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मणिपुर में महंगाई का बम! पेट्रोल 250, गैस सिलेंडर 5000 रुपए, आखिर ऐसा क्या हुआ?

Manipur economic blockade
Manipur economic blockade: मणिपुर के कुकी-ज़ो बहुल पहाड़ी जिले कांगपोकपी से एक ऐसी खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली जमीनी हकीकत सामने आई है। यूनाइटेड नागा काउंसिल (UNC) की बेरहम आर्थिक नाकेबंदी ने इस पूरे इलाके में जीवन को मुश्किल में डाल दिया है। हालात इस कदर बदतर और रूह कंपाने वाले हो चुके हैं कि आम जनता के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी जंग जीतने जैसा हो गया है। यहां एक लीटर पेट्रोल के लिए 250 रुपए और एक LPG यानी रसोई गैस सिलेंडर के लिए 5000 से 6000 रुपए तक चुकाने पड़ रहे हैं। लोग अब पाई-पाई के मोहताज हो चुके हैं और पूरा जिला एक जीते-जागते नर्क में तब्दील हो चुका है।
 
दरअसल, मणिपुर का कांगपोकपी जिला अपनी रसद और जिंदगी की रेंगती सांसों के लिए मुख्य रूप से दो बड़े लाइफलाइन मार्गों पर निर्भर है— पहला, कांगलातोंगबी के रास्ते राजधानी इम्फाल को जोड़ने वाला मार्ग और दूसरा, सेनापति जिले के जरिए नागालैंड के दीमापुर को जोड़ने वाला रास्ता। लेकिन, नागा और कुकी समुदायों के बीच भड़के ताजा जातीय तनाव ने इन दोनों ही नसों को पूरी तरह से काट दिया है।
 
दोनों दिशाओं से आने वाले ट्रकों और रसद सामग्री को जबरन रोक दिया गया है। गैस सिलेंडर तो छोड़िए, राशन के लाले पड़ चुके हैं। 50 किलो चावल यहां 3000 रुपए में मिल रहा है। लोग लकड़ी के चूल्हों पर खाना पका रहे हैं। आफत यहीं खत्म नहीं होती, बिजली की भारी कटौती के कारण लोग इलेक्ट्रिक इंडक्शन तक नहीं चला पा रहे हैं और जब बिजली जाती है, तो इंटरनेट भी ठप हो जाता है। ALSO READ: मणिपुर में भारी बवाल : म्यांमार सीमा पार कर आए उग्रवादियों का तंगखुल नागा गांवों पर हमला, चर्च और दर्जनों घर फूंके

गृह मंत्री के वादों की उड़ी धज्जियां!

मई 2023 से सुलग रही मैतेई-कुकी जातीय हिंसा के बीच, केंद्र सरकार ने सीना ठोककर सुरक्षा घेरे में “मुक्त आवाजाही” का भरोसा दिया था। यहां तक कि मार्च 2025 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी इसे मणिपुर में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया था।

जमीनी हकीकत कुछ और ही

स्थानीय व्यापारियों का दर्द सुनकर आपका कलेजा मुंह को आ जाएगा। उनका कहना है कि इंसानों को आने-जाने की छूट भले ही हो, लेकिन सामान लाने पर कड़ा प्रतिबंध लागू है। व्यापारियों को महीने में सिर्फ एक बार बफर जोर पार करने की अनुमति मिलती है। अगर किसी ने दोबारा जाने की जुर्रत की, तो नागा समूह न केवल उनका सामान जब्त कर लेते हैं, बल्कि लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटकर अधमरा कर देते हैं। इस खौफ की वजह से स्थानीय कैफे और छोटे धंधे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। ALSO READ: मणिपुर में फिर भड़की हिंसा, उग्रवा‍दियों ने कई घरों को फूंका, प्रशासन ने लगाया कर्फ्यू

'अवैध वसूली' और बिचौलियों का खूनी खेल!

सवाल यह है कि आखिर 250 रुपए पेट्रोल और 3000 रुपए में 50 किलो चावल की बोरी बेच कौन रहा है? दरअसल, इस माहौल में केवल कुछ गिने-चुने समुदायों को ही पहाड़ियों और घाटी के बीच आने-जाने की थोड़ी आज़ादी है। इनमें मैतेई पंगल (मणिपुरी मुस्लिम), नेपाली और उत्तर भारत के गैर-मणिपुरी लोग शामिल हैं।
 
ये लोग न चाहते हुए भी इस मजबूरी के खेल में 'बिचौलिए' बन गए हैं। वे इम्फाल से जान जोखिम में डालकर सामान खरीदते हैं और कांगपोकपी लाते हैं। लेकिन इस सफर के दौरान उन्हें रास्ते में बने दर्जनों नए और कड़े चेकप्वाइंट्स पर भारी “अनौपचारिक शुल्क” यानी 'गुंडा टैक्स देना पड़ता है। परिवहन के हर कदम पर होने वाली इस खुली लूट का सीधा बोझ गरीब उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों की पूरी जमा पूंजी खत्म हो रही है। 

आखिर क्यों लगा है यह पहरा?

इस खौफनाक आर्थिक नाकेबंदी की शुरुआत 'यूनाइटेड नागा काउंसिल' (UNC) द्वारा 17 मई को की गई थी। संगठन का खून खौल रहा है क्योंकि उनका आरोप है कि कुकी समूहों ने उनके छह बेगुनाह नागा नागरिकों का अपहरण कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। नागा काउंसिल के नेताओं ने दो टूक शब्दों में ऐलान कर दिया है कि भले ही शव बरामद हो गए हों, लेकिन यह नाकेबंदी तब तक नहीं हटेगी जब तक कि कातिलों को फांसी और पीड़ित परिवारों को पूरा इंसाफ नहीं मिल जाता। 
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
लेखक के बारे में
वृजेन्द्रसिंह झाला
वृजेन्द्रसिंह झाला पिछले 30 से ज्यादा वर्षों से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं। प्रिंट एवं डिजिटल दोनों ही माध्यमों में कार्य का अनुभव। वर्तमान में वेबदुनिया की न्यूज टीम का नेतृत्व कर रहे हैं।    अनुभव : वृजेन्द्रसिंह झाला तीन दशक से ज्यादा का प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया का अनुभव है। वर्तमान.... और पढ़ें