बचपन के इक बाबूजी थे

27 नवंबर हरिवंशराय बच्चनजी की जन्म शताब्दी पर विशेष

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मैंने पूछा- अमित, कहाँ तो भक्ति और आस्था की परंपराएँ और कहाँ फिल्मी जीवन! यह बताओ, बच्चनजी ने तुम्हारी कौनसी फिल्म सबसे पहले देखी थी। क्या प्रतिक्रिया थी उनकी?

आँखों में संतोष और कुछ-कुछ गर्व का सा भाव लेकर अमिताभ बोले- 'बाबूजी ने मेरी सभी फिल्में देखीं। शुरू से लेकर अंत तक एक-एक। भले ही मेरे साथ न देख पाए हों तो भी अलग से समय निकालकर देख आते थे। अपने मित्रों में फिल्म का प्रचार भी करते थे- फलाँ फिल्म देखने जरूर जाना, अमित ने अच्छा काम किया है।'

जब अस्वस्थ थे, तो प्रतिदिन शाम को मेरी एक फिल्म वीडियो या डीवीडी मँगवाकर देखा करते थे। कई फिल्में चार-पाँच बार भी देखा करते थे। हाल ही की मेरी फिल्में उन्हें ज्यादा पसंद नहीं आती थीं। आलोचना नहीं करते थे, बस हल्के से कहते थे- 'बेटा कुछ समझ में नहीं आई!' मैं समझ जाता था, वे क्या कहना चाह रहे थे।
एक बार फिर आँखें बंद करके कहीं गहरे डूबकर अमित बोले- 'याद है पुष्पाजी, सब कुछ याद है! इंसान अपने जीवन में कितना भी कमा, खा ले- अपनी जड़ें या अपने अतीत को वह नहीं भूलता। मैं जानता हूँ कि मैं कहाँ पैदा हुआ, किन परिस्थितियों में मेरे माता-पिता ने मुझे पाला और बड़ा किया। और मैं ये भी जानता हूँ कि थोड़ा-बहुत जो आज हमारे पास है यदि कल अगर न भी हो तो मुझे कोई मलाल नहीं होगा। मेरे माता-पिता मुझे पैदा होने के बाद अस्पताल से एक गुदड़ी में लपेटकर ताँगे में घर लाए थे। मैं उन्हीं परिस्थितियों में फिर वापस जा सकता हूँ और खुश रहूँगा।
ईश्वर की कृपा रही है, बड़ों का आशीर्वाद रहा है। मटीरियल कम्फर्ट्स, दुनियावी सुख-सुविधाएँ अपनी जगह होती हैं। वे आती-जाती रहती हैं। लेकिन हमारा अतीत कहीं नहीं जाएगा। कल अगर मुझे जमीन पर सोना पड़े या सड़क पर सोना पड़े, विश्वास मानिए मैं सो जाऊँगा। ईश्वर ने बहुत कुछ दिया है मुझे। अगर कल मुझे और कुछ न मिले, तो मैं समझ लूँगा कि मेरे खाते में इतना ही लिखा था और अगर कल सब कुछ चला भी जाए तो मैं मान लूँगा कि मेरे साथ ऐसा ही होना था।
मैंने कहा- अभी पाँच बरस पहले के अमिताभ को मैंने देखा और जाना है- मैं तुम्हारी इस विचारधारा की सचाई को बखूबी समझ सकती हूँ। यह भी जानती हूँ कि तुम्हारे चरित्र की, तुम्हारे मानसिक शरीर की रीढ़ की हड्डी बाबूजी ही थे। उनके जाने के बाद तुमने खुद कोकैसे संभाला?

अमिताभ की बहुत बड़ी विशेषता है कि वे कभी विचलित नहीं होते हैं। उसी आत्मविश्वास से बोले- 'अच्छे-बुरे वक्त में अपने को कैसे संभालना चाहिए जैसी बातें बाबूजी कभी शब्दों में नहीं बताते थे। बस उनकी खुद की जीवनशैली देखकर, उनकी जब-तब कही कुछ बातों को जोड़कर हमने जान लिया था कि उनकी विचारधारा ऐसी थी कि कर्म करते रहना चाहिए फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। भले ही देर से मिले, पर फल मिलता जरूर है। और फिर फल मिले तो अच्छा, न मिले तो और भी अच्छा। हमें तो बस अपनी क्षमता पर विश्वास रखना और मेहनत करने सेकभी न चूकना चाहिए।'
बाबूजी से यही सीखा है मैंने। अविराम श्रम की साधना जीवन भर करता रहूँगा। बाबूजी और माँ के आशीर्वाद से अभी तक तो यही स्थिति है कि न तो ग्लानि से मेरे नयन नीचे हैं, न ही अपनी उपलब्धियों के घमंड से हर्ष से मेरा हृदय फूल गया है। ईश्वर की कृपा रही तो आगेभी यही स्थिति रहेगी।

देखिए, हम फिल्मी कलाकारों का क्या है आज सबने सिर आँखों पर बिठाया हुआ है, कल कोई हमसे बेहतर कलाकार आ जाएगा तो वे हमें भुला भी सकते हैं, पर साहित्य में ऐसा नहीं होता न। सूर, तुलसी, कबीर आज भी जिंदा हैं। प्रेमचंद, प्रसाद, निराला कल भी पूजे जाएँगे। मेरे बाबूजी भी साहित्याकाश में एक उज्ज्वल नक्षत्र की तरह हमेशा चमकते रहेंगे। यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि मैंने उन्हें पिता के रूप में पाया।



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