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Written By ND

सौ बच्चों की माँ

सौ बच्चों की माँ
- सुधा मूर्ति

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कुछ लोग साम्प्रदायिक सद्भाव पर मीटिंग कर रहे थे। मैंने तय किया कि मैं भी खड़ी होकर भाषण का मजा लूँ। मैंने देखा मंच पर कई धर्मों के मुखिया बैठे हुए थे। 'सब नाटक है, भारत में सब कुछ जाति और संप्रदाय से तय होता है, यहाँ तक कि चुनाव भी। जो भी सत्ता में आता है, वह सिर्फ अपने समुदाय का भला चाहता है

भाषण देना आसान है, लेकिन उसे व्यवहार में लाना कठिन', मेरे पास खड़े बुजुर्ग ने कहा। इस बीच एक अधेड़ स्त्री ने भाषण देना प्रारंभ किया। वह अच्छी बातें कर रही थीं। 'अलग-अलग संप्रदायों को एकसाथ मिल-जुलकर रहना चाहिए और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए।' 'अच्छा भाषण है लेकिन इन बातों पर अमल कौन करता है', बुजुर्ग ने फिर कहा।

'आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?' मैंने पूछा।

'क्योंकि मेरा परिवार भुक्तभोगी है, मेरे बेटे को नौकरी नहीं मिली, क्योंकि वह एक खास समुदाय का नहीं है। मेरी बेटी का तबादला कर दिया गया, क्योंकि उसका बॉस उसकी जगह अपने समाज के किसी व्यक्ति को रखना चाहता था। जहाँ भी आप जाओ, लोग सबसे पहले आपके धर्म अथवा जाति के बारे में जानना चाहते हैं।'
  भाषण देना आसान है, लेकिन उसे व्यवहार में लाना कठिन', मेरे पास खड़े बुजुर्ग ने कहा। इस बीच एक अधेड़ स्त्री ने भाषण देना प्रारंभ किया। वह अच्छी बातें कर रही थीं। 'अलग-अलग संप्रदायों को एकसाथ मिल-जुलकर रहना चाहिए और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए।' '      


'उस महिला का नाम क्या है, जो भाषण दे रही है?' मैंने पूछा।

'वो अम्बा भवानी है, तमिलनाडु की जानी-मानी नेता।' उस नाम ने मेरे दिमाग के किसी हिस्से को झकझोरा और मैं उस भीड़-भाड़ से निकलकर बरसों पहले अपनी दादी अंबाबाई के पास पहुँच गई।

गाँव में सभी प्यार से अम्बक्का या अम्बक्काआई कहते थे। उन्होंने अपना सारा जीवन दक्षिणी कर्नाटक के एक छोटे-से गाँव में बिता दिया। अपने समय की अन्य औरतों की तरह उन्होंने भी कभी स्कूल का मुँह नहीं देखा। कम उम्र में शादी के बाद वे जल्दी ही विधवा हो गई। मैंने हमेशा उन्हें सिर मुँडाए, लाल साड़ी में देखा, जिसका पल्लू हमेशा उनके सिर पर रहता था।

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हालाँकि किशोरावस्था तक मैं नहीं समझ पाई, मगर आज भी सामान्य विधवा की तरह नहीं थी। वह महिला शिक्षा, परिवार नियोजन और समाज में विधवाओं की स्थिति के बारे में बात कर सकती थी। उस समय जब स्वास्थ्य सुविधाएँ इतनी विकसित नहीं थीं, तब गर्भवती महिलाओं की सहायता वहीं महिलाएँ कर पाती थीं, जो पहले माँ बन चुकी थीं। अज्जी उनमें से एक थी

उसे गर्व था कि उसने दस स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया था। वह गाँव की महिलाओं की जाति-संप्रदाय से ऊपर उठकर सबकी मदद करती थी। मैं हमेशा उन्हें गर्भवती महिलाओं को सलाह देते सुनती। 'सावित्री काफी सामान मत उठा, पौष्टिक खाना खा और दूध पी।' 'पीराम्बी तेरे दो बच्चे खराब हो चुके हैं, इस बार ध्यान दे

खूब सब्जियाँ और फल खा। खाली मत बैठ। गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है। हल्का-फुल्का काम कर लिया कर। अपने पति हुसैन को मेरे घर भेज दे। मैं उसे सांभर पावडर दूँगी। मेरी नातिन बहुत बढ़िया बनाती है।'

एक रात हमारे पास के गाँव में शादी थी, लेकिन अज्जी ने उसमें जाने से मना कर दिया। मैं भी अज्जी के साथ रुक गई। उस रात बड़े घर में अज्जी, मैं और हमारा नौकर दयाम्पा अकेले थे।

यह दिसंबर की ठंडी अँधेरी रात थी। मैं और अज्जी साथ-साथ सोए थे। मैंने देखा अज्जी ने अपने सिर से पल्लू हटाया और कहा, 'समाज कैसे क्रूर नियम बनाता है क्या तुम यकीन करोगी? कभी मेरे लंबे काले बाल लहराते थे और दूसरी लड़कियों की ईर्ष्या का कारण बनते थे, लेकिन जब तुम्हारे दादा का देहांत हुआ तो किसी ने मुझसे पूछा भी नहीं और मेरे सुंदर बालों को काट दिया गया

मैं जितना अपने पति के लिए रोई थी, उतना ही अपने बालों के लिए भी। किसी ने मेरा दुःख नहीं समझा। मुझे बताओ क्या पत्नी के मरने पर कोई पति जीवनभर अपना सिर मुँडवाएगा? नहीं वो तुरंत ही नई दुल्हन लाने के लिए तैयार हो जाएगा।'

उस समय मैं ये बातें नहीं समझ पाईं, लेकिन आज मैं उसकी पीड़ा को महसूस करती हूँ। कुछ समय बाद ही उसने बात बदल दी, 'पीराम्बी का समय हो चुका है, वो कभी भी माँ बन सकती है, शायद आज रात ही। वो बहुत शर्मीली है। मुझे लगता है, जब तक असहनीय दर्द नहीं होगा वो किसी को कुछ नहीं कहेगी

मैंने अपनी कुलदेवी कल्लोली वेंकटेशा और बीजापुर की दरगाह के पीर से उसके लिए प्रार्थना की।' तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। 'जरूर हुसैन होगा' अज्जी ने कहा। और वास्तव में ऐसा ही था। अज्जी ने पूछा, 'क्या पीराम्बी को दर्द शुरू हो गया है?' 'हाँ, उसे शाम से ही दर्द हो रहा है।' 'और तुम मुझे अब बता रहे हो। चलो, जल्दी चलो। तुम नहीं जानते यह समय कितना कीमती है

वह लगातार निर्देश दिए जा रही थी। हुसैन थोड़ा केक्टस काट लो और नीम की पत्तियाँ तोड़ लो। दयाम्पा तुम दो लालटेन जला दो। अज्जी ने पूजाघर जाकर प्रार्थना की और घर को ताला लगा दिया। हम चारों अँधेरी रात में हुसैन के घर की ओर चल दिए। आगे-आगे हुसैन साब लालटेन के साथ, उनके पीछे दयाम्पा दूसरी लालटेन के साथ। रास्ते भर अज्जी हुसैन और दयाम्पा को निर्देश देती जा रही थी। हुसैन पहुँचते ही बड़े भगोने को पानी से भर देना।
दयाम्पा तुम्हारी मदद करेगा। कुछ पानी उबाल लेना। मुर्गों और बछड़ों को दूर बाँध देना, वो वहाँ न पहुँचे। अंततः हम पहुँच गए। अंदर से पीराम्बी की चीखने की आवाजें आ रही थीं। हुसैन और पीराम्बी गरीब मजदूर थे। उनकी पड़ोसन महबूब बी वहाँ मौजूद थी, उसने अज्जी को देखकर राहत की साँस ली

अज्जी हाथ-पाँव धोकर अंदर चली गई और खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। हुसैन और दयाम्पा बाहर इंतजार कर रहे थे। मैं उत्सुक थी कि आगे क्या होगा। अंदर से अज्जी की आवाजें आ रही थीं। वोपीराम्बी से बातें कर रही थीं।

घबरा मत, ईश्वर पर भरोसा रखो। इस बीच उन्होंने खिड़की खोली और हुसैन से जल्दी से हल्दी पावडर माँगा। 'दयाम्पा उबले पानी का भगोना दे। हुसैन केन की ट्रे धोकर लाओ।'

दयाम्पा मुझे कुछ और कोयले दो। अगले कुछ घंटे पीराम्बी की चीख और अज्जी के सांत्वना भरे शब्द सुनाई दे रहे थे। बाहर तनाव से ग्रस्त हुसैन और दयाम्पा बीड़ी पे बीड़ी फूँक रहे थे। धीरे-धीरे रात ढल गई और उगते सूरज के साथ हमें बच्चे के रोने की आवाजें सुनाई दीं।

अज्जी ने खिड़की खोली और कहा 'हुसैन लड़का हुआ है, वो बिलकुल तुम्हारे पिता मोहम्मद साब जैसा है। माँ और बच्चा दोनों ठीक हैं।' हुसैन ने खुदा का शुक्रिया अदा किया। फिर उसने दरवाजा पीटा, वह अपने बच्चे को देखना चाहता था। 'तुम्हारे कपड़े गंदे है, जाओ पहले नहाओ फिर साफ कपड़े पहनकर अंदर आओ।' वह चिल्लाई

वह दौड़कर गया और झटपट नहाकर अंदर घुस गया। मुझे अब भी अज्जी की आवाजें सुनाई दे रही थीं। 'पीराम्बी मेरा काम खत्म हुआ, मुझे घर जाना है, आज मेरे पति की पुण्यतिथि है। घर पर अनेक कार्यक्रम हैं। पंडितजी किसी भी समय घर आ सकते हैं। अगर तुम्हें मेरी जरूरत पड़े तो हुसैन से कहलवा भेजना

पीराम्बी मौत के मुँह से बाहर आई है। महबूब बी उसका कमरा साफ रखना। बच्चे को साफ धोती में लपेट के रखना। उसे होंठों पर मत चूमना। पीराम्बी को उबला पानी पिलाना। मैं घर से शुद्ध घी और चावल रसम पीराम्बी के लिए भिजवाती हूँ। मुझे जाना होगा। भीमप्पा आज बगीचा साफ करने आने वाला है। मुझे देर हुई तो वह भाग जाएगा।'

खिड़की खोल दी गई थी। मैंने झाँककर पीराम्बी के थके, मगर प्रसन्न चेहरे की ओर देखा और देखा कि मोहम्मद साब के छोटे रूप केन की ट्रे में सोए थे। नीम की पत्तियाँ टँगी थी। कमरे में लोबान की खुशबू फैली हुई थी। थकी हुई अज्जी के माथे पर पसीना था। वो अपने औजारों को गरम पानी से धो रही थी

जैसे ही हम चलने को थे, हुसैन झुका और उसने अज्जी के पैर छुए और भावुक होकर कहा- 'अम्बक्का आई, मैं नहीं जानता कि आपका शुक्रिया कैसे अदा करूँ। हम गरीब हैं, आपको कुछ दे नहीं सकते, लेकिन मैं तहेदिल से आपका शुक्रिया अदा करता हूँ। आप सौ बच्चों की माँ हो। आप मेरे बेटे को इस धरती पर लाई हो, वो सही राह से कभी नहीं डिगेगा।'

अज्जी की आँखें भी नम थीं। उन्हें पोंछकर हुसैन को उठाया और कहा- 'हुसैन, ईश्वर केवल यही चाहता है कि हम कठिन समय में एक-दूसरे की मदद करें। पीराम्बी भी मेरी नातिनों की तरह ही है।'

हम वापस लौट रहे थे। मेरे मन में एक शंका थी। मैंने अज्जी से पूछा- 'आपने तो केवल दस बच्चों को जन्म दिया है, फिर हुसैन आपको सौ बच्चों की माँ क्यों कह रहे थे?' अज्जी मुस्कुराई और सर से सरकते पल्लू को संभालकर बोली- 'मैंने दस बच्चों को जन्म दिया है, लेकिन मेरे इन हाथों ने इस गाँव में सौ से अधिक बच्चे लाए हैं।'
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