हर कोई इस दुनिया में एक दूसरे से अलग होता है और वह खूबसूरत भी है। हम जब अलग है तो इस भिन्नता को स्वीकार करें। क्यों भेड़ चाल में जाना है? यह समझने में मुझे थोड़ा सा समय लगा, लेकिन अब बहुत अच्छे से समझ गया हूं। यह कहना है सिद्धांत चतुर्वेदी का जो कि 'दो दीवाने सहर में' फिल्म में शशांक की भूमिका में नजर आने वाले हैं।
सिद्धांत इस फिल्म में एक ऐसे शख्स का किरदार निभाते दिखेंगे जो शायद श ना कहते हुए स कहता है और कई बार अपने आसपास के लोगों से अपने आपको अलग पाता है। और अपने आप को कम आंकने में लग जाता है। अपनी बातों को आगे बढ़ाते हुए सिद्धांत ने पत्रकारों को बताया कि मैं बचपन से बहुत सारी चीजों में अपने आप को कम ही समझता था। बातें मालूम है लेकिन ढंग से लोगों के सामने ना रख पाना कोई लड़की पसंद है, लेकिन उससे बात करने की हिम्मत न जुटा पाना किसी बात की मालूमात है, लेकिन उसे क्लास में ना बता पाना कई बार अपने लुक की वजह से भी मैंने अपने आप को बहुत छोटा महसूस किया है।
आंखें छोटी थी तो क्लास में कोई नेपाली कह देते थे। बाल घुंघराले थे तो मैगी कहते थे। अंग्रेजी ढंग से आती नहीं थी और हिंदी भी सीख ही रहा था। यह कई सारी ऐसी बात है जिसकी वजह से मैं अपने आप को समेट कर रह जाता था और खुलकर लोगों के सामने बात नहीं कर पाता था लेकिन अब बात बिल्कुल अलग है। अब मुझे ऐसा लगता है कि लोगों में मैं यह विश्वास जगा सकता हूं कि जब मैं कुछ जीवन में अचीव कर सकता हूं तो कोई भी कर सकता है। हर व्यक्ति में एक विशेषता होती है और वही सुंदरता है।
कभी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी कोई बात आपने सुनी हो?
अब तो नहीं लेकिन पहले जब मैं अपनी किस्मत आजमा रहा था तो मुझे कोई कहता था कि घुंघराले बाल वाले व्यक्ति तो फिल्म इंडस्ट्री में नहीं चल पाते तो कभी किसी ने मुझे कह दिया कि जिनकी आंखें छोटी होती है, उन्हें सिनेमैटोग्राफर पसंद नहीं करते हैं, लेकिन अब ऐसा कुछ भी नहीं होता।
फिल्म में शहर को सहर कहना इसके पीछे क्या कारण रहे थे।
दरअसल आपने फिल्म के ट्रेलर में भी देखा होगा कि मैं फिल्म में जो श को स कह रहा हूं। तो रोसनी कह देता हूं बजाए मुझे रोशनी कहना चाहिए। अब इसमें एक और बात सोची है सहर मतलब सुबह यह जो फिल्म हमारी आ रही है ऐसी फिल्मों के बीच में आ रही है जहां पर बहुत सारे एक्शन और थ्रिलर फिल्में आ रही हैं तो इस फिल्म का ना एकदम सॉफ्ट रोमांटिक तरीके की फिल्म है। तो आशा की एक किरण लेकर यह फिल्म आ रही है। मुझे सहर नाम इसीलिए अच्छा लगा।
इतनी सारी फिल्मों के बीच में यह फिल्म अपनी जगह कैसे बना सकती है?
हमारी फिल्म एक बहुत अलग तरीके की चमक है, चाहे इसकी कॉस्ट्यूम हो जाए। इसका प्रदर्शन करने का तरीका ही क्यों ना हो? बहुत सिंपल सी एक कहानी है। अब अगर मिसाल दूं तो आपको मैं अमोल पालेकर के समान और उनके समांतर चलने वाली फिल्मों का ही रेफरेंस दे सकता हूं कि एक लड़का है कि लड़की है दोनों के बीच में प्यार है। लेकिन कहानी में बहुत सादगी से एक बात कह दी गई है।
अब इसी कहानी को जब जेन जी के लिए बनाया जाएगा तो तरीका थोड़ा अलग हो जाएगा मिसाल के तौर पर अगर फिल्मी रोशनी कहती है कि मुझे नहीं लगता कि मैं सुंदर हूं तो आप इंस्टाग्राम खोलिए हर दूसरी लड़की आपको यही कहते हुए, सुनाई देगी। चाहे वह काइली हो जाए, वह किम कार्दशियन हो। सबको वैसे बनना है लेकिन असल में अपनी खूबसूरती कोई नहीं देख रहा है। फिल्टर्स के पीछे असली खूबसूरती कहीं छुप रही है। हमारी फिल्म में वही है, सादगी है और सच्चाई।
मृणाल ठाकुर के साथ अपने इतने समय से काम किया, शूट किया। कैसी रही दोस्ती आपकी?
मैं तो मैं मृणाल को कुमकुम भाग्य और नच बलिए से देखता आया हूं और इनकी सुपर थर्टी में तो मैं बहुत इंप्रेस भी हुआ था। मैं बहुत खुश था कि इनके साथ मुझे काम करने का मौका मिलेगा। यह जब कैमरा पर आती हैं तो जो चमक लेकर आती है, स्क्रीन पर वह देखते ही लगता है जैसे बड़ी स्क्रीन के लिए ही बनी हों। मैंने जब पहली बार उनसे मुलाकात की थी, इस फिल्म की तभी मैंने कह दिया था कि मैं तो आपके साथ काम करना चाहता हूं। और मेरे साथ यह बात हुई कि मैंने अभी तक कोई रॉमकॉम नहीं किया था।
जब भी फिल्में की थी अपने उम्र से बड़े उम्र वाला बनकर ही की थी, पर मैं सोचने लगा कि 35 या 40 की उम्र में एक्शन लूंगा। थोड़ा सा कॉमेडी वगैरह भी कर लेता हूं जब तक उम्र है मेरी। अब जब रॉम काम करने का सोच लिया तो साथ ही देखिए ना मेरी साथी बन गई थी और फिर क्या होता है हम लोग लगभग एक ही तरीके के बैकग्राउंड को लेकर आ रहे हैं। जब मिलते हैं तब कॉमन बातें बहुत ज्यादा होती हम दोनों के बीच में। दोनों को मालूम है कि आज हम जहां जिस मुकाम पर पहुंच सके हैं उसके पीछे कितनी मेहनत और कितना त्याग करना पड़ा है।
इस बात की खुशी होती है कि आप स्टार तो है ही साथ ही कल्ट फिल्में भी कर रहे हैं।
अब यह तो मुझे आप बताएंगे कि मैं कैसा कर रहा हूं। लेकिन मैं यह सोच कर आया था कि फिल्म इंडस्ट्री में काम करूंगा। बहुत अच्छे से काम करूंगा। सामने जिस भी तरीके की फिल्म आएगी, पूरी ईमानदारी के साथ करूंगा। आगे चलकर लोगों का प्यार मिलता है या फिल्म कल्ट हो जाती है यह तो अच्छा लगेगा ही मुझको। लेकिन सिर्फ काम करने के लिए नहीं आया था। बहुत बड़ा और बहुत अच्छा कुछ काम करने के लिए आया हूं।
मैं तो बहुत खुश हूं इस बात को लेकर की फिल्में ऐसी लिखी जाती है और मुझे उन फिल्मों में काम करने का मौका भी मिलता है। जहां तक बात रही कल्ट फिल्म जिसमें वी शांताराम जी की बायोपिक भी है तो उसके लिए मैं अभिजीत देशपांडे जी की लिखी हुई जो भी बातें हैं, उनको पढ़ता रहता हूं। हम लोग मीटिंग करते रहते हैं। इस फिल्म के बाद हम लोग बैठेंगे और फिर गहराई से इस बायोपिक पर काम करना शुरू करेंगे।