तेनालीराम की कहानियां : मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी

WD|

उसे देखते ही राजा चौंक पड़े। ‘तेनालीराम, तुमने यहां भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा।’

‘तुम लोगों का पीछा कैसे छोड़ता भाई? अगर मैं पीछा न करता तो तुम इन सरल हृदय किसानों को मौत के घाट ही उतरवा देते। महाराज के दिल में क्रोध का ज्वार पैदा करते, सो अलग।’

‘तुम ठीक ही कह रहे हो तेनालीराम। मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी होता है। भविष्य में मैं कभी तुम्हारे अलावा किसी और को साथ नहीं रखा करूंगा।’
उन सबकी आपस की बातचीत से गांव वालों को पता चल ही गया था कि उनकी झोपड़ी पर स्वयं महाराज पधारे हैं और भेष बदलकर पहले से उनके बीच बैठा हुआ आदमी ही है तो वे उनके स्वागत के लिए दौड़ पड़े।

कोई चारपाई उठवाकर लाया तो कोई गन्ने का ताजा रस निकालकर ले आया। गांव वालों ने बड़े ही मन से अपने मेहमानों का स्वागत किया। उनकी आवभगत की। राजा कृष्णदेव राय उन ग्रामवासियों का प्यार देखकर आत्मविभोर हो गए। तेनालीराम की चोट से आहत हुए दरबारी मुंह लटकाए हुए जमीन कुरेदते रहे और तेनालीराम मंद-मंद मुस्करा रहे थे



और भी पढ़ें :