जहाँ यमराज ने की थी तपस्या

- हरीश शाह

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सूर्य मंदिर का परिचय:
धर्मारण्य का विशालकाय सूर्य मंदिर पुष्पावती नदी के किनारे पर स्थित है। मंदिर के सामने एक विशाल कुंड है जिसे रामकुंड के नाम से जाना जाता है। इस कुंड में बहुत सारी सीढ़ियाँ है जो कि कुंड में स्थित जल तक जाती है। इस कुंड की सीढ़ियों के कोनों में देवी-देवताओं की सुंदर-सुंदर प्रतिमाएँ हैं। यह कुंड उत्तर से दक्षिण 176 फुट और पूरब से पश्चिम 120 फुट लंबा-चौड़ा है। इस मंदिर की नक्काशी बहुत ही सुंदर है जिस पर लोक-परलोक और महाभारत काल का सुंदर चित्रण किया गया है। गुजरात सरकार द्वारा संचालित सूर्य मंदिर परिसर में एक उद्यान भी है।

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सूर्य मंदिर कपौराणिक महत्व :
मोढेरा का सूर्य मंदिर राजा भीम देव ने संवत् 1026 में बनवाया था। स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार भागवान राम ने रावण का वध करने के उपरांत वशिष्ट ऋषि से पूछकि ऐसा स्थान बताइए जहाँ जाकर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुआ जा सके। वशिष्ट ऋषि ने राम को जो स्थान बतलाया वह धर्मारण्य था। धर्मारण्य में राम ने एक नगर बसाया मोढेरक और यहाँ एक यज्ञ किया। वर्तमान में यहीं पर सूर्य मंदिर है। यहाँ राम ने एक और नगर बसाया था सीता पुर।

सूर्य मंदिर का खगोलीय महत्व :
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मोढेरा का सूर्य मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है अत: सूर्य मंदिर को इस प्रकार से बनाया गाया है कि सूर्य की प्रथम किरण मंदिर के गर्भगृह में बनी सूर्य भगवान की मूर्ति पर पड़े। माना जाता है कि ऐसा वर्ष भर में केवल दो बार ही होता है। पहला 21 मार्च, जब पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूरा कर लेती है और दूसरा जब सूर्य, सूर्य मंदिर के ठीक सामने से उदय होता है और उसकी पहली किरण पुराने समय में जहाँ सूर्य भागवान की मूर्ति थी उस स्थान पर पड़ती है।

लेकिन अलाउदीन खिलजी ने इस मंदिर को लुटने के आलावा मंदिर पर आक्रमण कर इसकी लगभग सारी प्रतिमाओं को खंडित कर दिया था। वर्तमान में मंदिर के दरवाजे बंद रहते हैं। वर्तमान में सूरज की पहली किरण उस दरवाजे पर पड़ती है जहाँ पर मुख्य मूर्ति हुआ करती थी। यह अद्भुत नजारा देखने योग्य होता है जब सूरज की गुलाबी किरण मंदिर के दरवाजे पर पड़ती है।

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मोढेरा की माताजी : प्राचीन कल में मोढेरा नगरी धर्मारण्य नाम से जानी जाती थी। मोढेरा जो कि मोढेरा मातंगि का कुल स्थान है, यहाँ माताजी का प्रसिद्ध मंदिर है। दूर-दूर से माताजी को मानने वाले भक्त यहाँ उनके दर्शन करने आते हैं। मंदिर परिसर बहुत बड़ा है जहाँ रहने और खाने की उत्तम व्यवस्था है।

मोढेरा का इतिहास :
मोढेरा का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। मोढ़ लोग मोढेश्वरी माँ के आनुयाई है जो अंबे माँ के अठारह हाथ वाले स्वरूप की उपासना करते हैं। इस तरह मोढेरा मोढ़ वैश्य व मोढ़ ब्राह्मण की मातृभूमि है।

इस स्थान पर बहुत से देवी-देवताओं के चरण पड़े हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर ही यमराज (धर्मराज) ने 1000 साल तक तपस्या की थी जिनका तप देखकर इंद्र को अपने आसन का खतरा महसूस हुआ, लेकिन यमराज ने कहा कि वे तो शिव को प्रसन्न करने के लिए तप कर रहे हैं। शिव ने प्रसन्न होकर यमराज से कहा कि आज से इस स्थान का नाम तुम्हारे नाम यमराज (धर्मराज) पर धर्मारण्य होगा।

स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान राम भी इस स्थान पर आए थे। मान्यता अनुसार जब भगवान राम इस नगर में यज्ञ करने हेतु आए थे तब एक स्थानीय महिला रो रही थी। सभी ने रोने का कारण जानना चाहा, लेकिन महिला ने कहा कि मैं सिर्फ प्रभु श्रीराम को ही कारण बताऊँगी।

राम को जब यह पता चला तो उन्होंने उस महिला से कारण जानना चाहा। महिला ने बताया कि इस स्थान से यहाँ के मूल निवासी वैश्य, ब्राह्मण आदि पलायन करके चले गए हैं उन्हें वापस लाने का उपाय करें। तब श्रीराम ने इस नगर को पुनः बसाया व सभी पलायन किए हुए लोगों को वापस बुलाया और नगर की रक्षा का भार हनुमानजी को दिया।

लेकिन धर्मारण्य की खुशियाँ ज्यादा दिनों तक न रह सकी। कान्यकुब्ज राजा कनोज अमराज ने यहाँ की जनता पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। धर्मारण्य की जनता ने राजा को समझाया कि हनुमानजी इस नगरी के रक्षक है आप उनके प्रकोप से डरें, लेकिन राज ने जनता की बात न मनी। राजा से त्रस्त होकर फिर कुछ लोग कठिन यात्रा कर रामेश्वर पहुँचे। जहाँ हनुमानजी से अनुरोध किया और धर्मारण्य कि रक्षा करने का प्रभु श्रीराम का वचन याद दिलाया। हनुमानजी ने वचन की रक्षा करते हुए राजा को सबक सिखाया और नगर की रक्षा की।

संवत् 1356 में गुजरात के अंतिम राजपूत राजा करण देव वाघेला के अलाउदीन खिलजी से हारने के बाद मुगलों ने गुजरात पर कब्जा कर लिया। अलाउदीन खिलजी ने मोढेरा पर भी आक्रमण किया परन्तु यहाँ के उच्च वर्ग के लोग लड़ाई में भी पारंगत थे तो उन्होंने अलाउदिन खिलजी का डट के मुकाबला किया। लेकिन खिलजी के एक षड़यंत्र में वे फँस गए और मोढेरा पर खिलजी ने कब्जा कर नगर व सूर्य मंदिर को क्षति पहुँचाई।

वर्तमान धर्मारण्य (मोढेरा) में मातंगि के विशाल मन्दिर के अलावा कुछ नहीं है यहाँ के मूल निवासी अपना यह मूल स्थान छोड़ कर दूर बस गए हैं। मंदिर जीर्णोद्धार का कार्य माँ के भक्तों के सहयोग से प्रगति पर है। गुजरात के विकास के साथ ही यहाँ की सड़कों का भी विकास हुआ है जिस कारण यहाँ पहुँचना अब सुगम हो गया है।

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मैसाणा से 25 किलोमीटर और अहमदाबाद से 102 किलोमीटर की दूरी पर मोढेरा स्‍थित है जहाँ मातं‍गि का कुल स्थान है। मोढेरा से 8 किलोमीटर दूर स्थित है प्राचीन और मोढेरा से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है डीसा, जहाँ सिद्धाम्बिका माताजी का स्थान है।
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डीसा की सिद्धाम्बिका माताजी : मोढेरा से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डीसा, जहाँ सिद्धाम्बिका माताजी का कुल स्थान है। दिसावलो कि यह कुल देवी है यहाँ का मंदिर भी बहुत प्रसिद्ध है। माता के दर्शन हेतु यहाँ भक्तों की भीड़ उमड़ती है। माना जाता है कि यहाँ की देवी भी सिद्ध है। मंदिर में शांति का अनुभव होता है। दूर से देखने पर मंदिर बहुत ही आकर्षक द‍िखाई देता है। रात में मंदिर की साज-सज्जा और रोशनी मन मोह लेती है। यहाँ के मंदिर परिसर में भी रहने और खाने की उत्तम व्यस्था है। जय अम्बे। जय सिद्धाम्बिका माताजी।



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