मेरे साथ जीवन में कई बार ऐसा हुआ है कि मैंने अपने आप को आम लोगों से कम समझा है। बचपन में भी जब क्लास में कोई सवाल पूछा जाता था, उसका जवाब मुझे आता भी था, लेकिन हाथ खड़ा करके उसका जवाब देना यह मेरे बस में नहीं होता था। कई बार मेरी क्लास के लड़के मुझे चिढ़ाते थे कि यह कैसा नाम हुआ। मृणाल ये तो लड़के का नाम होता है। हां, बिल्कुल यह नाम लड़के का भी होता है। लड़की का भी होता है तो मैं तब भी थोड़ा सा झेंप जाया करती थी।
बाद में जो मैंने फिल्म इंडस्ट्री मैं ज्वाइन किया तभी मुझ में एक अलग तरीके की इंसिक्योरिटी थी। मुझे लगता था कि जो मेरी बोलचाल का तरीका है उसमें बहुत ज्यादा मराठीपन लगता है। मैं बिल्कुल भी एलिट क्लास की नहीं लगती हूं। लेकिन आज समय अलग है। अब मुझे लगता है। मैं जैसी हूं अब बिल्कुल ठीक हूं। एकदम परफेक्ट हूं।
यह कहना है मृणाल ठाकुर का, जो कि 'दो दीवाने सहर में' नाम की इस फिल्म में एक ऐसा किरदार निभाने जा रही है जो अपने आप को बहुत खूबसूरत नहीं मानती है और दूसरे लोगों से अपने आप को कम आंकती हैं। 'दो दीवाने सहर में' फिल्म के प्रमोशन इंटरव्यू के दौरान मृणाल ने खासतौर पर वेब दुनिया से बातचीत की और अपनी बातों को जारी रखते हुए वो आगे बताती हैं कि इस फिल्म में मैं रोशनी का किरदार निभा रही हूं और सिद्धांत के किरदार का नाम है शशांक।
मृणाल ने कहा, फिल्म में यही दिखाया गया है कि कैसे दो अपने आप पर भरोसा ना करने वाले लोग जब साथ में आते हैं तो अपनी कमियों को भी स्वीकारते हैं और एक दूसरे की कमियों को भी सिखाते हैं। कैसे इन दोनों का साथ एक दूसरे को हिम्मत देते हुए आगे बढ़ने पर प्रेरित करता है और कैसे यह जिंदगी भर में खिलने लग जाते हैं। आप फिल्म के 40% भाग में यही देखने वाले हैं कि कैसे मृणाल अपनी जिंदगी में अपनी कमियों के बावजूद आगे बढ़ रही है।
यह फिल्म उन सारे ही लोगों के लिए एक प्रेरणा का काम करेगी जो अपने आप को दूसरों से कम आंकते हैं। यह उन्हें एक आशा की किरण की तरह दिखाई देगी कि आप में कहीं कोई कमी नहीं है और अगर है भी तो कमियां सब में होती हैं। मुझे लगता है कि यह फिल्म लोगों को पसंद आएगी। कई बार मैं बाहर अलग-अलग लोगों से मिलती हूं तो वह लोग मुझे धन्यवाद कहते नहीं भूलते कि आपने हमारे दिल की बात अपने रोल के जरिए फिल्म में बताई है।
इस फिल्म का नाम शहर की जगह सहर क्यों रखा गया है?
दरअसल बात कुछ ऐसी है कि हमें इस फिल्म में मुंबई की दुनिया को दिखाना था और यह फिल्म घरौंदा जो पुरानी फिल्म है जिसमें की जरीना वहाब जी और अमोल पालेकर जी ने काम किया था। उसमें मुंबई को बहुत सुंदर तरीके से दिखाया गया था। सच्चाई दिखाई गई थी। और बस यही सोचकर हमें टाइटल संजय लीला भंसाली सर ने बता दिया और उनके सुझाव पर हमने ही रखनी लिया। इसके अलावा जो शशांक शर्मा जी भी उनसे जुड़े हैं। वो एक फिल्म निर्देशक हैं उन्हें भी स और श में थोड़ा मुश्किल आती है। तो फिर हमने तय किया कि इस फिल्म का नाम दो दीवाने सहर में ही रख लेते हैं और यह गाना भी मुझे बहुत पसंद था।
मृणाल मैं आपको कुमकुम भाग्य के समय से देखते आ रही हूं। कवर करते आ रही हूं। मैं जब भी आपको देखती हूं हर बार 4 से 5 किलोग्राम आपका वजन कम ही हो चुका होता है
नहीं मैम मैं तो अब और खाना चाहती हूं। पिछले कुछ दिनों पहले मैं बीमार थी और अपना बहुत सारा वजन मैंने ऐसे ही कम कर दिया। अब मैं खूब खा रही हूं ताकि अपने पुराने वाली स्थिति में पहुंच सकूं।
मृणाल यहां मैं आपसे जानना चाहती हूं कि सुंदर दिखने की वजह से एक लड़की को टारगेट भी खूब किया जाता है। ऐसा कभी सामना किया है?
आप जो कह रही मैं बिल्कुल समझ रही हूं। यह सब चीज में अपनी आंखों से देख चुकी हूं। आपको अपनी फिल्म लव सोनिया की बात बताती हूं। जब यह फिल्म बन रही थी तब निर्देशक ने कुछ लोगों का लुक टेस्ट लिया था और कंप्यूटर पर उसकी फाइल बनाई थी। यानी एक तरीके से ट्रैक बिन में थी। एक फाइल बनाई थी डू नॉट ओपन। मेरे सारे पिक्चर्स उस फाइल में थे। यानी एक तरीके से ट्रैक बिन में थी।
एक बार यूं ही निर्देशक ने उस फाइल को खोल कर देख लिया। और फिर उन्होंने मुझे बुलाया और तब मुझे इतना ज्यादा इन लोगों को समझाना पड़ा है कि यह गांव की लड़की जो कर्ज में डूबी हुई है। उसके ऊपर गरीबी छाई हुई है। उसकी जो भावे हैं, वह अलग तरीके से हैं तो मैं वैसे ही दिखाई दे सकती हूं। चाहे वो अल्केश वजा हो या तबरेज जी हो या डेबिट वोमार्क हो। इन सभी को मैंने इतना समझाया तब जाकर उन्होंने माना कि मैं यह रोल निभा सकूंगी।
सच कहूं तो कई बार लोग जब मुझे देखते हैं तो सोचते हैं कि अरे तो इतनी सुंदर है। इसने तो इतना सफलता भी पाई है। इसकी जिंदगी में क्या ही कोई संघर्ष होगा। लेकिन सच कहूं तो ऐसा नहीं होता है। खूबसूरती मिल जाने का मतलब यह भी नहीं होता है कि आपके जिंदगी में संघर्ष कभी नहीं होगा। गेट अवे खूबसूरती की वजह से नहीं मिलता है। मुझे कई बार ऐसा लगता है कि काश ऐसा हो कि मैं बिल्कुल आम लड़कियों जैसा जीवन जी सकती।
कुछ दिन पहले की बात है मैंने अपने किसी बहुत करीबी रिश्तेदार को खो दिया था। फिर भी मैं उनके फ्यूनरल में भी नहीं जा सकती थी क्योंकि लोग कैमरा पकड़ कर खड़े हुए थे। मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं ऐसे नाजुक समय में अपने मां के साथ या अपने भाई बहनों के साथ खड़ी हो सकूं, उन्हें सांत्वना दे सकूं। दुख बांट सकूं लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। तब मुझे लगा कि काश एक आम सी जिंदगी मुझे भी मिल जाती।
आप आने वाली जनरेशन- जेन जी को शादी के बारे में इस फिल्म के जरिए क्या समझाना चाहते हैं?
मुझे लगता है शादी बहुत जरूरी है, होनी ही चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि सही इंसान से होना चाहिए। शादी करने के लिए शादी नहीं करनी है। शादी कब करनी है जब आपको सामने वाला सही इंसान मिल जाता है। पहले शादी का एक समय तय हुआ करता था कि लड़कियां 18 से 23 साल की उम्र के बीच की हो तो शादी कर दो और लड़कों के लिए यही शादी की उम्र जो है वह 21 से 25 तक की रखी गई थी।
लेकिन आज के जो समय में हम जी रहे हैं उसमें हमें समझना होगा कि शादी ऐसे व्यक्ति से करें जो आपके लिए सही हो। मैं तो बिल्कुल चाहूंगी कि मैं जैसी हूं मुझे मेरी खामियों के साथ सामने वाला स्वीकार करें। यह नहीं कि मुझे बार-बार छोटा बताते रहे या बार-बार नीचे दिखाता रहे कि तुम यह काम ठीक से नहीं कर रही हो। मुझे तो चाहिए कि सामने वाला मेरी बड़बड़ को भी खुश होकर सुने। उसमें एक लीडरशिप क्वालिटी हो। उसके अंदर की भावना हो कि मेरे माता-पिता भी उसके ही माता-पिता है। वह मुझे अपनाए जैसे कि मैं हूं। जब तक आप को ऐसा इंसान नहीं मिल जाता है तो बेहतर है थोड़ा सा रुक जाए और सही शख्स के आने का इंतजार करें।