जरूरी है दोनों की भावना और चाहत

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हेलदोस्तो! समय बीतने के साथ-साथ हम कुछ लोगों के व्यवहार से इतने परिचित हो जाते हैं कि हमें मालूम होता है कि यदि ऐसी स्थिति हुई तो उसकी वैसी प्रतिक्रिया होगी। इसलिए तनाव की गुंजाइश कम होती है क्योंकि हमारी मानसिक तैयारी उस प्रतिक्रिया से सामना करने की बन जाती है। पर बहुत से लोग ऐसे होते हैं कि हम उनके बेहद करीब हों फिर भी हम सुनिश्चित नहीं कर पाते कि किन हालात में उस व्यक्ति विशेष का क्या व्यवहार होगा।

अक्सर अप्रत्याशित व्यवहार के कारण यह तनाव और दुविधा बनी रहती है कि न जाने क्या होने वाला है। गुस्सा होगा तो किस हद तक होगा और खुशी होगी तो कितनी देर की होगी। नाराजगी कब तक चलेगी और कैसे मनाया जाए उसे। ऐसे रवैये से रिश्तों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। खासकर वह व्यक्ति ही पीड़ित होता है जिसे यह मनमौजी व्यवहार झेलना पड़ता है। उस व्यक्ति के लिए प्यार करना गुनाह करने के समान हो जाता है। न तो उससे नाता तोड़ते बनता है और न ही पूर्ण रूप से उसे आत्मसात करते बनता है। यह द्वंद्व की स्थिति निश्चित रूप से रिश्ते को मजबूत होने नहीं देती है।

ऐसी ही स्थिति की शिकार हैं अवनी। वह जिसे प्यार करती हैं, वह कभी तो उसका बेहद ख्याल रखता है और कभी लापरवाह हो जाता है, जैसे उसे उसकी किसी भी परेशानी से कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। अवनी झगड़ा करती है और बोलचाल बंद हो जाती है पर मार्के की बात यह है कि हमेशा पहल अवनी को ही करनी पड़ती है। अवनी जी, आपने पूछा है कि ऐसा क्या किया जाए कि आप दोनों में समझबूझ विकसित हो जाए या फिर आप उसे भूल जाएँ जोकि आपको असंभव सा लगता है।

अवनी जी, बेशक आप बहुत पीड़ा में रहती हैं क्योंकि उसके बिना कोई व्यक्ति किसी को भूलने की बात नहीं करता है। दरअसल, जब कोई रिश्ता केवल किसी एक व्यक्ति की जरूरत पर आधारित हो तो उस रिश्ते के स्थायित्व पर प्रश्नचिह्न लग ही जाता है। दोनों के लिए खुशी, चिंता, दुख, ग्लानि की समान गुंजाइश नहीं रहती है। दूसरा व्यक्ति निर्विकार रूप से उस रिश्ते में रहता है। जब मूड हुआ, दया आई या उसे संग और संवाद की जरूरत महसूस हुई तो समय दे दिया वरना अन्य दिनचर्या में उस रिश्ते का स्थान नहीं।

अनुभव यही बताते हैं कि केवल किसी एक के कंधे पर ऐसे रिश्ते का बोझ डालकर ज्यादा समय तक नहीं चला जा सकता है। एक अकेला व्यक्ति कहाँ तक संबंध की गाड़ी खींच पाएगा। वह न केवल बुरी तरह थक जाएगा बल्कि टूट भी जाएगा। ऐसे में यदि रिश्ता समाप्त हो जाए तो उसके पास अपना आगे जीवन संवारने के लिए ताकत नहीं बचेगी।

ऐसे एकतरफा रिश्ते से जी कड़ा करके निकल जाना चाहिए। यदि दोनों व्यक्ति की चाहत समान नहीं है तो आज न कल उस रिश्ते को टूटना ही है। उसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाएं यही बेहतर है। आपको लग सकता है कि उसके पास समय का अभाव है। लेकिन यदि किसी की नीयत साफ है तो समय की कमी ज्यादा मायने नहीं रखती है। वह वाजिब वजह बता सकते हैं और सामने वाले को उस पर यकीन भी होगा पर यदि किसी व्यक्ति में आपके साथ समय बिताने की इच्छा ही न हो तो वैसे व्यक्ति से समय की कमी का रोना रोना कहाँ की अक्लमंदी होगी।

अवनी जी, हो सकता है कि आपके साथी के पास सचमुच समय का अभाव हो, वह यह सोचता हो कि आप झगडने के बजाय उसकी इस दिक्कत को समझेंगी। पर, जो बात सबसे ज्यादा इस रिश्ते में अखर रही है, वह है झगड़ा होने पर हमेशा आपके द्वारा पहल करना, मनाना, माफी माँगना। सप्ताह बीतने के बाद भी उसे आपसे संवाद बनाने के लिए तड़प नहीं महसूस होती है बल्कि आप ही बेचैन होकर उसे मनाने चल पड़ती हैं। इसका क्या अर्थ निकाला जाए। आपका दोस्त हमेशा यही सोचता है कि पूरी गलती आपकी है इसलिए माफी भी उसे ही माँगनी पड़ेगी। दूसरा, आप बोलें या रूठे उसकी बला से।

घुटने टेकती हैं तो ठीक है वरना आप जाएँ अपनी राह। किसी भी रिश्ते की सबसे दुखद स्थिति है, एक-दूसरे का सम्मान नहीं करना। एक-दूसरे को गंभीरता से नहीं लेना। प्यार व परवाह करना थोड़ा कम हो तो चल सकता है पर कुछ घटने पर जवाबदेही महसूस नहीं करना, उसे बस हलकेपन से लेना, बेहद अपमानजनक स्थिति है। कभी भी झगड़े को सुलझाने के लिए पहल नहीं करना, ऐलानिया तौर पर यह कहना है कि मुझे तुम्हारे दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं है और न ही मैं तुम्हारी भावना की कद्र करता हूँ। पर जब भी दो व्यक्ति के बीच अनबन या झगड़ा होता है तो ज्यादा या कम गलती दोनों की होती है। समझदारी का ठेका केवल एक व्यक्ति को तो सौंपा नहीं जा सकता है न!

आप सँभल जाएँ और परिपक्व व्यवहार करें। आपने बहुत प्यार, दुलार, मनुहार लुटाया है अब उसे भी मौका दें। यदि वह पहल नहीं करता है, लौटकर नहीं आता है तो आपको अपने संबंध के भविष्य का जवाब मिल गया।
अवनी जी, आप काफी हद तक समझ गई होंगी कि आपका रिश्ता कितना परिपक्व है। कितनी दूर यह चल सकता है। अपने जीवन में शांति, सुकून और उज्ज्वल भविष्य चाहिए तो अपना जी कड़ा करके एक बार महीना-छह महीना के लिए किसी काम में व्यस्त हो जाएँ। आपको जितनी मानसिक तकलीफ हो, आप उससे संपर्क न करें। अगर उसे सचमुच आपकी दोस्ती और प्यार की जरूरत है तो वह अपनी आदत बदलकर आपसे बात करने की पहल करेगा। अब विचलित और उत्तेजित होने की उसकी बारी है।

आप सँभल जाएँ और परिपक्व व्यवहार करें। आपने बहुत प्यार, दुलार, मनुहार लुटाया है अब उसे भी मौका दें। यदि वह पहल नहीं करता है, लौटकर नहीं आता है तो आपको अपने संबंध के भविष्य का जवाब मिल गया। यदि वह समझदारी और सम्मान से पेश आता है तो आप भी उतावलेपन के बजाय थोड़ा धैर्य और समझदारी दिखाएँ। रो-रोकर माँगी हुई भीख से संबंध कितने दिन टिकाऊ और खुशियों भरा हो सकता है, जहाँ दोनों एक दूसरे की भावना का आदर करें और बराबर की चाहत महसूस करें।

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