क्रांतिदूत चे गेवारा के घर में

-ओम थानवी

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पूर्वी यूरोप और रूस के साम्यवाद को वे पूंजीवादी तौर-तरीकों से रचा जाने वाला समाजवाद कहते थे। इस पर फिदेल से शायद कुछ रार हुई। एक रोज चुपचाप भेष बदल कर संघर्ष के उसी रास्ते पर दुबारा चल निकले। कोंगो। फिर बोलिविया। घने जंगलों में साधनहीन, खस्ताहाल। इस दफा नेतृत्व में अकेले थे। हिंसक संघर्ष के लिए किसानों का साथ उन्हें हासिल नहीं हुआ। पकड़े और मारे गए। 1967 में, महज उनतालीस वर्ष की उम्र में।

बरसों बाद, रूस के पतन की पृष्ठभूमि में, फिदेल कास्त्रो ने कहा कि चे में विलक्षण दूरदृष्टि थी। कास्त्रो ने माना, चे का सुझाव नकार कर उन्होंने भूल की कि क्यूबा को अपनी तरह के साम्यवाद की जरूरत है।

खास बात यह है कि 1959 में क्रांति के ठीक छह महीने बाद चे गेवारा भारत आए थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर। दिल्ली-कलकत्ता ही नहीं, उन्होंने गांवों का दौरा भी किया। लेकिन देश में भारी दौड़-धूप के बावजूद भी मुझे चे की उस यात्रा का कोई अधिकृत ब्योरा कहीं से हासिल नहीं हुआ।
उस ब्योरे की खोज में दिलचस्प शख्सियत वाले एक क्रांतिकारी की चौखट पर पांव धरने मैं जरूर जाता। क्या बारिश। क्या तूफान।

दरअसल बारिश तो वहीं शुरू हो गई थी, जब हम हवाना (वहां अवाना) के मशहूर ‘क्रांति चौक’ पर थे। चौक पर क्यूबा के पहले क्रांतिकारी और कवि होसे मार्ती का स्मारक है, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी के अंत में स्पेन के राज और अमेरिकी उपनिवेशवाद दोनों के खिलाफ लड़ते हुए जान दी। सामने उस इमारत पर चे गेवारा का विराट भित्तिचित्र बना है जिसमें कभी उनका दफ्तर था। बीच में पक्का मैदान है, जो फिदेल कास्त्रो के जोशीले भाषणों के लिए सब दूर जाना जाता है।
बौछारों से सने पांच भारतीय लेखक-पत्रकारों की दशा देखकर स्थानीय सहयोगी नेल्सन ने पूछा था, क्या होटल लौट चलें? मैंने कहा, अगर चे का घर होटल से आगे पड़ता हो तो। वरना चे के घर।

नेल्सन को मैंने ही इस जिम्मे लगाया था। मुझे चे अध्ययन संस्थान जाना था। वहीं चे का घर है, जहां वे फिदेल के मंत्री के नाते रहते थे। संस्थान का काम चे का बड़ा बेटा कामीलो देखता है। नेल्सन ने कामीलो से बात की। संयोग था कि अगले रोज, चौदह जून को, चे का जन्मदिन था। कामीलो इसी सिलसिले में एक समारोह में शिरकत के लिए अर्जेंटीना (अर्हेंतीना) जा रहे थे। मैंने कहलाया कि चे की भारत यात्रा के संबंध में कुछ जिज्ञासा है, उन्हें मेरी मदद करनी चाहिए। और कामीलो ने अगले रोज दफ्तर हमारे लिए खुलवा दिया था।
नेल्सन ने गाड़ी मुख्य सड़क के बाएं शहर के आधुनिक वेदादो इलाके की तरफ मुड़वा दी। अगली ही घड़ी हम उस शानदार इमारत के सामने थे, जिसके बाहर तीन बड़े अक्षरों में चे लिखा था- ठीक वैसे जैसे चे अपने दस्तखत करते थे।

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