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...पर रोजगार नहीं

रोजगार गारंटी योजना मध्यप्रदेश
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रोजगार गारंटी योजना को 'सबसे बेहतर तरीके से लागू' करने का दावा करने वाले मध्यप्रदेश में स्थिति खराब है। योजना शुरू होने के लगभग दो साल बाद भी काम पाने के लिए सबसे जरूरी दस्तावेज जॉब कार्ड ही लोगों को नहीं दिया गया है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर-पूर्वी मध्यप्रदेश के चार जिलों में ही साढ़े सोलह प्रतिशत से अधिक लोगों को जॉब कार्ड नहीं मिल पाए हैं। लेकिन शासन का दावा है कि राज्य के जिन 31 जिलों में ये योजना लागू की गई है वहाँ जॉब कार्डों का वितरण लगभग 131 प्रतिशत है।

यानी जनगणना के मुताबिक राज्य में इस योजना के तहत आने वाले कुल परिवारों से ज्यादा लोगों को प्रशासन ने जरूरी दस्तावेज प्रदान किए हैं। ग्रामीणों को रोजगार मुहैया कराने के उद्देश्य से भारत सरकार ने पिछले साल फरवरी महीने में रोजगार गारंटी योजना की शुरुआत की थी।

फर्जी जॉब कार्ड : भोजन का अधिकार अभियान समूह के कार्यकर्ता सचिन जैन के अनुसार ये स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर फर्जी कार्ड बना कर फंड के वितरण में घोटाला किया जा रहा है जबकि ग्रामीण योजना के फायदे से वंचित हैं।

समूह ने रोजगार गारंटी योजना पर एक स्टडी जारी की है जिसमें कहा गया है कि कुल बाँटे गए जॉब कार्डों में लगभग पैंतालीस प्रतिशत फर्जी हैं।

स्टडी के मुताबिक न तो हर हाथ को काम है और ना ही काम का पूरा दाम है जिसका दावा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने इस योजना को लागू करते समय किया था।

छतरपुर जिले के केसीपुरा गाँव के नंद राय का कहना है कि उनके और उनके गाँव के चालीस अन्य दलित परिवारों के पास जॉब कार्ड होने के बावजूद एक दिन भी काम नहीं मिल पाया है।

लुभावने वादों की सच्चाई : केंद्र की मनमोहनसिंह सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना कही जाने वाली इस योजना में मध्यप्रदेश ने पिछले दो सालों में लगभग दो हजार करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया है। इसके आधार पर मध्यप्रदेश को देश में रोजगार गारंटी योजना लागू करने वाला सबसे उत्तम प्रदेश करार दिया गया है।

'अव्वल प्रदेश' में योजना की हकीकत जानने के लिए पाँच जिलों में टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना और अशोक नगर में की गई 'जमीनी पड़ताल' से पता चला कि मजदूरों से काम के लिए आवेदन ही नही लिए जाते हैं।

इन्हीं आवेदनों के आधार पर उन्हें निश्चित अवधि में काम मिलने की गारंटी सुनिश्चित होती है। ऐसा न होने की स्थिति में जरूरी बेरोजगारी भत्ता भी उन्हें नहीं दिया जाता है। इसके साथ ही योजना का छमाही आकलन यानी सोशल ऑडिट भी गाँव वालों कि सहभागिता से नहीं हो रहा है।

स्वयंसेवी संस्था का कहना है कि वो इस रिपोर्ट को शासन को सौंपकर एक निष्पक्ष एजेंसी से पूरे मामले की जाँच कराने की माँग करेगी।
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