जरूरत है विवेकानंद के चिंतन और विचारों की

बड़वानी | Naidunia| पुनः संशोधित गुरुवार, 12 जनवरी 2012 (00:47 IST)
नईदुनिया ने शहर के युवाओं से जयंती पर आज के परिप्रेक्ष्य में विचार जानें। इसमें यहाँ के व्याख्याता सुनील पुरोहित कहते हैं कि टेलीविजन के कार्यक्रम हमारी संस्कृति व सभ्यता को नष्ट कर रहे हैं। यह अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। देश के सामने भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है। विकास एवं गरीबों के कल्याण की अनेक योजनाओं के लाभ को भ्रष्टाचार की दीमक चट कर जाती है। श्री पुरोहित का संकल्प है कि वे अपने स्तर पर किसी भी स्थिति में अपनी आँखों के सामने भ्रष्टाचार नहीं होने देंगे। छात्र-छात्राओं को समय-समय पर नैतिकता का पाठ भी पढ़ाते हैं। उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानंद के विचार समाज और देश को नई उर्जा प्रदान करते हैं। देश को नैतिकता की बुलंदियों पर ले जाना है, तो हमें उनके विचारों को जीवन में उतारना चाहिए।


पतन का रास्ता है नशाखोरी

एमए (समाजकार्य) फाइनल के विद्यार्थी विप्लव शर्मा युवाओं को नशाखोरी व नैतिक मूल्यों में गिरावट से बचने की सलाह देते हैं। उनके मुताबिक नशाखोरी एवं पाश्चात्य संस्कृति को अपनाना एक फैशन बन गया है जबकि यह रास्ता पतन की ओर ले जाता है। अराजकता और महँगाई को वे ज्यादा खतरनाक मानते हैं, क्योंकि अगर इन पर रोक नहीं लगी तो अपराधिक प्रवृत्तियाँ भी बढ़ेंगी। बढ़ती महँगाई के साथ जनसंख्या पर नियंत्रण को भी वे जरूरी माानते हैं। श्री शर्मा ने विवेकानंद की कहानियाँ पढ़ी हैं। स्कूल, कॉलेज स्तर पर विद्यार्थियों को सही दिशा देने के लिए वे बौद्घिक कार्यक्रम करवाते रहते हैं।


जागरूकता पैदा करना होगा

हायर सेकंडरी की छात्रा तारा सेप्टा ने बताया कि भ्रष्टाचार, आतंकवाद, नशाखोरी को जड़ से मिटाने के लिए हमें समाज में जागरूकता पैदा करना चाहिए। विद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं विचार गोष्ठी के माध्यम से नैतिक मूल्यों को बढ़ाने एवं सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए हम प्रयास करते हैं। विवेकानंदजी का साहित्य पढ़कर लगा कि आपको बड़ा या महान बनना हो तो किसी को नष्ट करने की बजाय, स्वयं को बड़ा एवं महान बनाना होगा।


बुराइयों के लिए हम जिम्मेदार

बीएससी फाइनल की छात्रा शैफाली कड़ेल ने कहा कि नैतिक मूल्यों की गिरावट, भ्रष्टाचार, महँगाई, कामचोरी, नशाखोरी एवं आतंकवाद जैसी बुराइयों को बढ़ाने में हम पूर्णतः जिम्मेदार हैं। इनके खिलाफ हम आवाज नहीं उठाते या फिर सोचते हैं कि कोई और पहल करेगा तो हम फिर हम पीछे हो लेंगे। व्यक्ति नैतिकता को ध्यान में रखकर दृढ़ संकल्प कर ले तो बुराइयाँ हावी नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि स्वामीजी का साहित्य वैसे तो कम पढ़ा है, फिर भी उनका ये वाक्य मुझे बहुत हिम्मत देता है कि उठो-जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर लो।


अनैतिकता की ओर ढकेला

युवा अध्यापक अनिल मिश्र कहते हैं कि जिस युवा में वायु जैसा तेज एवं चंचलता होनी चाहिए, वह आज जरूरतों का अंबार लगाकर लक्ष्यहीन एवं अनियमित जीवन जी रहा है। नैतिक मूल्यों में गिरावट ने युवाओं को अनैतिक कार्यों की ओर धकेल दिया है। फिल्मी अपसंस्कृति ने लुटिया डुबोई है। उन्होंने कहा कि 'शिक्षित होना फिजूल है, गर हो न संस्कार। संस्कारहीन ही रचें, घोटाला संसार'। मुझे नैतिक मूल्यों का विकास एवं जरूरतमंदों की अनुकूल मदद का विवेकानंदजी का भाव खूब भाता है।


भटक रहे हैं युवा

कक्षा 12 वीं के छात्र आशुतोषसिंह चौहान ने विवेकानंदजी के चिंतन तथा विचारों को इसलिए प्रासंगिक मानते हैं क्योंकि राष्ट्र के नागरिकों का नैतिक एवं चरित्रिक पतन हो रहा है। तमाम बुराइयों का कुप्रभाव निरंतर बढ़ रहा है। युवा अपनी जिम्मेदारी भूल रहे हैं, विद्यार्थी भटक रहे हैं। हमें नैतिक मूल्यों के सुधार के लिए विवेकानंदजी की पुस्तकों का पठन करना चाहिए। -निप्र


बीएआरजेएएन 101 अनिल मिश्र।

बीएआरजेएएन 102 आशुतोषसिंह चौहान।

बीएआरजेएएन 103 तारा सेप्टा।

बीएआरजेएएन 104 सुनील पुरोहित।
बीएआरजेएएन 105 विप्लव शर्मा।

बीएआरजेएएन 106 शैफाली कड़ेल।



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