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Written By मनीष शर्मा

फैलाएँ नहीं, फहराएँ हाथ

सूरदास जयंती हाथ
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सूरदास के सैकड़ों शिष्य थे, जो उन्हें गायक महात्मा कहते थे। अनेक कठिनाइयाँ उठाकर सूरदास ने यह मुकाम हासिल किया था। अंधे होने की वजह से बचपन से ही उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता था। जब उन्होंने पढ़ने की इच्छा व्यक्त की तो उनके पिता ने यह कहकर भगा दिया कि अंधे को क्या पढ़ाऊँगा। इससे वे बेहद निराश हो गए।

एक बार गाँव से एक साधु मंडली भजन गाती-बजाती निकली। संगीत में उन्हें इतना आनंद आया कि वे बेसुध होकर उसके पीछे-पीछे चल दिए। इसके बाद वे घर नहीं लौटे। एक दिन जब सूरदास अपनी कुटिया में बैठे थे, तभी एक शिष्य ने आकर सूचना दी कि महाप्रभु वल्लभाचार्य वृंदावन जाने वाले हैं। उस समय के सभी विद्वानों में महाप्रभु शीर्ष पर थे।

इस पर उदास होकर सूरदास बोले कि काश, मेरी महाप्रभु से भेंट हो पाती। इस बीच एक और शिष्य आकर उनसे बोला- महाप्रभु आपसे भेंट करने कुटिया की ओर ही आ रहे हैं। सूरदास बोले- पागल हो गया है क्या?
  सूरदास के सैकड़ों शिष्य थे, जो उन्हें गायक महात्मा कहते थे। अनेक कठिनाइयाँ उठाकर सूरदास ने यह मुकाम हासिल किया था। अंधे होने की वजह से बचपन से ही उनके साथ उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाता था। जब उन्होंने पढ़ने की इच्छा व्यक्त की।      


इतना बड़ा विद्वान मुझ जैसे तुच्छ प्राणी से मिलने क्यों आएगा? वे कहीं और जा रहे होंगे। तभी महाप्रभु वहाँ पहुँच गए। सूरदास को विश्वास ही नहीं हो रहा था। वे भाव-विभोर होकर गिरते-गिराते उनकी अगवानी के लिए बाहर आए और उनके पैरों में गिर पड़े।

आचार्य ने उन्हें उठाकर प्यार से गले लगा लिया और बोले- तुम्हारे गायन की बड़ी प्रशंसा सुनी है। तुम्हारा गायन सुनने की इच्छा हुई तो चला आया। सूरदास बोले- क्यों अंधे का दिल रख रहे हो महाप्रभु। थोड़ा-बहुत ऐसे ही गा लेता हूँ।

अपाहिज हूँ ना, इससे ज्यादा और कुछ सीखा ही नहीं। महाप्रभु बोले- तुम अपने आपको असहाय मानना बंद करो। तुम्हें यह घिघियाने की आदत छोड़ना होगी। तुम किसी से कम नहीं हो। अपनी कमियों से ध्यान हटाकर अपने गुणों को पहचानो।

तुम कृष्णभक्ति को नए आयाम देने के लिए पैदा हुए हो। महाप्रभु की बातों से सूरदास को तो जैसे रोशनी मिल गई। वे बोले- लेकिन मुझे कृष्ण की लीलाओं का ज्ञान नहीं। महाप्रभु ने कहा- वह मैं तुम्हें बताऊँगा। इसके बाद उन्होंने गुरु-मंत्र देकर सूरदास को अपना शिष्य बना लिया। सूरदास ने इसके बाद कभी अपने आपको असहाय नहीं माना और मन की आँखों से देखकर कृष्ण लीलाओं का वर्णन किया।

दोस्तो, आप कितने ही कमजोर क्यों न हों, अपने आपको कभी लाचार या असहाय न समझें, क्योंकि यदि आपके दिमाग में यह बात बैठ गई कि आप कमजोर हैं तो फिर आप कभी कुछ नहीं कर पाएँगे। आप एक लाचार की तरह व्यवहार करेंगे। यह एक ऐसा भाव है जो अच्छे-भले इंसान को भी अपाहिज बना देता है।

इसलिए कहा भी गया है कि मन से अपाहिज होने से अच्छा है तन से अपाहिज होना। तन से अपाहिज होने के बाद भी लोग बड़ी-बड़ी सफलताएँ हासिल कर लेते हैं, जैसे कि संत सूरदास ने आँखें न होने के बाद भी कृष्ण लीलाओं का इतना सुंदर चित्रण करके प्राप्त की, लेकिन यदि आप मन से अपाहिज हो गए तो फिर कुछ भी करने के काबिल नहीं रहेंगे।

इसलिए कभी विवशताओं को अपने ऊपर हावी न होने दें और न ही उनसे भागें, क्योंकि आप उनसे भाग नहीं सकते। इसलिए बेहतर यह है कि उन पर विजय पाओ। दूसरी ओर, यदि आप शारीरिक रूप से अपंग हैं, तो भी क्या हुआ। अपंगता नियति हो सकती है, लेकिन इति कभी नहीं।

ऐसे में अपने आपको कमजोर न समझें, क्योंकि ईश्वर यदि आप में कोई कमी रखता है तो ऐसे गुण भी देता है, जो सामान्य लोगों में नहीं होते। जरूरत है अपने अंदर छुपे उन गुणों को पहचानने की। जब पहचान लेंगे तो कभी अपने आपको दीन, निर्बल, लाचार और असहाय नहीं समझेंगे। ऐसे अनेक लोग समाज में आपको मिल जाएँगे, जिन्होंने अपनी कमजोरी को ही अपना हथियार बनाया।

आज वे दूसरों का सहारा लेने की जगह दूसरों के सहारे बने हुए हैं। और अंत में, शनिवार को सूरदास जयंती थी। इस अवसर पर आप प्रण करें कि आप किसी भी स्थिति में किसी के सामने हाथ फैलाएँगे नहीं। अपनी कमी को ही अपना हथियार बनाकर विपरीत परिस्थितियों पर विजय पाएँगे और सफलता का हाथ फहराएँगे। अरे भई, दिमाग का इस्तेमाल करो। वह काम करना बंद कर देगा, तो कहीं के नहीं रहोगे।
लेखक के बारे में
मनीष शर्मा