कुछ साल पहले मैं कर्नाटक के एक गाँव में किसी कार्यवश गई थी। मुझे वहाँ पहुँचते हुए देर हो गई थी और अँधेरा भी हो चुका था।
सड़क पर रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी और मुझे अपने गंतव्य तक पहुँचने की अब जल्दी भी हो रही थी। जैसे-जैसे हम गाँव की सीमा के नजदीक पहुँच रहे थे वाहनों से आती हुई रोशनी में सड़क के किनारे लगे छोटे-छोटे पौधे दिखाई देने लगे थे।
मुझे सबसे ज्यादा अचंभा तब हुआ जब मैंने उन पौधों के बीच से कुछ महिलाओं को निकलते देखा। उन महिलाओं ने शर्म से अपना सिर ढँक रख था और उन सब के हाथ में टीन का एक डिब्बा था। जल्द ही मैंने यह महसूस किया कि वे सभी शौच के लिए वहाँ गई थीं।
पुरुषों की तरह हम दिन में कभी भी शौच के लिए नहीं जा सकते। चोरों की तरह हमें अँधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है। फिर हमें पेड़ों के पीछे जाना पड़ता है वह भी समूह में। जब भी अँधेरे में कभी किसी गाड़ी की रोशनी हम पर पड़ती है तो हमें बहुत शर्म आती है।
कुछ ही देर में मैं गाँव के सरपंच वीरप्पा के घर पहुँच चुकी थी। वीरप्पा एक धनी व्यक्ति था और मेरे रात के भोजन के लिए उसने बहुत-सी व्यवस्थाएँ कर रखी थीं जिसमें भिन्न-भिन्न भोजन सामग्रियों के साथ अलग-अलग प्रकार की मिठाइयाँ भी शामिल थीं।
इतना सब होने के बाद भी मैं उस खुशी को महसूस नहीं कर पा रही थी क्योंकि मेरे दिमाग में कहीं न कहीं उन महिलाओं की झलक अब भी थी जो उन पौधों के पीछे से आ रही थीं।
सभी का भोजन समाप्त होने के बाद मैंने खाना बनाने वाले से मिलने की इच्छा जाहिर की। मिलने पर पता चला कि वह एक बुजुर्ग महिला थीं जिनका नाम शर्नम्मा था। वे मुझसे बात करने में बहुत शरमा रही थीं और बहुत ही धीमी आवाज में मुझसे बात कर रही थीं।
मैं उन्हें और जानना चाहती थी इसलिए मैंने उनसे बात करनी शुरू की और कहा- 'खाना बहुत अच्छा बना था। क्या इसके बदले मैं आपको कुछ दे सकती हूँ?'
उन्होंने धीरे से कहा - 'अम्मा, मैंने सुना है कि आप गरीब लोगों के लिए बहुत कुछ करती हैं। अगर मुमकिन हो तो क्या आप महिलाओं के लिए इस गाँव में एक सार्वजनिक शौचालय का निर्माण करवा सकती हैं? हमारे लिए इस गाँव में जीवनयापन थोड़ा मुश्किल है।
पुरुषों की तरह हम दिन में कभी भी शौच के लिए नहीं जा सकते। चोरों की तरह हमें अँधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है। फिर हमें पेड़ों के पीछे जाना पड़ता है वह भी समूह में।
जब भी अँधेरे में कभी किसी गाड़ी की रोशनी हम पर पड़ती है तो हमें बहुत शर्म आती है। अगर हम बीमार पड़ जाएँ और आधी रात में जाने की जरूरत पड़े तो भगवान ही बचाए। हमें बहुत खुशी होगी अगर आप इस मामले में हमारी कुछ मदद कर पाएँ।'
शर्नम्मा को अपने समाज के प्रति जो जिम्मेदारी का एहसास था उसे देख मैं दंग रह गई। मैंने वीरप्पा से कहा कि यह शर्म की बात है कि महिलाओं के लिए शौचालय बनवाने का ख्याल आज तक गाँव के सरपंच के मन में नहीं आया। अपने व्यक्तिगत कार्य एकान्तता में करने का अधिकार सबको है।
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अंतत: मैंने उनसे कहा कि मैं इस गाँव में महिला प्रसाधन बनवाने के लिए तैयार हूँ अगर आप लोग उसे संभालने का बीड़ा उठाएँ। मेरी बातों से शर्मसार वीरप्पा ने आसानी से यह बात स्वीकार ली।
फिर शुरू हुआ बेंगलुरु और उसके आसपास के गाँवों में सार्वजनिक शौचालय बनाने का हमारा निर्माण कार्य।
भारत में लोग मंदिर,गुरुद्वारा और मस्जिद बनाने के लिए हमेशा उत्साहित रहते हैं लेकिन जीवन की ऐसी अहम जरूरतों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। शायद इसलिए क्योंकि इस कार्य के साथ कोई पुण्य मिलना नहीं जुड़ा हुआ है।
जो शौचालय हमने बेंगलुरु में बनाए वे सभी पैसे देकर उपयोग करने वाले थे यानी कि 'पे एंड यूज' जिसका काफी विरोध हुआ लेकिन यही एक तरीका था जिससे उन शौचालयों की साफ-सफाई का ध्यान रखा जा सकता था और उनका रखरखाव किया जा सकता था।
अगर कोई शहर में सुधार करने की कोशिश करे तो लोग उसके काम पर इस तरह की फब्ती कसते हैं। कुछ देर के लिए मुझे बुरा लगा लेकिन फिर मैंने सोचा कि लोग कुछ भी कहें मैंने जो सोचा था वो कर दिखाया।
एक दिन मैं अचानक एक व्यस्त बस स्टैंड के पास स्थित शौचालय पर गई और वहाँ खड़ी महिलाओं के पीछे जाकर खड़ी हो गई। दोनों ही महिलाएँ कामकाजी लग रही थीं जो रोज ही इसी बस स्टैंड से जाया करती होंगी। उन दोनों की बातों में मैंने मेरे नाम का जिक्र सुना। वे कह रही थीं कि यह सुधा मूर्ति बहुत ही मतलबी महिला है।
जब इसने इतना पैसा शौचालय बनवाने में लगाया तो यह 'पे-एंड-यूज' क्यों बनवाया है। इस बात पर दूसरी महिला ने जवाब दिया - 'तुम बिलकुल ठीक कह रही हो।
मैंने लोगों से सुना है कि उसने पूरे बेंगलुरु में ऐसे ही शौचालयों का निर्माण करवाया है और इससे मिलने वाली राशि का उपयोग वह एक ट्रस्ट चलाने के लिए करती है। बहुत मुनाफा कमा रही होगी वो।'
उनके ये शब्द सुनकर मैं अचंभित रह गई थी। अगर कोई शहर में सुधार करने की कोशिश करे तो लोग उसके काम पर इस तरह की फब्ती कसते हैं। कुछ देर के लिए मुझे बुरा लगा लेकिन फिर मैंने सोचा कि लोग कुछ भी कहें मैंने जो सोचा था वो कर दिखाया।
मुझे पता है कि सार्वजनिक शौचालयों से शर्नम्मा जैसे कई लोगों का फायदा हुआ है। जो उस गाँव की महिला के लिए एक जरूरत थी उसे शहर की इन दोनों महिलाओं ने व्यापार के नजरिए से देखा। आखिरकार जिंदगी वैसी ही है जैसा आप उसे देखते हैं।