1. चिकित्सा पद्धतियाँ
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प्राकृतिक चिकित्‍सा

- बलराज सबलो

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आधुनिक समय में जबकि बड़े शहरों में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, आहार अव्यवस्थित हो गया है। ऐसे में योग, प्राकृतिक चिकित्सा की आवश्यकता बढ़ गई है। अष्टांग योग में षट् क्रियाओं का विधान है। इसके अंतर्गत शरीर शोधन किया जाता है, अतः योग व प्राकृतिक चिकित्सा एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। शरीर शोधन प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य अंग है एवं योग से जीवन शक्ति का विकास होता है।

ईश्वर द्वारा प्रदत्त शरीर में स्वतः ही स्वस्थ होने की जीवन शक्ति विद्यमान है, किंतु आजकल पक्वाहार व भारी असमय के भोजन को ही पचाने में यह जीवन शक्ति व्यस्त रहती है व शरीर शुद्धि नहीं हो पाती, जबकि हर बीमारी का मुख्य कारण शरीर में विजातीय पदार्थों का इकट्ठा होना तथाबेमेल भोजन अधिक करना है। वहीं भोजन में अंकुरित अनाज को शामिल करना स्वस्थ रहने की ओर कदम बढ़ाना है।

अंकुरित अनाज के लाभ- यह उत्तम स्वास्थ्यवर्धक आहार है। इससे मोटापा घटता है। जीवन शक्ति बढ़ती है। शरीर के लिए आवश्यक सभी तत्व मिल जाते हैं। पाचन तंत्र को आराम मिलता है। टॉक्सिन, विजातीय द्रव्य शरीर में इकट्ठे नहीं हो पाते हैं।

भोजन में भूख अनुसार सम्मिलित करें- नीबू, सेवफल, प्याज, गाजर, शहद, अंकुरित मूँग, चना, गेहूँ, जल, सोया, टमाटर, खजूर, अंजीर, दही, मट्ठा, आँवला, लहसुन आदि।

कुछ विशेष बीमारियों में ध्यान दें- गठिया- धूप स्नान, आलू का रस, टमाटर का रस। चर्मरोग सोराइसिस आदि- चने, नीम, प्याज का उपयोग। खून की कमी- पालक का रस। बहुमूत्र- टमाटर। फेफड़ों के रोग- प्याज, लहसुन, पोदीना, धनिया की चटनी, धूप स्नान पुरानी बीमारियों का अचूक इलाज है।

योग क्या है?

योगाभ्यास इंद्रियों और नसों को अपने वश में करता है। लगातार योगाभ्यास से व्यक्ति में आहार, चरित्र, स्वच्छता, व्यवहार, क्रोध का परिवर्तन देखा गया है व इससे जीवन भी अनुशासित हो जाता है। स्थिरता, आरोग्य के साथ शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है तथा क्षमता व एकाग्रता में वृद्धि होती है।

याद रखने लायक बात यह है कि विभिन्न बीमारियों से ग्रसित रोगी बिना सही मार्गदर्शन के योग न करें। अन्यथा लाभ की जगह हानि भी हो सकती है। उदाहराणार्थ उच्च रक्तचाप, हृदय रोगी, कमर दर्द वाले आगे झुकने के आसन न करें।

स्थिर सुख आसनम्‌

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स्थिरता व सुख का अनुभव हो वही आसन है। अतः किसी भी आसन में श्वास न रोकें। हृदय रोगी विशेष ध्यान दें। हर आसन के बाद पाँच लंबे श्वास-प्रश्वास लें। आसन का समय क्षमतानुसार 1/2 मि. से 2 मि. का रखें। समय श्वास अनुसार निश्चित करें। 15 से 18 श्वास 1 मिनट में लिए जाते हैं।

सूक्ष्म यौगिक व्यायाम अवश्य करें, प्राणायाम, योग निद्रा, षट् क्रियाओं आदि पर ध्यान देते हुए अष्टांग योग को जीवन में उतारने का प्रयत्न करें, आपका जीवन सार्थक हो जाएगा।

प्राकृतिक चिकित्स

इस चिकित्सा का मुख्य हिस्सा जल चिकित्सा है। इसमें कटिबाथ, मेरुदंड स्नान, एनिमा, भाप स्नान, मिट्टी स्नान, ठंडा-गर्म सेक, ट्रामा, इमर्सन बाथ, गरमपाद स्नान, चादर लपेट आदि का शरीर पर आश्चर्यजनक प्रभाव देखा गया है। साथ ही इसमें एक्युप्रेशर, सन बाथ, सूर्य किरण चिकित्सा, पिरामिड चिकित्सा, यज्ञ चिकित्सा, हवा स्नान, घर्षण आदि का भी समावेश किया जाता है व विभिन्न बीमारियों की चिकित्सा की जाती है।

मोटाप

प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत मोटापे की चिकित्सा में उसके कारणों को दूर किया जाता है। ताकि उससे होने वाली अन्य बीमारियों से व्यक्ति
  शरीर से गंदगी निकालने का प्रकृति का प्रयत्न ही रोग है और रोग के लक्षण इस प्रयत्न का प्राकृतिक फल है। दवा या किसी और रीति से इन्हें दबाना शरीर के स्वतः ही स्वच्छता के काम को बीच में ही रोककर जीर्ण रोगों को जड़ डालना है      
बचा रहे। एनिमा में नीबू, नीम, त्रिफला, मट्ठा, केस्टर ऑइल आदि का उपयोग करके आँतों को साफ किया जाता है। वहीं नीबू, अदरक, शहद, कुनकुने जल में, टमाटर, खीरे, ककड़ी, तरबूज, सेवफल, आँवले, अन्नानास, पालक, करेले व फटे दूध का पानी, सब्जी, फलों के रस आदि वजन घटाते हैं। याद रखें मोटापे से कैंसर, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, मधुमेह, जोड़ों के व कमर दर्द, गठिया, साइटिका, लकवा अपेंडिक्‍स, साइटिस, वेरीकोज वेन्स, हर्निया, स्नावयिक सूल गाल, ब्लेडर, गुर्दे की पथरी, यकृत, नपुंसकता, बाँझपन, रक्त विषाक्तता, एसीडोसिसी आदि बीमारियाँ हो सकती हैं, अतः इस पर रोक लगाना बहुत जरूरी है।

शरीर से गंदगी निकालने का प्रकृति का प्रयत्न ही रोग है और रोग के लक्षण इस प्रयत्न का प्राकृतिक फल है। दवा या किसी और रीति से इन्हें दबाना शरीर के स्वतः ही स्वच्छता के काम को बीच में ही रोककर जीर्ण रोगों को जड़ डालना है। प्राकृतिक चिकित्सा गंदगी को शरीर से निकाल फेंकने में पूरी सहायता पहुँचाती है और मनुष्य को सशक्त एवं सतेज बनाती है।