जरदारी से इश्क की दास्ताँ

ND| पुनः संशोधित शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007 (19:06 IST)
हमारा प्रेम एक मधुमक्खी के काटने से शुरू हुआ था। महज चार दिन की मुलाकात में ही मैं विंडसर पार्क में आसिफ जरदारी से मिलने गई। जहाँ आसिफ पोलो खेलते थे। इत्तेफाकन एक मधुमक्खी ने मुझे काट लिया। मेरा हाथ सूज गया और वे मुझे डॉक्टर के पास ले गए। इसकेबाद सिलसिला चल पड़ा।

वे हँसमुख मिजाज के थे और मेरी खासी परवाह भी करते थे। मिलने के सातवें दिन तो हमारी सगाई हो गई। आसिफ को पार्टी पोलिटिक्स में रुचि नहीं थी। उन्होंने मुझे दिल की शक्ल वाली एक हीरा जड़ित अँगूठी दी थी। मैं कभी नहीं चाहती थी कि मुझे 'अरेंज मैरेज' का प्रवक्ता माना जाए।


पिता को दी गई थी फाँसी : बेनजीर वह पहली महिला थीं, जो किसी मुस्लिम देश की हुक्मरान। इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को भी रावलपिंडी में ही फाँसी दी गई थी और अब बेनजीर। उनके पिता उन्हें पिंकी कहते थे।
डेमोक्रेसी के लिए लड़ेंगे : उनकी फाँसी से एक दिन पहले रावलपिंडी में जेल में उन्होंने बेनजीर की माँ से कहा- पिंकी सियासत के पैच समझने लगी है। उन्होंने कहा था-तमाम बच्चों को मेरा प्यार कहना। यहाँ हालात ठीक होने तक यूरोप चली जाना और पिंकी को भी ले जाना। 'हम नहीं जाएँगे'। हम यहीं आपकी बनाई पीपुल्स पार्टी के लिए काम करेंगे। डेमोक्रेसी के लिए लड़ेंगे। भुट्टो की आँखें चमक उठी थीं। मन भर आया और कह उठे- बेनजीर मेरा बेशकीमती रत्न है।
यूँ बनी पिंकी : 4 अप्रैल 1979 की अलस्सुबह जुल्फिकार अली भुट्टो को फाँसी दे दी गई। उस लम्हे को याद करते हुए उनके रोंगटे खड़े हो जाते थे। 21 जून 1958 को वे भुट्टो खानदान में पैदा हुई थी। गुलाब की पंखुड़ियों की मानिंद सुर्ख थी, लिहाजा उसका नाम ही पड़ गया पिंकी। पिंकी के बाद मीर मुर्तजा, सनम और शाहनवाज पैदा हुए। पिंकी चूँकि सबसे बड़ी थी लिहाजा, स्कूल में आँकड़े सीखने की उम्र में ही मम्मी-पापा के बाहर व्यस्त रहने पर बहुत समझदार हो गई।
इन्सानी तवारीख का सफा और घर : लारकाना यानी 'अल मुतर्जा' में भुट्टो परिवार का खानदानी घर हुआ करता था। दरवाजे के ठीक पास नीली-सफेद टाइल्स से होती हुई नजरें बाहर जाती हैं। यहाँ से करीब ही इनसानी तवारीख का पहला सफा मोहनजोदड़ो है। पिंकी को बार-बार यही लगता था कि 'मुंज जो देरो' (सिंधी) यानी अपनी ही जगह है। एक बाढ़ में घर की पुरानी डायरी गुम गई, वर्ना उसे खानदानी चिट्ठा पूरा मिल जाता।
कौन है भुट्टो : वे बुजुर्गों से सुनती थीं कि भुट्टो एक जाति है। ये लोग सिंध के किसानों-जमींदारों तक का एक भरपूर शोहरतदार हिस्सा है। शायद यह राजपूतों के समान हो, ऐसे राजपूत जो मुस्लिम धर्म स्वीकार कर चुके थे या उन अरबों की संतानें जो सिंध होते हुए हिंदोस्तान में आए थे। सरदार दोदो खान से पिंकी के परिवार की वंशावली शुरू होती थी।
मौत के बाद का पाठ भी... : पिंकी के दादा सर शाह नवाज जूनागढ़ स्टेट के प्रधानमंत्री थे। पिता जुल्फिकार बार एट लॉ होकर लौटे थे और औरतों की पढ़ाई लिखाई आजादी के वे समर्थक थे। पिंकी को भी उन्होंने आयरिश ननों की देखरेख में पढ़ाया था। घर पर मौलवी पढ़ाता था। मौलवी ने यहपढ़ाया था- मौत के बाद ऊपर बालों से भी पतले पुल पर होकर आग का दरिया पार करना पड़ेगा, जिन्होंने गुनाह किए हैं, वे उसमें गिर जाएँगे और जो पाक हैं, वे पार होकर वहाँ पहुँचेंगे, जहाँ शहद और दूध की नदियाँ बहती हैं।
सियासत सीखी खतों से : मुरी के खुशनुमा बोर्डिंग स्कूल में अपनी बहन सनम के साथ पढ़ते हुए, बजरिए पापा के खत, पिंकी ने सियासत का पहला पाठ पढ़ा था। 1965 में जब भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ था, फौजियों की बहादुरी के किस्से से बेनजीर उत्तेजित हो जाती थी। हावर्ड में बेनजीर ने सलवार-कमीज छोड़, जीन्स शर्ट पहनना शुरू कर दिया। पिपरमेंट आइसक्रीम के कोन जी-भरकर खाती थीं।



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