ऐसा हो अंत जो अनंत तक रहे याद
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मनीष शर्माश्रावस्ती नगर की कृशा गौतमी के एक वर्षीय बच्चे की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन वह इसे मानने को तैयार नहीं थी। सभी ने उसे बहुत समझाया कि तेरा बेटा मर चुका है, लेकिन वह नहीं मानी। वह बच्चे को लेकर यह कहते हुए घर से निकल गई कि कोई न कोई इसे जीवित कर ही देगा। उसने कई वैद्यों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन हर जगह उसे निराशा ही मिली। अंत में एक व्यक्ति उसे महात्मा बुद्ध के पास ले गया। वह बोली- प्रभु, कृपया मेरे पुत्र को जीवित कर इस दुखियारी पर उपकार करें। इस पर बुद्ध बोले- तुम्हारे पुत्र को जीवित करने के लिए मुझे चुटकी भर सरसों चाहिए। तुम किसी ऐसे घर से सरसों लेकर आओ, जहाँ कभी किसी की मृत्यु न हुई हो।वह अपने बच्चे को छाती से लगाए सरसों लेने निकल पड़ी। बहुत भटकने के बाद भी उसे ऐसा कोई घर नहीं मिला, जहाँ किसी की मौत न हुई हो। धीरे-धीरे उसे यह बात समझ में आने लगी कि जो मर जाता है, उसका कोई इलाज नहीं हो सकता। वह व्यर्थ की खोज में लगी है। वह निराश-हताश होकर बुद्ध के पास पहुँची। बुद्ध ने उससे पूछा- क्या तुम्हें कहीं से सरसों मिली? उसने सिर हिलाकर मना कर दिया। बुद्ध बोले- केवल तुम ही ऐसी नहीं हो जिसका बेटा इस दुनिया से विदा हो गया। सभी इस दुःख से गुजरे हैं। इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम होनी को स्वीकार करो। बात कृशा की समझ में आ गई और बालक का अंतिम संस्कार कराने के बाद वह भिक्षुणी बन गई।दोस्तो, कहते हैं जिसका आरंभ होता है, उसका अंत भी निश्चित है। ऐसे ही जो पैदा हुआ है, उसकी मृत्यु भी तय है। किसी फ्रांसीसी दार्शनिक ने कहा भी है कि हम अपने जन्म के दिन से जीना शुरू करते हैं तो मरना भी। यानी व्यक्ति के जन्म के साथ ही उसकी मृत्यु भी जन्म लेती है और जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, वह भी बड़ी होती जाती है और एक तय समय के बाद वह उसे सताने लगती है।
तब ऐसे में कुछ लोग उससे भयग्रस्त होकर निष्क्रिय हो जाते हैं और कुछ लोग उस मृत्यु को ही भयभीत कर देते हैं। मृत्यु को भय लगता है हँसी से। जो व्यक्ति हँसी-खुशी जीवन को जीना जानता है, तनावों को अपने पास फटकने भी नहीं देता, उसे मृत्यु का भय नहीं रहता और वह भरपूर जीवन जीता है।हम देखते हैं कि बहुत से लोग मरकर भी अमर हो जाते हैं क्योंकि मौत उन्हें नहीं मार पाती बल्कि वे मौत को मार देते हैं यानी हँसते-हँसाते, खुशियाँ लूटते-लुटाते दुनिया से विदा हो जाते हैं। इसलिए कभी भी कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, भय के साये में न जिएँ। जब अंत निश्चित है तो क्यों न ऐसा अंत हो जो अनंत समय तक लोगों को याद रहे, उन्हें प्रेरणा देता रहे। अंत उसी का अच्छा है, जिसकी कमी लोगों को खले, न कि उसकी उपस्थिति। इसलिए बेहतर यही है कि ऐसा कुछ कर गुजरो कि गुजरकर भी न गुजर पाओ। इसलिए केवल शुरुआत ही अच्छी नहीं होनी चाहिए, अंत भी अच्छा होना जरूरी है। यह बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है, चाहे वह व्यक्तिगत हो या व्यावसायिक। दूसरी ओर, जीवन में आना-जाना लगा रहता है। आज कोई हमें छोड़कर जा रहा है तो कल कोई नया नई उम्मीदें लेकर हमारे पास आएगा भी। इसलिए कभी उम्मीद मत छोड़ो, क्योंकि यही हमें जीने के लिए प्रेरित करती है। जैसे आप हर गुजरते साल की विदाई और नए साल का स्वागत खुशी-खुशी करते हैं, वैसी ही सोच जीवन को लेकर अपनाएँ तो बात ही बन जाए।