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सोने के दाम समोसे

बिहार
बिहार के सोनपुर में लगने वाले पशु मेले में अगर घोड़े की मत तीन लाख रुपए तक है तो यहाँ बिकने वाले समोसों की कीमत भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

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मेले में इस बार एक डच पर्यटक जोड़े ने चार समोसे खरीद कर खूब चाव से खाए और जब पैसे देने की बात आई तो दुकानदार ने उन्हें कीमत बताई दस हजार रुपए। यानी, ढाई हजार का एक समोसा। काफी हील-हुज्जत के बाद पैसे तो अदा हो गए, लेकिन पर्यटकों ने इसकी सूचना पुलिस को दे दी।

उसके बाद न सिर्फ उस दुकानदार को मेले से बाहर कर दिया गया, बल्कि पुलिस ने 10 रुपए कटवा कर 9990 रुपए पर्यटकों को वापस भी करवा दिए।

दुनियाभर में विख्यात सोनपुर का हरिहरक्षेत्र पशु मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। यहाँ अनेक देशों के लोग घूमने आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होने वाले इस वार्षिक मेले में विदेश से भी लोग आते हैं।

मेले के विशेष पुलिस अधिकारी आलोकित कुमार कहते हैं कुछ स्थानीय दुकानदार विदेशी पर्यटकों को ठगने की कोशिश करते हैं, लेकिन हम ऐसे लोगों पर कड़ी नजर रखते हैं। हमारी कोशिशों के चलते ही विदेशी पर्यटक ठगने से बच गए।

आलोकित का कहना था वह हलवाई किसी और को न ठगे, इसलिए हमने उसे मेले से बाहर कर दिया है। ऐसा नहीं है कि इस मेले में बिकने वाली चीजों की कीमत ठगी में लगे लोग ही महँगी करते हैं।

शान का प्रदर्शन : कई बार खरीददार अपनी शान का प्रदर्शन करने के लिए भी मुँह माँगी कीमत अदा करते हैं। करीब दो वर्ष पहले रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव के घोड़े 'चेतक' को खरीदने के लिए बोली लगी और वह एक लाख एक हजार रुपए में बिका।

इस वर्ष एक विक्रेता ने अपनी एक घोड़ी की कीमत तीन लाख तय की है तो वैशाली के कौशल किशोरसिंह के घोड़े की बोली एक लाख सत्तर हजार रुपए लग रही है।

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नेपाल के एक सैलानी मुकेश थापा कहते हैं हमने लकड़ी के बने कुछ खूबसूरत बर्तन खरीदे और उसकी जो कीमत हमने चुकाई, वह सामान्य से कई गुना ज्यादा है, पर हमारे लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

मेले की भीड़-भाड़ में अपनी दुकान सजाए अमित कुमार कहते हैं मेले में बिकने वाली चीजों की क़ीमत अगर सामान्य हो तो खरीददार के लिए इसमें कोई खास आकर्षण नहीं होता और दूसरी बात यह है कि हमारी भी कोशिश होती है कि हम कुछ अधिक कमा सकें, लेकिन अगर चीजों के दाम बिल्कुल असमान्य हों तो यह किसी भी तरह अच्छी बात नहीं है।

गंगा और गंडक के मुहाने पर लगने वाले इस मेले का इतिहास राजा चंद्रगुप्त मौर्य के जमाने से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि चंद्रगुप्त मौर्य अपनी सेना के लिए हाथियों की खरीददारी गंगा के इसी क्षेत्र से करते थे।

हालाँकि आज भी इस मेले में हाथी और घोड़े काफी संख्या में खरीद-फरोख्त के लिए लाए जाते हैं, लेकिन वन्यजीवों की खरीददारी पर सख्त कानूनी शिकंजे के कारण रफ्ता-रफ्ता इस मेले का आकर्षण भी कम हुआ है। ...लेकिन राज्य सरकार अब इस कोशिश में जुटी है कि इस मेले की पुरानी रौनक फिर से बहाल हो सके।