बात साल 2001 की है जब मैं पाकिस्तान की जानी-मानी समाचार पत्रिका 'द हेराल्ड' का संपादक था। उसी दौरान पत्रिका ने आईएसआई और तालिबान पर एक कवर स्टोरी- 'आईएसआई और तालिबान की सांठगांठ' छापी।
पत्रिका का नवम्बर,2001 अंक अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के गिरने के कुछ ही दिनों पहले प्रकाशित हुआ था, और जाहिर है इससे पाकिस्तानी खुफिया ऐजेंसी के कुछ लोगों में नाराजगी थी। चंद ही दिनों बाद, एक दोपहर मेरे पास एक फोन आया। फोन करने वाले व्यक्ति ने अपना नाम कर्नल तारिक बताया।
पाकिस्तान में अपना परिचय कर्नल के तौर पर करवाने वाले किसी व्यक्ति का फोन आना एक बुरी खबर है। आप समझ जाते हैं कि ये नाम फर्जी है और इस तरह के फोन का मतलब है मुसीबत।
फोन करने वाले ने बड़े दोस्ताना अंदाज में कहा, 'आमिर साहब, मैं आपकी पत्रिका बराबर पढ़ता हूं।' मैंने बुदबुदाकर शुक्रिया कहा, लेकिन साथ ही मेरे जेहन में ये बात दौड़ रही थी कि वो मुद्दे पर कब आएगा। इसमें बहुत ज्यादा देर नहीं लगी।
उसने कहा, 'सच तो ये है कि मैं आपके बारे में काफी कुछ जानता हूं। आपके पास होंडा सिटी कार है, है न।' 'लेकिन कार ज्यादातर आपकी बीवी के पास होती है, मैंने सही कहा न।'
इसके बाद चीजों के सही होने का दिखावा करना बेमानी था इसीलिए मैंने सीधे तौर पर पूछा कि वो क्या चाहते हैं।
'कितना सुंदर परिवार है आपका। आपको मालूम है जब आपकी पत्नी बच्चों को स्कूल छोड़ने जा रही होती हैं तो बच्चे रास्ते भर बातें कर रहे होते हैं? लेकिन मेरी समझ में ये बात नहीं आती कि आप जैसे लोग ये कैसे सोचते हैं कि आप पत्रकार भी रहें और आपका परिवार भी हो।'
इसके साथ ही दूसरी ओर से फोन लाइन कट गया। मैंने घबराहट में घर फोन किया तो पता चला की सब ठीक-ठाक है। इसके बाद पत्रिका के रसूखवाले प्रकाशक ने आने वाले चंद दिनों में कुछ अहम लोगों को फोन किया। फिर कर्नल तारिक का फोन कभी नहीं आया।
आईएसआई दफ्तर में : लेकिन उसमें भी एक पेंच था। मूझे इस्लामाबाद स्थित आईएसआई के मुख्यालय जाकर 'आंतरिक सुरक्षा' के कुछ अधिकारियों से मिलना था।
मेरी मुलाकात का वक्त तय हो गया। हालांकि हवाई अड्डे से लेकर चारों ओर से किले की तरह घिरे परिसर के भीतर मौजूद कमरे में जहां मेरी मुलाकात होनी थी, मेरा स्वागत किसी वीआईपी की तरह किया गया; लेकिन बावजूद इसके मैं अपने जेहन से इस बात को नहीं निकाल पा रहा था कि इसी भवन में मौजूद किसी व्यक्ति ने मेरे परिवार पर नजर रखने का, उनका पीछा करने का हुक्म जारी किया है।
मेरी मुलाकात वहां एक ब्रिगेडियर से हुई जिसने अपना नाम जावेद बताया। लेकिन आप निश्चित नहीं हो सकते कि ये परिचय सही है। 'ब्रिगेडियर जावेद' अपने साथ 'द हेराल्ड' के पिछले अंकों का एक ढेर लेकर आए थे। कुछ अंक तो दो साल पुराने थे। पत्रिका के अंकों पर लाल, नारंगी और गुलाबी रंग से निशान लगाया हुआ था।
बातों के दौरान ये सामने आया कि अंकों में अलग-अलग रंगों से लगाए गए निशान का अर्थ है कि उसमें छपे लेख से राष्ट्रीय सुरक्षा को किस हद तक खतरा है। हमारी मुलाकात के कुछ घंटों के दौरान वो लेखों के निशान लगाए गए हिस्सों को दिखा-दिखाकर कहते रहे कि कोई पाकिस्तानी इतना देशद्रोही कैसे हो सकता है।
कुछ देर उनके लबो-लहजे सुनने के बाद मैंने पूछा कि उनका ताल्लुक पाकिस्तान के किस हिस्से से है। पता चला कि उनका घर और मेरी दादी का मायका एक ही गांव में है।
एक ही पल में मुझसे राष्ट्रीय सुरक्षा को पैदा हुआ खतरा हवा हो गया। हमने उस इलाके के नामी परिवारों के बारे में बातचीत की। उन्होंने वहां से जाते वक्त मुझे गले लगाया। मुझे लगा कि ये सही वक्त है और मैंने उनसे पूछ लिया कि आखिर मेरे परिवार पर निगरानी क्यों रखी जा रही है।
उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े गर्व के साथ कहा, 'देखिए हमारे कुछ लोग काम के प्रति इतने समर्पित होते हैं कि वो कभी-कभी हुक्म से ज्यादा कर बैठते हैं, लेकिन आप घबराइए नहीं ये एक सामान्य प्रक्रिया है।'
उन्होंने मुझसे वादा किया कि ऐसा दोबारा नहीं होगा। इस घटना को लेकर मैं महीनों परेशान रहा, लेकिन आज जब मैं उस घटना को याद करता हूं तो मुझे लगता है कि वो बड़ा मासूमियत का दौर था, या शायद मैं बहुत खुशकिस्मत था।
'भाईयों' का काम : मुझे याद है जब आईएसआई ने कबायली इलाकों में काम कर रहे हमारे संवादादता को उठा लिया था और उसे 36 घंटे की प्रताड़ना के बाद छोड़ा गया था।
कुछ ही घंटों के दौरान हमने स्थानीय पुलिस अधिकारी से लेकर गृह मंत्री तक से संपर्क साध लिया था। लेकिन जब उन्होंने हमारा फोन उठाना बंद कर दिया तो हमें समझ में आया कि ये जरूर 'भाई लोगों' का काम है। पाकिस्तान में बोल-चाल मे आईएसआई अधिकारियों को भाई लोग बुलाया जाता है।
इसी दौरान मेरे पास एक ऐसे पत्रकार का फोन आया जिसके बारे में मुझे मालूम था कि वो आईएसआई के संपर्क में है। उसने मुझे बताया कि मेरे संवाददाता के हुलिए से मिलते-जुलते व्यक्ति का शव रावलपिंडी के एक अस्पताल में ले जाया गया है, और हमें फौरन इसकी खोज-बीन करनी चाहिए।
मुझे गाड़ी चलाकर अस्पताल पहुंचने में 40 मिनट लगे। एक पत्रकार के तौर पर मेरी जिंदंगी के ये शायद सबसे मुश्किल 40 मिनट थे।
जब मैंने शव देखा तो मुझे एर अजीब सी राहत मिली। राहत इस बात की कि वो मेरा संवाददाता नहीं था। एक बार तो ऐसा लगा कि मेरा संवाददाता न होने के लिए मैं उस शव को गले लगा लूं। जब दूसरे दिन अगवा किए गए पत्रकार को रिहा किया गया तो मैंने एक खामोश शुक्रिया अदा किया।
मुझे वो वाक्या याद है जब टाइम मैगजीन के एक पत्रकार ने भारत के बदनाम माफिया डॉन दाऊद इब्राहीम की कराची में उपस्थित होने के प्रश्न पर एक लेख लिखा था।
जासूसों ने उसे उठा लिया, दिन भर उसकी पिटाई की और छोड़ने से पहले उसे एक सूसाईड नोट लिखने के लिए मजबूर किया गया। वो पत्रकार पाकिस्तान छोड़कर अमेरिका चला गया और वहीं बस गया है। लेकिन इन सभी लोगों को जरूर समझना चाहिए कि वे सभी लोग खुशकिस्मत थे।
आखिरी नहीं : मुझे याद है कि मैं साल 2006 में उत्तरी वजीरिस्तान गया था जहां सुरक्षा और गुप्तचर एजेंसियों पर तीस साल के एक कबायली पत्रकार हयातुल्लाह के कत्ल का आरोप लगाया गया था।
हयातुल्लाह को एक स्थानीय कॉलेज के पास से अगवा किया गया था, उसे छह महीनों तक कैद में रखा गया और बाद मे सिर में गोली मारकर उसकी लाश सड़क के किनारे फेंक दी गई थी। इस घटना के बारे में सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इलाके में सभी जानते थे कि हयातुल्लाह को किसने मारा था।
कुछ लोग तो आईएसआई के एक मेजर का नाम भी लेते थे जो उसके परिवार को फोन करके कहता था कि उसने अभी तय नहीं किया है कि वो हयातु्ल्लाह को छोड़ेगा या मार डालेगा।
सलीम शहजाद की मौत का इलजाम अगर आईएसआई पर लगाया जा रहा है तो यह बेगैर कारण नहीं है। पाकिस्तान में मौजूद पत्रकार बिरादरी जानती है कि आईएसआई मीडिया और पत्रकारों पर कितनी पैनी नजर रखती है।
वो जानते हैं कि सलीम शहजाद नृशंस हत्या का शिकार होने वाला पहला पत्रकार नहीं था। और सबसे ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि पाकिस्तान की मीडिया बिरादरी ये भी जानती है कि अगर सलीम शहजाद के हत्यारों को सजा नहीं मिली तो ऐसे अंजाम को पहुंचने वाला वो आखिरी शख्स भी नहीं होगा।