वेब सीरीज 'ब्रेक पॉइंट' के बारे में महेश भूपति ने कही यह बात

रूना आशीष| पुनः संशोधित सोमवार, 27 सितम्बर 2021 (15:29 IST)
भारत का नाम बैडमिंटन की दुनिया में ऊंचा करने वाले खिलाड़ी और महेश भूपति इतने समय बाद भी लोगों की फेवरेट जोड़ियों में गिने जा सकते हैं। फिर भी कई ऐसी बातें हैं जिसकी वजह से इस जोड़ी को अलगाव का सामना करना पड़ा। उनकी इसी अलगाव की पूरी कहानी को बयां करने वाली एक 'ब्रेक पॉइंट' 1 अक्टूबर से लोगों के सामने आ रही है।


इस सीरीज का निर्देशन नितेश तिवारी और अश्विनी अय्यर तिवारी कर रहे हैं। इस सीरीज से जुड़े कई सवालों का जवाब महेश भूपति ने मीडिया को दिया।

महेश भूपति ने वेबदुनिया के सवाल का जवाब देते हुए कहा कि इस बार जो ओलंपिक और पैरा ओलंपिक हुआ है उस में भारत का योगदान बहुत ही शानदार और प्रशंसनीय रहा है। ऐसे में भूतकाल में भी कई एथलीट्स और कुछ खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने नए खिलाड़ियों के लिए एक पक्का प्लेटफार्म और पक्की जमीन बनाई है ताकि नए खिलाड़ी आएं और परफॉर्म कर सके।

पुराने खिलाड़ियों ने काम करके नए खिलाड़ियों को यह विश्वास भी जगाया है कि आप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाएं और अपना बेस्ट परफॉर्म करें। मुझे याद में बचपन से टेनिस प्लेयर बनना चाहता था लेकिन प्रैक्टिस करते समय कभी भी नहीं सोचा कि मैं इतने बड़े मुकाम तक पहुंच जाऊंगा कि देश को मुझ पर गर्व होगा। मेरे पास जितनी भी सफलता है उन सारी उपलब्धियों पर गर्व है। हम दोनों की जोड़ी ने जो उपलब्धियां पाई है, उस पर भी गर्व है और अकेले जो उपलब्धि पाई है उस पर भी गर्व है।
मैदान में टेनिस खेलने के लिए आपके पास कोई रीटेक नहीं होता लेकिन फिल्मों में रीटेक करने का मौका मिलता है। कैसा लगा ये अंतर?
(हंसते हुए) मैंने तो अपनी जिंदगी के 99% हिस्सा जो है, वह टेनिस को दिया है फिल्म और टेनिस दोनों ही बहुत अलग चीज है और मैं यह कहूंगा कि दोनों के बीच में तुलना नहीं की जा सकती है और ना ही की जानी चाहिए।

अश्विनी और नीतीश के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मैंने अश्विनी और नीतीश की फिल्में देखी हुई है और बहुत मजा भी आया। मैंने जब सुना कि ‍अश्विनी और नितेश हमसे बात करना चाह रहे हैं और उन्होंने इस प्रोजेक्ट पर काम करने की इच्छा जताई है तो हमने फिर फोन पर बात की। अश्विनी और नीतीश ने हमें समझाया कि कैसे सीरीज को डिजाइन किया गया है और कैसे-कैसे इसे आगे बढ़ाया जाने वाला है। इन दोनों ने बताया कि हम दोनों अपने तरीके से जवाब दे सकते हैं और यह बात जानने के बाद मुझे अच्छा लगा इसलिए अपनी इस कहानी को लेकर इन दोनों पर विश्वास बढ़ा गया।
सीरीज में टैग लाइन दिया गया है ब्रोमांस टू ब्रेकअप। कितना आसान था आपके लिए सब बताना।
जिंदगी में हम लोगों को कभी न कभी इन सारी बातों का सामना करना ही पड़ता है। और फिर एक बार जब आपको एक कंफर्ट मिल जाता है कि आप अपनी बातें कैमरा के सामने कैसे कह सकते हैं तो फिर आप सब कह देते हैं भले ही आसपास सौ लोग क्यों न खड़े हो, आपको सिर्फ कैमरा को बताना था। तो इतना मुश्किल नहीं रहा मेरे लिए।
क्या लारा ने यह डॉक्यूजरीज देखी है?
लारा दत्ता तो शुरुआत से ही सीरीज से जुड़ी रही हैं और उन्होंने हर कदम पर इसे बनते हुए देखा है। हालांकि अब उनकी इच्छा है कि जब सीरीज बन कर तैयार हो गई है तो जल्द से जल्द लोगों के सामने पहुंच जाए।

क्या इसमें लारा दिखाई देंगी
यह डॉक्यूमेंट्री 2006 में खत्म हो जाती है लेकिन 7 एपिसोड कि इस डॉक्यूजरीज में आपको बहुत सारी बातें देखना, सोचना और समझना मिल जाएगी।
हमारे देश में खेलों पर बनी डॉक्यूमेंट्री कम बनी है। क्या आपने कोई देशी या विदेशी डॉक्यूमेंट्री देखी है?
हां मैंने कुछ स्पोर्ट्स पर बनी डॉक्यु सीरीज देखी है। विदेश में बनी डॉक्यूमेंट्री खासतौर पर से लास्ट डांस विद जॉर्डन और माराडोना। जब हमें डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे तब कई लोगों ने बोला कि खेल पर बनी हुई डॉक्यूमेंट्री का मार्केट बहुत ज्यादा नहीं है देश में हमें इसे नहीं बनाना चाहिए।

तब मैंने और लिएंडर ने सोचा कि हम तो हमेशा से ट्रेंड सेटर रहे हैं तो इस बार हम कैसे किसी और का अनुसरण करें? हमने यह डॉक्यूमेंट्री बनाने की सोच ली। ऐसे में नितेश सर और अश्विनी ने बताया कि वह भी रुचि रखते हैं। तो आशा करता हूं यह डॉक्यूमेंट्री, हमारे देश में दूसरे खेलों पर बनी डॉक्युमेंट्रीज को एक उदाहरण बन कर बताइए।
जब आप अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और साथ ही एक बड़ी सी ट्रॉफी लेकर लौटते हैं। तो कैसी मनोदशा होती है क्या आप शब्दों में बयान कर पाएंगे?
उस भावना को शब्दों में बयान करना बहुत मुश्किल है। चाहे वह एथलीट हो या किसी भी खेल से जुड़ा हो अपने देश का प्रतिनिधि जब बनता है तो उसे अच्छा ही लगता है, फक्र महसूस होता है। फिर ऐसे में आपके लिए राष्ट्रगान बजता है। अपने देश के राष्ट्रगान को सुनना बहुत अलग भावनाएं देता है और शायद ही कोई एक ऐसा अथिलीट होता हो या खिलाड़ी होता हो जिसके रोंगटे खड़े ना हो जाते हो या शरीर में सिहरन ना पैदा हो।
लेकिन फिर भी मैं कहूंगा कि अपने देश का प्रतिनिधित्व करता और उसकी भावनाओं को शब्दों में बयां करना जरा मुश्किल होता है। ये तभी समझ में आता है जब कोई शख्स खुद अपने देश का प्रतिनिधित्व दूसरे देश में जाकर कर चुका हूं वरना तो यह सिर्फ एक कहानी है।




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