बाल ठाकरे से उद्धव ठाकरे : रिमोट कंट्रोल से मुख्यमंत्री तक

BBC Hindi| Last Updated: गुरुवार, 28 नवंबर 2019 (11:05 IST)
-गुरप्रीत सैनी (बीबीसी संवाददाता)

बंबई यानी आज की मुंबई। यहां 1966 में शिवसेना अस्तित्व में आई। पार्टी की स्थापना बाल ठाकरे ने की थी जिनका कहना था कि महाराष्ट्र में वहां के युवाओं के हितों की रक्षा सबसे ज़रूरी काम है। 2019 से पहले यानी बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे से पहले, ठाकरे परिवार का कोई सदस्य कभी मुख्यमंत्री नहीं बना।
हालांकि शिवसेना पार्टी से 2 मुख्यमंत्री ज़रूर हुए- मनोहर जोशी और नारायण राणे। लेकिन ठाकरे परिवार से कोई व्यक्ति ना तो कभी मंत्री रहा और ना ही किसी सरकारी संस्थान का सदस्य। 50 साल से भी पुरानी इस पार्टी का नेतृत्व करने वाले ठाकरे परिवार से आदित्य ठाकरे वो पहले शख्स हैं, जो चुनाव लड़े।

अब उद्धव ठाकरे वो पहले शख्स बनने जा रहे हैं जो ठाकरे परिवार से महाराष्ट्र के पहले मुख्यमंत्री होंगे। वो आज शाम शिवाजी पार्क में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, वही शिवाजी पार्क जिसे बाल ठाकरे अपनी कर्मभूमि कहा करते थे। ऐसे में चर्चा ये भी हो रही है कि अब तक ठाकरे परिवार सत्ता से दूर क्यों रहा था?
वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स कहते हैं कि बाल ठाकरे हमेशा सत्ता से बाहर रहे, क्योंकि उनकी राजनीति का स्टाइल अलग था। लेकिन सत्ता के बाहर रहने के बावजूद वो पावर सेंटर बने रहे।
समर खड़स कहते हैं, 'बाल ठाकरे जो कहते थे, महाराष्ट्र की राजनीति में वही होता था। सत्ता में बैठा व्यक्ति अगर बाल ठाकरे की बात नहीं भी मानता था तो भी उनके चाहने वाले इतने लोग थे कि वो अपने तरीके से मनवा लेते थे। इसलिए वो कभी सत्ता में नहीं आए।'
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सुजाता आनंदन का कहना है कि ठाकरे परिवार सत्ता से इसलिए दूर रहा, क्योंकि वो सत्ता हासिल नहीं कर सकते थे।

सुजाता कहती हैं, 'ज़्यादा से ज़्यादा उन्होंने महानगरपालिका में सत्ता हासिल की थी। लेकिन वहां एक बार सत्ता हासिल करने के बाद उन्हें समझ आया कि सत्ता का मतलब क्या होता है। इसलिए उन्होंने आजतक बृहन्मुंबई महानगरपालिका को अपने पास से जाने नहीं दिया है।'
सुजाता आनंदन कहती हैं, 'विधान सभा में आने के लिए ठाकरे परिवार को भाजपा के साथ गठबंधन करना पड़ा था। इससे पहले उनके इतने उम्मीदवार चुनकर ही नहीं आते थे कि वो सत्ता का भाग बन सकें। और 90 के दशक के बाद राजनीति में जो समीकरण बदला है, हिंदुत्ववादी सरकारें आने लगी हैं, उनके साथ गठबंधन करके शिव सेना सत्ता के क़रीब आई है।'

उनका कहना है कि 50 साल पुरानी पार्टी जैसे 1967 में काम करती थी, उस तरह 2019 में काम नहीं कर सकती। इसलिए काम करने का तरीक़ा बदला है, पूरी राजनीति बदली है। इसलिए ठाकरे परिवार से उद्धव ठाकरे पहले नेता उभर कर आ रहे हैं, जो सत्ता हासिल करके मुख्यमंत्री बनेंगे।
Uddhav Thackeray
सत्ता का 'रिमोट कंट्रोल'
1995 में जब उनकी पहली गठबंधन सरकार आई और मनोहर जोशी मुख्यमंत्री बने थे, तब बाल ठाकरे ने कहा था कि इस सरकार का मेरे हाथ में रहेगा।
सुजाता आनंदन बताती हैं, 'बाल ठाकरे ने कहा था कि मैं जिस तरह चाहता हूं, उस तरह इस सरकार को चलाऊंगा। थोड़ा बहुत उन्होंने वैसा किया भी। काफ़ी विवादित एक पावर कंपनी थी एनरॉन, वो मंत्रालय में जाकर मनोहर जोशी से बात करने के बजाए मातोश्री में बैठकर, ठाकरे से बात कर कॉन्ट्रेक्ट निकाल कर लाते थे। इस तरह रिमोट कंट्रोल तो बाल ठाकरे के पास था ही। सब जानते थे कि मनोहर जोशी से बात करने से कुछ हासिल नहीं होगा।'
उनका मानना है कि बाल ठाकरे के समय शिवसेना एक 'गुंडा पार्टी' थी। वो बताती हैं कि 'उस वक्त मुंबई और ठाणे में शिवसेना की बहुत दहशत थी। इस वजह से बाल ठाकरे को सत्ता हासिल करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। अपने सारे काम वो मुख्यमंत्रियों से करवा लेते थे, ज़बरदस्ती करवा लेते थे।' लेकिन पिछले 10-12 सालों में जबसे उद्धव के हाथ में शिवसेना की डोर आई है, तबसे उद्धव ने पार्टी को मेनस्ट्रीम करने की कोशिश की है।
सुजाता कहती हैं कि उद्धव ठाकरे ने पार्टी की 'गुंडा' इमेज को बदला है। वो कहती हैं, 'एक तरह से सज्जन पार्टी बनाने की कोशिश की है, ताकि उनकी पार्टी को गुंडो की नज़र से ना देखा जाए। इसलिए अब उन्हें सत्ता हासिल करने के सारे तरीक़े अपनाने पड़ रहे हैं, जैसे चुनाव लड़ना, एसेंबली में जाना, संसद में जाना, ये सब करना उनके लिए ज़रूरी हो गया है।'

मेनस्ट्रीम पार्टी
सुजाता आनंदन कहती हैं कि लोग जितना बाल ठाकरे को मानते थे और जितना उनसे डरते थे, लेकिन उद्धव के साथ ये बात नहीं है। इसलिए उद्धव ठाकरे के पास किसी नेता का रिमोट कंट्रोल नहीं हो सकता। यही वजह है कि उद्धव के लिए ये ज़रूरी था कि वो मुख्यमंत्री बने और राज्य की राजनीति को अपने हिसाब से चलाएं।

समर खड़स कहते हैं, 'राजनीति ऐसी चीज़ है कि वो पल-पल में बदलती है। उद्धव ठाकरे वो कर रहे हैं, जो आज की राजनीति के हिसाब से सही है। क्योंकि अब बाल ठाकरे नहीं हैं, उनके बाद राजनीति काफ़ी बदल चुकी है। इसलिए उद्धव ठाकरे ने इतना बड़ा फ़ैसला किया।'
अब जब सत्ता सीधे ठाकरे परिवार के हाथ में आ गई है, तो अब वो कैसे काम करेंगे?

सुजाता आनंदन कहती हैं कि ये तो रुककर देखने वाली बात होगी। फ़िलहाल सब इस बात की आशंका जता रहे हैं कि उद्धव ठाकरे पहली बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, वो ठीक तरह से सरकार चला पाएंगे या नहीं? 'लेकिन मनोहर जोशी भी तो पहली बार ही मुख्यमंत्री बने थे, देवेंद्र फडणवीस ने भी पहली बार ही मुख्यमंत्री पद हासिल किया था, बल्कि वो तो उम्र में उद्धव ठाकरे से कम भी थे।'
उनका कहना है कि किसी ना किसी को पहली बार सत्ता हासिल करनी पड़ती है और रुककर देखना पड़ता है कि वो किस तरह से सरकार चला पाते हैं। 'कुछ लोगों ने सरकार ठीक चलाई, कुछ ने नहीं चलाई। तो जैसे-जैसे वक्त बीतेगा, पता चलेगा कि वो सरकार चला पा रहे हैं या नहीं।'

कहा जा रहा है कि अब सरकार बनने के बाद शरद पवार की भूमिका भी काफ़ी अहम रहने वाली है। सुजाता आनंदन के मुताबिक़ कहा जा सकता है कि शरद पवार अब बैक सीट ड्राइविंग करेंगे, यानी पिछली सीट पर बैठकर गाड़ी चलाएंगे।
'अन क्राउन किंग'

उनका मानना है कि इस सरकार में एनसीपी की भूमिका बहुत बड़ी हो गई है। उद्धव ठाकरे के पास अनुभव नहीं है। वो ब्यूरोक्रेट्स पर निर्भर रहेंगे, वो पिछली सरकारों में अनुभव रखने वाले मंत्रियों पर भी थोड़ा बहुत निर्भर रहेंगे, लेकिन सबसे ज़्यादा वो एनसीपी के ऊपर ही निर्भर रहेंगे। इसलिए कह सकते हैं कि पूरी सत्ता अभी शरद पवार के हाथ में आई है।

वो कहती हैं, हम इतने सालों से शरद पवार को कहते आए हैं कि वो महाराष्ट्र के 'अन क्राउन किंग' हैं। अब महाराष्ट्र में वापस से वही स्थिति आ गई है कि सत्ता में रहे बगैर पूरी सत्ता शरद पवार के हाथ में है। लेकिन समर खड़स का मानना है कि शरद पवार ऐसी राजनीति करते ही नहीं हैं कि रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाएं।
उनका मानना है, 'शरद पवार की राजनीति का स्टाइल अलग है। उन्होंने पूरे विश्वास से उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाया है। उद्धव ठाकरे शुरू में मान नहीं रहे थे। लेकिन शरद पवार ने उनसे कहा कि अगर इस सरकार को स्थिर बनाना है तो आपको इसकी बागडोर संभालनी पड़ेगी। फिर उद्धव ठाकरे मान गए। इसलिए मुझे लगता है कि शरद पवार रिमोट कंट्रोल की राजनीति करते नहीं हैं। वो एक दिशा तय करते हैं, एक प्रोग्राम तय करते हैं कि शहरों का विकास कैसे करना है, मज़दूरों को क्या देना है, कॉरपोरेट सेक्टर के लिए क्या करना है।'

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