26/11 Attack | मुंबई हमले की पहली बरसी
26 नवंबर : फिर कभी ना आए लौटकर
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11 सितंबर 2001 का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का हमला हो या 26 नवंबर 2008 का मुंबई ताज होटल पर हुआ वो आतंकी हमला। जब भी इसकी आहट दिल पर महसूस होती है, सिर से लेकर पैर तक का पूरा शरीर तमतमा उठता है, पूरे शरीर में एक अजीब सी भगदड़, एक अजीब हलचल और शरीर में बहते खून में एक अलग सी कमसमाहट जाग उठती है। कुछ समय के लिए दिल कह उठता है 'हाय रे ये आतंकी और उनके ये दिल को दुखाने वाले हमले।'
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होटल ताज को कब्जे में लेकर इस तरह की तबाही मचाना जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा, सचमुच दुखद है। अब पूरा एक साल हो गया है। उस आतंकी हमले में मारे गए वे बेगुनाह लोग, जो इस कल्पना से बहुत दूर रहे होंगे कि अगले ही कुछ पलों में उनकी मौत होटल के अंदर उनका इंतजार कर रही है। जिन्हें ये भी पता नहीं था कि अगले ही पल उनके और उनके परिवारवालों के लिए तबाही की, दुख की एक ऐसी बाढ़ लेकर आएगा जो इस जीवन में फिर कभी नहीं भर सकती।
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यह बात यहीं पर खत्म नहीं होती क्योंकि पुलिस वालों को तो शहीद का नाम दे दिया गया। लेकिन उन आतंकियों का क्या जिन्होंने अपनी भी जानें इस हमले के दौरान गँवाई। यहाँ सवाल यह नहीं है कि हमले में जिन अफसरों ने जान गँवाई वे बहुत ही अच्छे इंसान थे और जिन आतंकियों ने जाव गँवाई वे बहुत बुरे। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि जान चाहे कोई भी, किसी की भी गई हो, लेकिन नुकसान तो सभी का हुआ।
इस हमले में शामिल या यूँ कहे कि किसी भी हमले में शामिल आतंकी के घरवालों का भी बहुत नुकसान हुआ। उस माँ ने अपना बेटा, उस पत्नी ने अपना पति खो दिया यानी उसने अपने जीवन का सबकुछ खो दिया। हो सकता है कि आतंकी हमले में शामिल रहा बेटा उस माँ का इकलौता हो जिसकी उम्र 70 से पार गुजर रही हो,लेकिन ऐसे में उस बेटे कि चाहे जो भी मजबूरी रही हो लेकिन ये किसी भी हद तक सही नहीं....।
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अंत में सिर्फ इतना ही कि... करीब साठ घंटों तक मुंबई ने और पूरे देश ने वह खौफनाक मँजर देखा था, लेकिन अब डर तो बस इस बात का है कि ये देश, यहाँ के लोग और खासकर राजनेता इस हादसे को किसी दुस्वप्न की तरह भुला न दें क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो फिर हम मज़बूर रहेंगे बार-बार ऐसे ही हादसे देखने के लिए। और तब फिर भारत पर अंग्रेजों की तरह ही राज करने वाला कोई दूसरा गुंडाराज आ जाएगा जिसे इस देश से बाहर खदेड़ना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा।
