आत्मसंयम का नाम है तप। योग के दूसरे अंग नियम का तीसरा उपांग है तप। तप शब्द का अर्थ व्यापक है। तपस् या तप का मूल अर्थ प्रकाश अथवा प्रज्वलन है जो सूर्य या अग्नि के लिए प्रयुक्त होता है। आगे चल कर इस शब्द का अर्थ कठिन संकल्प और अनुशासन के लिए किया जाने लगा। तप से ही तपस्या शब्द की उत्पत्ति हुई है। तप का अर्थ दैहिक कष्ट कतई नहीं है। सतत अभ्यास करते रहना ही तप है। मन और शरीर की गुलामी से मुक्त होना ही तप है।
तपस्या की शुरुआत : तप की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का संकल्प ले। आहार संयम का संकल्प लें और फिर धीरे-धीरे सरल से कठिन तप की और बढ़ते जाएं। ध्यान रखें की तप में शरीर को सताना नहीं है बल्कि शरीर के दूषित पदार्थ बाहर निकालकर शरीर और मन को मजबूत बनाना है।
तप के हजारों प्रकार हो सकते हैं। तप से सिद्धियों का मार्ग खुलता है। प्रारंभ में तप की शुरुआत आहार और जल संयम से की जाती है। इसमें धीरे-धीरे संकल्प की शक्ति को बढ़ाया जाता है। संकल्प लें कि यम और नियम को साधने का प्रयास करेंगे- यही तप है। यह संकल्प, अनुशासन और प्राप्ति का रास्ता है।
तप का लाभ : तप से मानसिक और शारीरिक शक्ति का विकास होता है। शरीर, मन और मस्तिष्क हमेशा सेहतमंद बने रहते हैं। इससे आत्मबल बढ़ेगा। इस योग से किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं सताता। इससे जहां व्यक्ति के भीतर के क्रोध, लोभ, काम, बेहोशी आदि विकार निकलते हैं वहीं शरीर ताकतवान बनकर जीवन की प्रत्येक बाधाओं को पार कर जाता है।
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं।
दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें