शुरु हुई तो शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर घाटी को 43 विधानसभा सीटें दी, जम्मू को 30 विधानसभा सीटें दी और लद्दाख को सिर्फ 2 विधानसभा सीटें दी गईं। मतलब कश्मीर को जम्मू से 13 विधानसभा सीटें ज्यादा मिली। वर्ष 1995 तक जम्मू और कश्मीर में यही स्थिति रही।

जम्मू और कश्मीर का पहला परि‍सीमन : 1993 में जम्मू और कश्मीर के परि‍सीमन के लिए एक आयोग गठित किया गया। 1995 में परिसीमन की रिपोर्ट को लागू किया गया। पहले जम्मू और कश्मीर की विधानसभा में कुल 75 सीटें हुआ करती थीं, लेकिन परिसीमन के बाद 12 सीटें और बढ़ा दी गईं।
अब विधानसभा में कुल मिलकर 87 सीटें हो गई थीं। इनमें कश्मीर के खाते में 46, जम्मू के खाते में 37 और लद्दाख के खाते में 4 सीटें आईं। इसका मतलब यह कि तब भी कश्मीर घाटी को जम्मू से ज्यादा सीटें मिली हैं। इसका अर्थ यह कि तब भी कश्मीर घाटी में अब्दुल्ला सरकार (मुफ्ती सरकार भी) बनती रही और अब भी।
फारूक अब्दुल्ला सरकार की साजिश : जम्मू और कश्मीर की राजनीति में आज तक कश्मीर का ही दबदबा रहा है। क्योंकि विधानसभा में कश्मीर की विधानसभा सीटें जम्मू के मुकाबले ज्यादा हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि सरकार कश्मीर से और कश्मीर की ही बनती है जम्मू से या जम्मू की नहीं।

कश्मीर में दो परिवार हैं एक शेेख अब्दुल्ला का परिवार और दूसरा मुफ्ती मोहम्मद सईद (महबूबा मुफ्ती) का परिवार। ये दोनों ही परिवार बारी-बारी जम्मू और कश्मीर पर विधानसभा के इसी गणित के आधार पर राज करते रहे हैं। इस राज को आगे भी जारी रखने के लिए ये दोनों ही परिवार नहीं चाहते थे कि कभी परिसीमन हो। इसीलिए उन्होंने हर दस वर्ष में राज्य में परिसीमन कराने को टाला।
इसी सत्ता की साजिश के तहत वर्ष 2002 में की अब्दुल्ला सरकार ने विधानसभा में एक कानून लाकर परिसीमन को वर्ष 2026 तक रोक दिया है। इसके लिए अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू एंड कश्मीर रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट 1957 और जम्मू और कश्मीर के संविधान के सेक्शन 42 (3) में बदलाव किया था। सेक्शन 42 (3) के बदलाव के मुताबिक वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते तब तक विधानसभा की सीटों में बदलाव करने पर रोक रहेगी। वर्ष 2026 के बाद जनगणना के आंकड़े वर्ष 2031 में आएंगे। इसलिए जम्मू और कश्मीर की विधानसभा के विधेयक के अनुसार 2031 तक परिसीमन टल चुका है।
परिसीमन में सबसे बड़ी रुकावट फारूक अब्दुल्ला सरकार का यह विधेयक ही है। हालांकि केंद्र के संशोधन के बावजूद देश के अन्य राज्यों में 2002 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हो चुका है। मगर जम्मू और कश्मीर इससे अछूता है क्योंकि वहां की विधानसभा में मौके का लाभ उठाकर खुद भी यह प्रस्ताव विधानसभा में पास कर दिया।

फारूक अब्दुल्ला सरकार के इस फैसले के खिलाफ जम्मू की पेंथर पार्टी के नेता भीमसिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिक दायर की थी लेकिन 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।
क्यों जरूरी है परिसीमन : जम्मू और कश्मीर में विधानसभा का गणित ऐसा है कि हर परिस्थिति में कश्मीर घाटी पर केंद्रित पार्टियों का ही वर्चस्व रहता है इसके चलता जम्मू और लद्दाख को कभी भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला। यही वजह है कि जम्मू और कश्मीर की राजनीति में मुख्यमंत्री कश्मीर घाटी से ही चुनकर आता रहा है।

कश्मीर घाटी में मुसलमानों की जनसंख्‍या करीब 98 प्रतिशत है। 1989 से 1990 के बीच घाटी से हिन्दुओं को मारकर भगा दिया है जिनका अब वोट डालना लगभग मुश्किल होता है। यही कारण है कि राज्य में बीते 30 वर्षों में नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बगैर किसी की भी सरकार कभी नहीं बन पाई।
विधानसभा में जम्मू की भागीदारी कम होने से जम्मू और लद्दाख के हितों को ताक में रख दिया जाता है। जो भी नियम, कानून या योजना बनती है वो कश्मीर की जनता के लिए बनती है और ऐसे में जम्मू की आवाज को सुनने वाला कोई नहीं है। लेकिन, यदि परिसीमन हुआ तो जम्मू और लद्दाख की विधानसभा सीटें बढ़ जाएंगी और अगर ये बढ़ गईं तो विधानसभा में जम्मू और लद्दाख का भी वर्चस्व रहेगा। ऐसे में अब्दुल्ला और मुफ्‍ती परिवार की राजनीति लगभग खत्म हो जाएगी। साथ ही अलगाववादी शक्तियां भी कमजोर हो जाएंगी और जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रवादी शक्तियां बढ़ जाएंगी।

 

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