चेक पर लिखावट की जाँच के आदेश

रतलाम | Naidunia| पुनः संशोधित बुधवार, 4 अप्रैल 2012 (01:15 IST)
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दूसरे व्यक्ति द्वारा दिए गए कोरे चेक पर मनमानी राशि भरने के बाद चेक नहीं सिकरने पर वसूली का दावा लगाना कानूनन सही नहीं है। मप्र हाईकोर्ट ऐसे ही एक मामले में निचली अदालत के फैसले को उलटते हुए चेक लेने वाले की लिखावट की भोपाल स्थित फोरेंसिक लैब से जाँच कराने के आदेश दिए हैं।


अभिभाषक केसी रायकवार के अनुसार उनके पक्षकार रणसिंह डामोर ने सुनील शर्मा से 40 हजार रु. उधार लिए थे। इसके एवज में श्री डामोर ने श्री शर्मा को दो कोरे हस्ताक्षरित चेक दे दिए थे। श्री डामोर ने कुछ राशि चुका दी थी और कुछ बकाया थी। श्री शर्मा ने इस राशि की वसूली के लिए श्री डामोर द्वारा दिए गए चेक पर 1लाख 5 हजार की राशि भरकर बैंक में पेश किया। हो गया तो श्री शर्मा ने परक्राम्य लिखित अधिनियम की धारा 138 के तहत श्री डामोर पर मुकदमा लगा दिया।


निचली अदालत में श्री डामोर ने कहा कि श्री शर्मा ने चेक पर मनमाने तरीके से राशि भर ली जबकि श्री शर्मा का कहना था कि यह समूचा चेक श्री डामोर ने ही लिखा था। बहरहाल श्री डामोर ने चेक पर अपने हस्ताक्षर होने की बात तो स्वीकार की, लेकिन बाकी लिखावट से इंकार किया। दूसरी ओर श्री शर्मा ने निचली अदालत में इस बात से इंकार किया कि चेक में राशि और विवरण उन्होंने अपने हाथ से भरा था। श्री डामोर ने अपने बचाव में चेक की लिखावट की जाँच किसी विशेषज्ञ से कराने की माँग की, लेकिन निचली अदालत ने यह माँग इस आधार पर खारिज कर दी कि श्री डामोर ने चेक पर अपने हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है। इसी आधार पर जिला न्यायालय ने श्री शर्मा के हक में फैसला दिया था।


इस फैसले के खिलाफ श्री डामोर ने हाईकोर्ट में अपील पेश की थी। श्री रायकवार ने तर्क दिया कि श्री शर्मा अपने आय-व्यय का कोई खाता-बही नहीं रखते और वे यह साबित नहीं कर पाए हैं कि उनके द्वारा श्री डामोर को दी गई 1 लाख 5 हजार की राशि वास्तव में उनके पास थी भी। इतनी बड़ी राशि उनकी आय से भी मेल नहीं खाती। हाईकोर्ट ने उनके तर्कों से सहमति जताते हुए चेक की लिखावट की भोपाल स्थित फोरेंसिक लैब से जाँच कराने का आदेश दिया है।



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