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क्या दुनिया से धर्म ग़ायब हो जाएगा?

Last Modified: Saturday, 3 January 2015 (14:50 IST)

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रेशल नुवेर,  विज्ञान पत्रकार

नास्तिकता दुनियाभर में बढ़ रही है, तो क्या धार्मिक होना अतीत की बात हो जाएगी? इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं, बहुत-बहुत मुश्किल है।  कैलिफ़ोर्निया में क्लेरमोंट के पिटज़र कॉलेज में सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर फिल ज़करमैन कहते हैं कि इस समय दुनिया में पहले के मुक़ाबले नास्तिकों की संख्या बढ़ी है और इंसानों में इनका प्रतिशत भी बढ़ा है। यह तथ्य गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में उभरकर सामने आया है। गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में 57 देशों में 50,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया।

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नास्तिकों की संख्या बढ़ी :  सर्वे के मुताबिक़ 2005 से 2011 के दौरान को मानने वाले लोगों की तादाद 77 प्रतिशत से घटकर 68 प्रतिशत रह गई है, जबकि ख़ुद को नास्तिक बताने वालों को संख्या में तीन प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है।

इस तरह दुनिया में नास्तिकों का आंकड़ा बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुँच गया है। अगर नास्तिकों की संख्या में बढ़ोतरी का सिलसिला यूँ ही जारी रहा तो क्या किसी दिन धर्म पूरी तरह से ग़ायब हो जाएगा?

सुरक्षा का अहसास :  धर्म का मुख्य आकर्षण है कि यह अनिश्चित दुनिया में सुरक्षा का अहसास दिलाता है। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नास्तिकों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी उन देशों में हुई है जो अपने नागरिकों को आर्थिक, राजनीतिक और अस्तित्व की अधिक सुरक्षा देते हैं।


जापान, कनाडा, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड्स, चेक गणराज्य, एस्तोनिया, जर्मनी, फ्रांस, उरुग्वे ऐसे देश हैं जहां 100 साल पहले तक धर्म महत्वपूर्ण हुआ करता था, लेकिन अब इन देशों में ईश्वर को मानने वालों की दर सबसे कम है।

इन देशों में शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था काफ़ी मज़बूत है. असमानता कम है और लोग अपेक्षाकृत अधिक धनवान हैं। न्यूज़ीलैंड की ऑकलैंड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक क़्वेंटिन एटकिंसन कहते हैं, "असल में, लोगों में इस बात का डर कम हुआ है कि उन पर क्या बीत सकती है।

लेकिन धर्म में आस्था उन समाजों और देशों में भी घटी है जिनमें ख़ासे धार्मिक लोग हैं जैसे - ब्राज़ील, जमैका और आयरलैंड। प्रोफ़ेसर फिल ज़करमैन कहते हैं कि दुनिया में बहुत कम समाज हैं जहाँ पिछले 40-50 साल के मुक़ाबले में धर्म में आस्था बढ़ी है। एक अपवाद ईरान हो सकता है लेकिन सही से आंकना मुश्किल है क्योंकि धर्मनिरपेक्ष लोग अपने विचार छिपा भी रहे हो सकते हैं।

वैंकुवर स्थित ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सामाजिक मनोविज्ञानी एरा नोरेनज़ायन कहते हैं कि "धर्म के प्रति आस्था में कमी का मतलब इसका ग़ायब हो जाना नहीं है।
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