बुड्ढा मर गया
निर्माता : राहुल रवैल - सुनील लुल्ला
निर्देशक : राहुल रवैल
संगीत : बप्पी लहरी
कलाकार : परेश रावल, अनुपम खेर, ओमपुरी, राखी सावंत, रणवीर शौरी, मुकेश तिवारी
पैसों के पीछे भागने वाले इनसान की लालच का कभी अंत नहीं होता। हजारों-करोड़ों रुपए होने के बावजूद पेट नहीं भरता। ‘बुड्ढा मर गया’ में यही दिखाया गया है, मगर व्यंग्यात्मक तरीके से।
लक्ष्मीकांत कबाडि़या नाम थोड़ा लंबा है, इसलिए सब उन्हें एलके कहते हैं। उनकी गिनती भारत के अमीर लोगों में होती है। एलके खुद की मेहनत से आज इस मकाम तक पहुँचे हैं। कबाड़े के धंधे से इन ऊँचाइयों तक पहुँचना हर किसी के बस की बात नहीं है। वे बाजार से अपनी कंपनी के लिए पाँच हजार करोड़ रुपए एकत्रित करने वाले हैं और उनका आईपीओ आने वाला है।
बात की जाए एलके के परिवार की। अविवाहित बहन प्रेरणा के अलावा एलके के दो बेटे रंजीत और समीर हैं। दो बहुएँ श्रुति और अंजू हैं। संजना और नम्रता रंजीत की दो बेटियाँ हैं। जबकि समीर का एक बेटा पवन है। इन सबकी पैसों को देखकर लार टपकती रहती है।
लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। आईपीओ खुलने की पूर्व रात्रि में एलके भगवान को प्यारा हो जाता है। एलके के परिवार वाले घबरा जाते हैं। उन्हें गम इस बात का नहीं रहता कि उनके प्यारे एलके अब दुनिया में नहीं रहे, बल्कि इस बात का रहता है कि उनके शेयर में लोग पैसा नहीं लगाएँगे।
ऐसे समय विद्युत बाबा परिवार वालों को एक युक्ति सुझाते हैं। वे कहते हैं कि दो दिन तक एलके की मौत की बात घर से बाहर न जाने पाए। दो दिन बाद जब लोग उनके शेयर खरीद लेंगे तब एलके की मृत्यु के बारे में दुनिया को बताया जाएगा। विद्युत बाबा की बात में सभी को दम नजर आता है।
अब एलके जैसी बड़ी और प्रसिद्ध हस्ती की मौत की खबर छिपाना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन वे कामयाब हो जाते हैं। बाद में जब वे एलके की मृत्यु का राज खोलने वाले होते हैं, तब परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हो जाती हैं कि उन्हें कुछ दिनों के लिए अपना मुँह बंद रखना पड़ता है। वे एलके के एक झूठे दोस्त की मृत्यु की घोषणा करते हैं और इस बहाने एलके का अंतिम संस्कार कर देते हैं।
धीरे-धीरे कुछ खोजी पत्रकार घर के लालची नौकर, लाश मुहैया कराने वाला ये राज जान जाते हैं। परिवार में भी इस मसले को लेकर झगड़ा होने लगता है। ये तमाम उठापटक को निर्देशक राहुल रवैल ने किस रोचक अंदाज में पेश किया है, ये फिल्म ‘बुड्ढा मर गया’ देखकर पता चलेगा।
निर्देशक : राहुल रवैल
संगीत : बप्पी लहरी
कलाकार : परेश रावल, अनुपम खेर, ओमपुरी, राखी सावंत, रणवीर शौरी, मुकेश तिवारी
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लक्ष्मीकांत कबाडि़या नाम थोड़ा लंबा है, इसलिए सब उन्हें एलके कहते हैं। उनकी गिनती भारत के अमीर लोगों में होती है। एलके खुद की मेहनत से आज इस मकाम तक पहुँचे हैं। कबाड़े के धंधे से इन ऊँचाइयों तक पहुँचना हर किसी के बस की बात नहीं है। वे बाजार से अपनी कंपनी के लिए पाँच हजार करोड़ रुपए एकत्रित करने वाले हैं और उनका आईपीओ आने वाला है।
बात की जाए एलके के परिवार की। अविवाहित बहन प्रेरणा के अलावा एलके के दो बेटे रंजीत और समीर हैं। दो बहुएँ श्रुति और अंजू हैं। संजना और नम्रता रंजीत की दो बेटियाँ हैं। जबकि समीर का एक बेटा पवन है। इन सबकी पैसों को देखकर लार टपकती रहती है।
लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। आईपीओ खुलने की पूर्व रात्रि में एलके भगवान को प्यारा हो जाता है। एलके के परिवार वाले घबरा जाते हैं। उन्हें गम इस बात का नहीं रहता कि उनके प्यारे एलके अब दुनिया में नहीं रहे, बल्कि इस बात का रहता है कि उनके शेयर में लोग पैसा नहीं लगाएँगे।
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अब एलके जैसी बड़ी और प्रसिद्ध हस्ती की मौत की खबर छिपाना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन वे कामयाब हो जाते हैं। बाद में जब वे एलके की मृत्यु का राज खोलने वाले होते हैं, तब परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हो जाती हैं कि उन्हें कुछ दिनों के लिए अपना मुँह बंद रखना पड़ता है। वे एलके के एक झूठे दोस्त की मृत्यु की घोषणा करते हैं और इस बहाने एलके का अंतिम संस्कार कर देते हैं।
धीरे-धीरे कुछ खोजी पत्रकार घर के लालची नौकर, लाश मुहैया कराने वाला ये राज जान जाते हैं। परिवार में भी इस मसले को लेकर झगड़ा होने लगता है। ये तमाम उठापटक को निर्देशक राहुल रवैल ने किस रोचक अंदाज में पेश किया है, ये फिल्म ‘बुड्ढा मर गया’ देखकर पता चलेगा।
