कहाँ है बच्चों का बचपन?

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क्या ज्यादा मूल्यवान है- बर्गर या परमल, गुड़ और मूँगफली दाने से बने वो अनगढ़-से लड्डू? बचपन तो वही है, परिस्थितियाँ बदल गई हैं। अब गरमी या बड़े दिन की छुट्टियाँ भर दुपहरी में कुलाँचे भरने नहीं बल्कि हॉबी क्लास ज्वॉइन करने में गुजर जाती हैं। अष्टचंग-पे की जगह अब हिंसक वीडियो व कम्प्यूटर गेम्स ने ले ली है। वो भी शाही बचपन ही था जब कभी चवन्नी पास हो या रंगीन चॉक मिलने पर हम अपने आपको राजा से कम नहीं समझते थे और सुविधाओं से भरा, नाजो पला ये बचपन तामझाम के लिहाज से शाही है। फिर भी पता नहीं, क्यों उस मिट्टी की सौंधी महक के बचपन के आगे इस बचपन की खुशबू दब-सी जाती है।

आज घर-घर में एक या दो ही बच्चे होते हैं और वे तमाम सुख-सुविधाओं में पल रहे हैं। माता-पिता प्रेम, पैसा लुटाकर उनकी हर जरूरत पूरी करने में जुटे हैं। यहाँ तक कि उनका भविष्य भी 'सिक्योर' (सुरक्षित) करने की जिम्मेदारी समझते हुए अपना वर्तमान दाँव पर लगाए हैं। उनके खाने-पीने की हर इच्छा, आकर्षक खिलौने, रंग-बिरंगे महँगे कपड़े, नरम बिस्तर सब कुछ उनके एक इशारे पर उपलब्ध हैं। उन्हें अच्छे से अच्छे स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए माता-पिता अपनी हैसियत के अनुसार पैसा, पहचान व प्रभाव सभी कुछ प्रयोग में लाते हैं, स्वतः 'इंटरव्यू' के लिए तक तैयार होते हैं।

उन्हें लाने-ले जाने के लिए आरामदेह गाड़ियाँ या बसें होती हैं। स्कूल यूनिफार्म भी तीन प्रकार की, जूते-मोजे तीन प्रकार के, कई सुंदर किताबें, कॉपियाँ सबकी पूर्ति पलक झपकते ही हो रही है। इसके अलावा उनके सर्वांगीण विकासके लिए महँगे खेल, विशेष मार्गदर्शन के लिए तीन या पाँच वर्ष की उम्र से ही विशेष संस्थाओं में अलग से प्रवेश दिलाया जाता है। इसके अलावा बर्थ डे पार्टीज, पिकनिक, वीकएंड पर हॉटलिंग, कभी जू तो, कभी वॉटर पार्क की सैर, हाथ में घड़ी, मोबाइल व घूमने के लिए टूव्हीलर या बाइक सब कुछ सहज प्राप्त। इन बच्चों को घर का कोई काम करने को कभी कहा नहीं जाता।

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वे जो तय करें वही मैन्यू बनता है। उनकी पढ़ाई माता-पिता की ही जिम्मेदारी है, वे ही स्कूल जाकर उनकी कमजोरियों का पता लगाते हैं। उनकी पसंद-नापसंद का अत्यधिक खयाल रखा जाता है। छोटे या बड़े घर, मध्यमवर्गीय, उच्चमध्यम वर्गीय या उच्च वर्गीय परिवारों में अधिकांशतः उनका अलग बैडरूम होता है, खिलौनों या कम्प्यूटर, म्यूजिक सिस्टम, टीवी, फोन इत्यादि से सुसज्जित।



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