सबसे सुंदर... मधुबाला

मुमताज हुई अनारकली!
प्रेम और सौंदर्य की देवी वीनस के नाम से जानी जाने वाली मधुबाला कच्ची उम्र में ही नायिका बन गईं। न्यू ओरियेंटल फिल्म कंपनी अपनी पहली फिल्म 'नीलकमल' की तैयारी कर रही थी। इस फिल्म की मुख्‍य ‍भूमिका अभिनेत्री बेगम पारा और कमल चटर्जी निभाने वाली थी। कमला चटर्जी और केदार शर्मा ने गुपचुप शादी रचा ली थी।
 
बीमारी के कारण जब कमला चटर्जी का अभिनय करना संभव नहीं हुआ, तब मृत्यु पूर्व उन्होंने केदार शर्मा से वचन लिया कि 'नीलकमल' में उनकी भूमिका बेबी मुमताज करेगी। इस बीच चंदूलाल शाह ने केदार शर्मा से पूछा‍ कि फिल्म के कलाकार कौन हैं? उन्होंने जवाब दिया - राजकपूर, बेगम पारा और मुमताज।'
 
चंदूलाल शाह समझे उस जमाने की मशहूर मुमताज शांति को फिल्म में लिया गया है। बाद में जब सचाई सामने आई तो आगबबूला हो उठे। बोले - 'केदार तुम्हारा दिमाग खराब है। बच्ची को अभिनेत्री बनाओगे? तुमने मुझे धोखा दिया है।'  केदार शर्मा ने कहा - 'मेरा विश्वास करो, वह यह भूमिका निभा लेगी।' 'तुम्हारा विश्वास गया भाड़ में, तुम अभी मुझे पचहत्तर हजार रुपए वापस करो' चंदूलाल चीखे।
 
केदार शर्मा ने गहने और कीमती वस्तुएँ गिरवी रखकर पैसा चुकाया और कंपनी से हमेशा के लिए अलग हो गए। उन्होंने अपने दम पर 'नीलकमल' बनाई। बेबी मुमताज का नायिका के रूप में अभिनय सराहा गया। मधुबाला बनने के बाद उनकी पहचान बनी फिल्म 'महल' से। 'महल' और 'नीलकमल' के बीच यानी 1946 से 1949 तक वे मेरे भगवान, इम्तिहान, चित्तौड़ विजय, दिल की रानी, अमर प्रेम अर्थात राधाकृष्ण, पराई आग, अपराधी, लाल दुपट्‍टा, सिंगार, पारस तथा नेकी और बदी फिल्मों में नायिका बनकर आई थीं।
 
मुमताज से मधुबाला होने के पीछे भी मतभेद हैं। कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म 'इम्तिहान' के मोहन सिन्हा ने उन्हें यह नाम दिया, जबकि कुछ के अनुसार इंदौर के कवि हरिकृष्ण प्रेमी ने उन्हें इस नाम से नवाजा। 'महल' में अभिनेता अशोक कुमार के साथ वे एक माली की खूबसूरत बेटी के रूप में आईं जो प्रेतात्मा बनकर नायक को डराती है। रहस्य, रोमांच और कर्णप्रिय संगीत से सजी यह फिल्म सुपरहिट रही। फिल्म का गाना- 'आएगा.. आने वाला' खासा लोकप्रिय हुआ। लता मंगेशकर की पसंद के दस गानों में यह शुमार है। 
 
इसके बाद मधुबाला ने अपने अभिनय और सौंदर्य के ऐसे-ऐसे करिश्मे पेश किए कि केदार शर्मा से नकद 75 हजार रुपए वापस माँगने वाले चंदूलाल शाह भी मजबूर हो गए उनका लोहा मानने के लिए। यहाँ तक कि उन्होंने 'मधुबाला' के नाम से फिल्म ही बना डाली। 
 
'फागुन' में जब मधुबाला थिरकीं 'इक परदेसी मेरा दिल ले गया, जाते-जाते मीठा-मीठा गम दे गया' तो थियेटर में दर्शक झूम उठे। 'मिस्टर एंड मिसेज 55' में जब उन्होंने परदे पर गाया - 'ठंडी हवा काली घटा आ ही गई झूम के' तो भारतीय दर्शक एक मीठी बयार के नशे में होश खो बैठे।
 
जब देवआनंद को परदे पर रिझाया - 'अच्छा जी, मैं हारी चलो मान जाओ ना' तो कहीं से भी वे हारी हुई नहीं बल्कि अभिनय के सारे गढ़ जीती हुई प्रतीत हुईं। 'चलती का नाम गाड़ी' में किशोर कुमार ने उन पर गाया - 'एक लड़की भीगी भागी-सी', तब उस नटखट और उत्तेजक गीत के साथ मधुबाला का अंग-प्रत्यंग मुस्कुराता नजर आया। 'मुगले आजम' की अनारकली बनकर शायद लौट भी आए लेकिन मधुबाला कभी लौट सकेंगी, इस पर कोई विश्वास नहीं करेगा।
 
प्यार किया तो डरना क्या... 
स्मृतियाँ जिसकी इतनी सुगंधित हैं, वह स्वयं कितना मलयानील होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। जिन नायकों ने उस तराशी हुई चंदन प्रतिमा के संग अभिनय किया, वे फिर कभी उस सम्मोहन से बाहर नहीं आ सके। नीली आँखों वाले, भोले-भाले राज कपूर के साथ 'नीलकमल' से शुरुआत की।
 
चित्तौड़ विजय/दिल की रानी/अमर प्रेम और दो उस्ताद फिल्मों में यह जोड़ी आई। उस समय के हॉट हीरो अशोक कुमार के साथ आई 'महल' से मधुबाला के करियर में आकर्षक उठाव आया। फिल्म 'निशाना', 'एक साल', और 'हावड़ा ब्रिज' में इस जोड़ी का अभिनय खासा सराहा गया। सदाबहार देव आनंद और ट्रेजडी किंग के साथ उन्हें दर्शकों ने खूब पसंद किया। 
 
दरअसल, यह मधुबाला का रेशमी व्यक्तित्व था कि वे हर हीरो के साथ अपना अभिनय इस सुघड़ता से बुनती थीं कि ताना-बाना अलग करना मुश्किल हो जाता। दिलीप कुमार के साथ उनके प्रेम-प्रसंग और बाद में आई कड़वाहट की वजह से यह जोड़ी अपेक्षित संख्‍या में दोहराई नहीं जा सकी। फिर भी फिल्म तराना/संगदिल/अमर और क्लासिक 'मुगल-ए-आजम' में उन्हें साथ देखना रोमांचकारी अनुभव रहा। नटखट देव के साथ मधुबाला की शरारतों ने दर्शकों का भरपूर प्यार पाया।
 
फिल्म - मधुबाला/ निराला/ आराम/ नादान/ अरमान/ कालापानी/ जाली नोट और शराबी में इस जोड़ी की चंचलता और रोमांटिक गानों ने उस समय के युवाओं पर जादुई असर छोड़ा। 
 
फिल्म 'बादल' से अभिनेता प्रेमनाथ उनकी जिंदगी में आए और 'साकी' से लौट गए। दिलीप-प्रेम-मधु का प्रेम त्रिकोण किसी फिल्म की कहानी की तरह रोमांस, त्याग और बिछोह के मेलोड्रामा का उदाहरण है। 
 
अभिनेता प्रदीप कुमार के साथ राजहठ/ शीरी फरहाद/ यहूदी की लड़की/ पुलिस/ महलों के ख्वाब और पासपोर्ट में तथा भारतभूषण के साथ गेटवे ऑफ इंडिया/ फागुन/ कल हमारा है/ बरसात की रात में मधुबाला अत्यंत आकर्षक लगीं। अभिनेता नासिर खान और शम्मी कपूर के साथ क्रमश: खजाना/ नाजनीन और रेल का डिब्बा/ नकाब तथा ब्वाय फ्रेंड में मधुबाला पूरी शोखी और शान के साथ पर्दे पर नजर आई। 
 
अपने जीवन के आखिरी दिनों में हँसी और मस्ती के खजाने किशोर कुमार के साथ फिल्म ढाके की मलमल/ चलती का नाम गाड़ी/ झुमरू और हाफ टिकट ने दर्शकों को खूब ठहाके लगवाए। चंचल-चपल गरिमा का परिचय दिया, वह अनुकरणीय है। फिल्म इतिहास में ऐसा दूसरा उदाहरण सुनील दत्त-नरगिस का दिया जा सकता है। उनके जीवन की अंतिम फिल्म 'ज्वाला' सुनील दत्त के साथ थी, जिनके साथ 'इंसान जाग उठा' फिल्म वे पहले कर चुकी थीं।
 
मधुबाला ने अपने करियर के आरंभ में हर बड़े हीरो के साथ अभिनय किया, जिनमें वास्ती/ उल्लास/ महिपाल/ सुरेंद्र/ जयराज/ रहमान/ मोतीलाल/ करण दीवान/ सुरेश/ अजीत/ गुरुदत्त और रंजन के नाम प्रमुखता से गिनाए जा सकते हैं।



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