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जाने तू... या जाने ना

जाने तू... या जाने ना
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निर्माता : मंसूर खान, आमिर खान
निर्देशक : अब्बास टायरवाला
संगीत : ए.आर. रहमान
कलाकार : इमरान खान, जेनेलिया, मंजरी, अयाज़ खान, करण माखीजा, सुगंधा गर्ग, निराव मेहता, अनुराधा पटेल, रत्ना पाठक शाह

‘जाने तू... या जाने ना’ एक ऐसी प्रेम कहानी है, जिसमें सुख-दु:ख, दिल का टूटना, हँसी के ठहाके, गाने और मारपीट भी हैं। फिल्म के नायक हैं जयसिंह राठौर (इमरान खान) और नायिका अदिति महंत (जेनेलिया)।

इन दोनों को देख ऐसा लगता है कि दोनों की जोड़ी स्वर्ग के किसी पेस्ट्री शॉप में बनाई गई है। जय एक ऐसा राजपूत है, जो हिंसा पर यकीन नहीं रखता। जय के विपरीत अदिति बहुत ही अधीर और हिंसक है। आप कुछ भी कीजिए पर उससे पंगा मत ‍लीजिए। वह आपको नोंच डालेगी। आप पर गालियों की बौछार भी हो सकती है। यह नोंचना-खसोटना तब तक जारी रहेगा, जब तक कि जय नहीं आ जाता। जय एकमात्र व्यक्ति है, जो इस जंगली बिल्ली को काबू में ला सकता है।

अदिति के इस व्यवहार में जय को उसकी कोई गलती नजर नहीं आती। वह उसके माता-पिता को दोषी मानता है। बचपन से ही वे उसे काबू में रखते तो बात यहाँ तक नहीं पहुँचती।

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जय के अहिंसक व्यवहार से अदिति बिलकुल भी प्रभावित नहीं है। उसके अनुसार वह अब तक जितने भी लोगों से मिली है उनमें जय सबसे बड़ा डरपोक है। सेब और संतरे जैसे दोनों के अलग-अलग स्वभाव हैं।

कहानी में कुछ पेंच भी हैं। रोतलू मन ही मन अदिति के लिए रोता है। बॉम्बस् का दिल जय के लिए धड़कता है। जिग्गी और शालीन के भी अपने किस्से हैं।

चलिए, लौटते हैं जय और अदिति की कहानी की तरफ। दोनों में भले ही ढेर सारे अंतर हों, लेकिन उनकी जोड़ी ‘मेड फॉर इच अदर’ लगती है। यह बात उनके सारे दोस्त जानते हैं। उनके माता-पिता जानते हैं। सब जानते हैं। लेकिन क्या यह बात जय और अदिति जानते हैं?

क्या दो लोग अपने दिल का राज जान सकते हैं? वे कैसे ये जानेंगे कि दिल की बात सच है? उन्हें कैसे पता चलेगा कि ये प्यार है?

म्यूजिकल-रोमांटिक-कॉमेडी से भरी ‘जाने तू... या जाने ना’ में इन मौज-मस्ती से भरे प्रसंगों को दिखाया गया है।


पात्र परिचय
जयसिंह राठौर (इमरान खान)
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जय की जड़ें राजस्थान में हैं। उसके पिता बचपन में ही गुजर गए थे। उसकी मम्मी सावित्री ने उसे बड़ा किया। जय के पिता के गुजरने के बाद सावित्री राजस्थान छोड़ मुंबई आ गईं। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और मनुष्य के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ती हैं।

सावित्री का मानना है कि भारतीय माताएँ उनके पुत्रों को बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार होती हैं। जय को उन्होंने उतना ही लाड़-प्यार दिया, जितना जरूरी था। ब्रेकफास्ट बनाने से लेकर कपड़े धोने तक का काम जय अपने हाथों से करता है।

जय और उसकी मम्मी के बीच एक दोस्ताना और मजबूत रिश्ता है। वे एक-दूसरे की निजता को भी महत्व देते हैं।

जय की जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है अदिति। पहली मुलाकात के बाद ही दोनों अच्छे दोस्त बन गए। दोनों को अलग-अलग किसी ने नहीं देखा। जब वे साथ नहीं होते, तो फोन पर एक-दूसरे से बात कर रहे होते हैं।


अदिति महंत (जेनेलिया)
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बातों ही बातों में अदिति ने एक दिन जय से कहा था कि जब वह छोटी बच्ची थी, तब उसके दोस्त उसे ‘काली बिल्ली’ कहकर परेशान करते थे। जय ने इसमें थोड़ा-सा सुधार कर दिया और उसे ‘म्याऊँ’ का नाम दिया। जय को छोड़ कोई भी उसे इस नाम से पुकारे तो अदिति उसकी जान भी ले सकती है।

अदिति जिंदगी का पूरा मजा लेती है। वह आसानी से हँसती है, रोती है और गुस्सा नाक पर चढ़ा रहता है। उसे ‘टॉमबाय’ समझने की गलती मत कीजिएगा। वह बहुत आकर्षक है। ‍अदिति से बात करना आसान नहीं है। उसका दोस्त बनना बेहद मुश्किल है। अफेयर की तो बात ही छोडि़ए। दुनिया वाले आश्चर्य करते हैं कि अदिति के साथ इतने दिन रहने के बावजूद जय जिंदा कैसे है?

एक बात तय है, किसी ने भी जय को परेशान किया तो अदिति के रूप में उसका एक खतरनाक दुश्मन पैदा हो जाता है।
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें