सिंहासन बत्तीसी : सत्‍ताइसवीं पुतली मलयवती की कहानी

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कोई एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या करने लगा तो कोई एक हाथ उठाकर, कोई कांटों पर लेटकर तपस्या में लीन हो गया तो कोई गर्दन तक बालू में धंसकर। चारों ओर सिर्फ ईश्वर के नाम की चर्चा होने लगी और पवित्र वातावरण तैयार हो गया।

विक्रम ने कुछ समय बाद जल भी लेना छोड़ दिया और बिल्‍कुल निराहार तपस्या करने लगे। अब उनका शरीर और भी कमज़ोर हो गया और सिर्फ हड्डियों का ढांचा नजर आने लगा। कोई देखता तो दया आ जाती, मगर राजा विक्रमादित्य को कोई चिन्ता नहीं थी।

विष्णु की आराधना करते-करते यदि उनके प्राण निकल जाते तो सीधे स्वर्ग जाते और यदि विष्णु के दर्शन हो जाते तो दैत्यराज बली से मिलने का मार्ग प्रशस्त होता। वे पूरी लगन से अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए तपस्यारत रहे। जीवन और शरीर का उन्हें कोई मोह नहीं रहा। राजा विक्रमादित्य का हुलिया ऐसा हो गया था कि कोई भी देखकर नहीं कह सकता था कि वे महाप्रतापी और सर्वश्रेष्ठ हैं।
राजा के समीप ही तपस्या करने वाले एक योगी ने उनसे पूछा कि वे इतनी घोर तपस्या क्यों कर रहे हैं? विक्रम का जवाब था- 'इहलोक से मुक्ति और परलोक सुधार के लिए।' तपस्वी ने उन्हें कहा कि तपस्या राजाओं का काम नहीं है। राजा को राजकाज के लिए ईश्वर द्वारा जन्म दिया जाता है और यही उसका कर्म है। अगर वह राज-काज से मुंह मोड़ता है तो अपने कर्म से मुंह मोड़ता है।



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