नेशनल गर्ल चाइल्ड डे: बॉलीवुड की वो फिल्में, जिन्होंने बदली 'बेटी' को लेकर सोच
कुछ फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि समाज की जमी-जमाई सोच को चुनौती देती हैं। हिंदी सिनेमा की इन खास फिल्मों ने बेटी को बोझ या कमज़ोरी के रूप में देखने वाली मानसिकता को तोड़कर उसे आत्मविश्वास, साहस और आत्मनिर्भरता की पहचान दी।
इन कहानियों ने परदे के ज़रिए घर-घर यह संदेश पहुंचाया कि बेटियां सीमाओं में बंधने के लिए नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने के लिए बनी हैं। तो आइए नेशनल गर्ल चाइल्ड डे पर एक नज़र डालते हैं बॉलीवुड की उन चुनिंदा फिल्मों पर, जिन्होंने बेटी को सहानुभूति का पात्र नहीं, बल्कि विश्वास और अवसर की हक़दार के रूप में प्रस्तुत किया और बता दिया कि बेटी सिर्फ भविष्य नही, बल्कि वर्तमान और परिवर्तन की सबसे बड़ी ताक़त है।
दंगल
यह फिल्म इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह बेटियों को शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत दिखाती है। गीता और बबीता फोगाट की कहानी समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर बराबर के मौके और समर्थन मिले, तो बेटियां भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं।
मर्दानी
यह फिल्म इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह महिला पुलिस अफ़सर को सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि नैतिक साहस और नेतृत्व की मिसाल बनाती है। शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार यह साबित करता है कि कानून की रक्षा करने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने में बेटी किसी से कम नहीं।
गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल
यह फिल्म इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह सामाजिक पूर्वाग्रहों के बीच एक बेटी के सपनों की उड़ान को दिखाती है। गुंजन सक्सेना की यात्रा हर उस लड़की के लिए प्रेरणा है, जो यह सुनकर बड़ी होती है कि “यह लड़कियों का काम नहीं है।”
नीरजा
यह फिल्म इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह साहस को किसी हथियार या ताक़त से नहीं, बल्कि इंसानियत और निस्वार्थ बलिदान से जोड़ती है। नीरजा भनोट का किरदार एक बेटी को असली नायिका के रूप में स्थापित करता है, जिसने दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
मिमी
यह फिल्म इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह मातृत्व को ग्लैमर से दूर, एक सोच-समझकर लिया गया निर्णय दिखाती है। मिमी का किरदार यह बताता है कि एक युवा लड़की भी अपने फैसलों की ज़िम्मेदारी उठाने और समाज की राय से ऊपर उठकर अपने आत्मसम्मान को चुनने का साहस रखती है।