साथी हाथ बढ़ाना
बूँद-बूँद करके भरता है घड़ा
सन् 2004 में जब सुनामी जैसी भयावह त्रासदी ने हमारे देश को छुआ तो मानवीय स्वभाव के कई रंग देखने को मिले। मीडिया के द्वारा हमें यह देखने को मिला कि उस जगह लोगों की क्या स्थिति है और उन तक मदद कैसे पहुँचाई जा रही है।जिन जगहों के बारे में खबरें लगातार मिल रही थीं, वहाँ पर लोगों के पास तुरंत राहत का सामान जैसे- साड़ी, धोती, तौलिए, स्टोव, बरतन, पीने का पानी आदि पहुँचाया जा रहा था। नागपट्टनम्, कादालुर, वेलन्कनी और काराईकल जैसे शहरों में कोई भी पुराने कपड़ों के ढेर आसानी से देख सकता था। ये ढेर सड़क के दोनों किनारे पड़े हुए थे जिनको कोई हाथ तक नहीं लगा रहा था। |
| हमारी फाउंडेशन की टीम ने रिलीफ का कार्य शुरू करने से पहले जानकारी बटोरने का कार्य शुरू किया। पहले हमने उन गाँवों का रुख किया जिनके बारे में खबरों में दिखाया नहीं जा रहा था और जिनके नाम तक शायद लोगों को पता नहीं थे। |
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इन जगहों पर रिलीफ कैंप और शादी के हॉलों में स्वयंसेवकों की कमी नहीं थी जो खाद्य सामग्री का वितरण कर रहे थे और महामारी को रोकने के लिए लोगों को इंजेक्शन लगा रहे थे। कई बार प्रभावित लोगों की ओर से ये शिकायतें आ रही थीं कि यह उन्हें दिया जाने वाला खाना उस स्थान में खाए जाने वाले भोजन से काफी अलग है। और वे लोग यह माँग भी कर रहे थे कि उन्हें उनका भोजन खुद बनाने दिया जाए।हमारी फाउंडेशन की टीम ने रिलीफ का कार्य शुरू करने से पहले जानकारी बटोरने का कार्य शुरू किया। पहले हमने उन गाँवों का रुख किया जिनके बारे में खबरों में दिखाया नहीं जा रहा था और जिनके नाम तक शायद लोगों को पता नहीं थे। हमें इस समय यह जानने को मिला कि कुछ गाँव ऐसे हैं जहाँ राहत सामग्री अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध थी जिसको रखने के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं थी। एक तरफ ऐसे शहरों में लोग चीजों के स्वामित्व के लिए लड़ने पर उतारू थे और वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे छोटे गाँव थे जहाँ लोग बिना जीवनयापन के लिए जरूरी सामान के न होने की वजह से मौत से लड़ रहे थे।इन आँकड़ों का पता चलने के बाद हमने 'सुनामी राहत किट' बनाने का फैसला किया। इस तरह की किट मैंने अमेरिका में देखी थीं जो पहाड़ों पर चढ़ाई करते समय होने वाले हादसों के लिए तैयार की गई थी। हमने इस किट में कुछ बदलाव किए और अपनी अलग किट बनानी शुरू कर दी जिसमें एक बड़े एल्यूमीनियम के संदूक में 25 उपयोगी वस्तुएँ रखी गईं। इस संदूक में एक पाँच लेवल वाला ताला भी लगाया गया था। यह संदूक भी सामान रखने के लिए उपयोगी था और इसके अंदर रखी गई वस्तुओं में तारपोलिन, टॉर्च, दवाइयाँ, एक छोटा रेडियो और किराने का सामान आदि शामिल था।इनमें से अधिकतर वस्तुएँ हमने इनके स्रोत से खरीदी थी और जैसे ही सप्लायर्स को यह पता चलता कि ये सुनामी राहत के लिए दी जा रही हैं तो वे इन वस्तुओं पर हमें भारी डिस्काउंट देते और कुछ सप्लायर्स ने तो मुफ्त में ही हमें वस्तुएँ प्रदान कीं।इस सामान को देखने और फिर किट में इकट्ठा कर डालने के लिए हमें एक बड़ी जगह की आवश्यकता थी। इसके लिए मेरे एक छात्र जॉर्ज जोसेफ ने हमें अपने बंगले के बेसमेंट का उपयोग करने का प्रस्ताव दिया।
हमने सारा सामान उस बेसमेंट तक मँगवाया और अपना कार्य जल्द ही प्रारंभ किया। मैं अपनी टीम के समर्पण भाव और दक्षता को देख आश्चर्यचकित थी। उन लोगों ने मिलकर दो दिन में लगभग 1000 संदूक तैयार कर दी थीं।जॉर्ज भी समय-समय पर आकर हमारी जरूरतों के बारे में जानकारी ले लिया करता था साथ ही हमारे चाय-नाश्ते का भी पूरा ध्यान रखता था। सारी चीजें सही चल रही थीं और जल्द ही हम संदूकों को ट्रक में लोड करने के लिए तैयार थे। लेकिन अब हमारे सामने एक परेशानी थी। बेसमेंट से ट्रक में सारा सामान लोड करना मुशकिल था इसलिए हम सभी को लगा कि सामान को कहीं और स्टोर करके ट्रक में लोड करना ही बेहतर होगा। हमेशा की तरह इस परेशानी का समाधान भी जॉर्ज के पास था। |
| उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि बेमन से काम करने वाले 100 लोगों से दिल से काम करने वाले 10 लोग होना ज्यादा अच्छा है। मैं खुशनसीब थी कि मेरे पास एक अच्छी टीम थी। |
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उसने बताया कि इस बंगले के बगल वाला प्लॉट खाली है और वो उस प्लॉट के मालिक को भी जानता है। जॉर्ज ने कहा- 'उस प्लॉट पर आर्किटेक्ट बहुत कम आता है और अगर हम उसके दफ्तर से अनुमति ले लें तो मुझे यकीन है कि उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। कोई भी ऐसे नेक कार्य के लिए मना नहीं करेगा।'वह प्लॉट बहुत ही बड़ा था और सबसे आखिरी वाला था, इस वजह से वहाँ से ट्रक में सामान चढ़ाना आसान था।अगले दिन, एक खुशमिजाज लड़की हमारे बेसमेंट में आई। वह प्लॉट के मालिक के दफ्तर में जूनियर आर्किटेक्ट थी। उसने हमें बताया कि 'लंकेश, जो कि उस प्लॉट का मालिक है और प्रमुख आर्किटेक्ट भी, वह बाहर गया हुआ है। मुझे जॉर्ज से मालूम हुआ कि आप हमारे प्लॉट पर अपने संदूक स्टोर करना चाहते हैं। मुझे लगता है, यह सही विचार है, वैसे भी हम सभी को ऐसी विपदा में मदद करने का मौका नहीं मिलता। इसी तरह हम हमारी तरफ से उन पीड़ित लोगों के लिए कुछ कर पाएँगे।'इसके जवाब में मैंने उसे धन्यवाद किया साथ ही यह भी पूछा कि कहीं इससे उनके किसी कार्य में रुकावट तो नहीं आएगी? इसका जवाब न में पाकर मैं बहुत खुश हुई।हम अपना सारा सामान प्लॉट पर शाम तक शिफ्ट कर पाए। ट्रक अगले दिन सुबह आने वाला था और मेरी टीम के सभी लोग शाम तक थक चुके थे और घर जाकर आराम करना चाहते थे। उन सभी ने इस कार्य को समय पर पूरा करने के लिए बहुत मेहनत की थी और इस मेहनत को देख मुझे उन पर गर्व था। उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि बेमन से काम करने वाले 100 लोगों से दिल से काम करने वाले 10 लोग होना ज्यादा अच्छा है। मैं खुशनसीब थी कि मेरे पास एक अच्छी टीम थी।
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा