1. मनोरंजन
  2. बॉलीवुड
  3. आलेख

''लगाए ना लगे'' और ''लव जेहाद''

कुर्बान
क्या इत्तफाक है कि "लव जिहाद" के चर्चे हो रहे हैं और इधर फिल्म आई है "कुर्बान" जिसमें हीरो जान-बूझकर एक लड़की को इसलिए पटाता है, क्योंकि उससे शादी करने पर अमेरिका में जा बसना सरल हो जाएगा। "लव जेहाद" के आरोप लगाने वालों के मुताबिक कुछ मुस्लिम लड़के जान-बूझकर हिन्दू और ईसाई लड़कियों से प्यार कर रहे हैं ताकि उनसे विवाह करके उनका धर्म बदला जा सके। अगर यह बात सच है, तो ये लड़के आत्मघाती आतंकवादियों से भी ज्यादा दुस्साहसी हैं। एक दिन मरने से तिल-तिलकर उम्रभर मरना (बिना शहादत का रुतबा प्राप्त किए) ज्यादा मुश्किल है। इस पर तो एक बढ़िया हास्य फिल्म बन सकती है।

लव जिहाद की बात सैद्धांतिक रूप से अपनी जगह मगर लव जेहाद के बाद जो कुछ होगा या हो सकता है उसकी कल्पना तो कीजिए। लड़के का ससुराल हिन्दू है और पत्नी की तरफ के सारे रिश्तेदार भी। लड़की को यदि मुसलमान बना भी लिया जाए, तो जो बच्चे पैदा होंगे क्या वे जेहादी मानसिकता के हो सकते हैं? बच्चे के चाचा, ताऊ, दादा-दादी मुस्लिम हैं और मामा, मामी, मौसी, नाना-नानी, ममेरे-मौसेरे भाई हिन्दू। सोचिए कि ऐसा बच्चा क्या किसी भी समुदाय से नफरत कर सकता है? खुद लव जेहाद करने वाला थोड़े दिन में बदल सकता है।

मणिरत्नम की फिल्म "बॉम्बे" में लड़का हिन्दू है और लड़की मुसलमान। दोनों के परिवार कट्टर सांप्रदायिक हैं। मगर कुछ ही दिनों में दोनों परिवार कब अपनी जिद और नफरत छोड़कर नए रिश्ते में बँध जाते हैं, पता नहीं चलता। असल जिंदगी में भी ऐसा ही होता है। यह कहना बहुत सरल है कि हमारी संतान ने विधर्मी से लव मैरेज कर ली है और अब हम उसका मुँह नहीं देखेंगे, हमारे लिए वो मर चुका/मर चुकी। मगर थोड़े ही दिनों में खून का रिश्ता जोर मारने लगता है। जब नए जोड़े को संतान होती है, तो सारे गिले-शिकवे मिट जाते हैं।

मध्यप्रदेश सरकार दूसरी जाति में लव मैरेज करने वाले को नकद इनाम देती है। दूसरे धर्म में शादी करने वाले को और भी ज्यादा बड़ा इनाम मिलना चाहिए। सांप्रदायिक दंगों की जड़ कट सकती है, यदि अंतरधार्मिक विवाह आम हो जाएँ। सोच-समझ कर किसी से प्यार नहीं किया जा सकता। प्यार ही प्यार को जगाता है। अगर दो प्यार करने वालों में एक केवल अभिनय कर रहा है, तो दूसरा कभी इस सीमा तक नहीं जाएगा कि उसके लिए दुनिया छोड़ दे। प्यार करने वाले प्यार को पहचान ही लेते हैं। गालिब का शेर है - इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतिश गालिब/ कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।

बहरहाल, फिल्म "कुरबान" में एक तकनीकी गलती है। इतनी सुंदर नायिका इतने दिनों से क्या इसीलिए खाली थी कि एक आतंकी आकर उसे पटा ले? उसके साथ "लव जेहाद" कर ले? फिल्म को और विश्वसनीय बनाने के लिए नायिका में दोष दिखाया जाना था। नायिका को बदसूरत बताया जा सकता था। मोटी और अधेड़ बताया जा सकता था। दोनों का सुंदर और हमउम्र होना कम जँचता है। एक और खामी यह है कि विवेक ओबेराय रिपोर्टर है और आतंकियों को पकड़वाने के लिए उनमें जा घुसते हैं। आतंकवादी भी बगैर पड़ताल किए केवल उसके भाषण सुनकर उसे शामिल कर लेते हैं। दोनों ही बातें गले से नहीं उतरतीं।

फिल्म अच्छी है मगर तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। कॉलेज के स्टाफ रूम (या लायब्रेरी) में प्रोफेसर इस तरह चूमा-चाटी नहीं करते, जैसे सैफ-करीना को करते दिखाया गया है। दोनों प्रोफेसर लगते भी नहीं हैं। किरण खैर ने अफगानिस्तानी उच्चारण खूब पकड़ा है और इसी कारण अफगानी महिला का उनका किरदार प्रभावी बन पड़ा है।

कुछ बारीक बातों पर ध्यान रखा जाता तो फिल्म और बढ़िया बन जाती।
लेखक के बारे में
अनहद