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Written By दीपक असीम

बुलबुले : जैसे जेठालाल वैसी मुमताज आपा...

बुलबुले
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एक अधेड़ भुलक्कड़ महिला है, जिसका एक जवान बेटा है। महिला एक बार विधवा होकर दूसरा ब्याह रचा चुकी है और अपने नए पति के साथ रहती है। बेटा भी साथ में है। बेटा एक नंबर का निकम्मा और लालची है। इसकी एक पत्नी है। अमीर बाप की बेटी। अमीर बाप ने एक घर बेटी को दे रखा है जिसमें ये अनोखा परिवार रहता है। अधेड़ भुलक्कड़ औरत, उसका नया पति, निकम्मा बेटा और अमीर बहू। ये सब हैं पाकिस्तानी टीवी शो "बुलबुले" के स्थायी पात्र। ये शो "बिग मैजिक" पर रात साढ़े आठ बजे और फिर देर रात को आता रहता है।

इस शो में कूट-कूटकर हास्य भरा है। कहीं कोई रोना-धोना नहीं है। जिस तरह हमारे पारिवारिक हास्य शो "तारक मेहता का उल्टा चश्मा" में सब कुछ जेठालाल ही हैं, उसी तरह इस शो में जो कुछ भी हैं, वो मुमताज आपा हैं। मुमताज आपा को सब कुछ भूलने की बीमारी है। अपने पति को वे बीसियों नामों से बुलाती हैं। बेटे और बहू को भी वे कभी सही नाम से नहीं बुला पातीं। हर बार एक नया नाम...। पति को कभी सलीम, कभी गजनफर, कभी मुश्ताक, कभी बिलाल...।

मोटे फ्रेम का चश्मा पहनने वाली मुमताज आपा शो की जान हैं। ये गुस्सा होकर खुदकुशी करने किचन में जाती हैं। लोगों को लगता है कि अपने ऊपर डालने के लिए घासलेट तलाश रही हैं या फंदा लगाने के लिए रस्सी ढूँढ रही हैं। मगर यह क्या! वे तो रोटी का डिब्बा खोलकर खाना खाने बैठ गईं...। कहती हैं मुझे टेंशन में भूख ज्यादा लगती है। बात करते-करते शब्द भूल जाती हैं।

ये अदा बहुत एक्टरों ने बहुत बार निभाई है। फिल्म "रेडी" में महेश मांजरेकर ने यह अदा आजमाई है, मगर माफ कीजिए कि मुमताज आपा के आसपास भी कोई नहीं ठहरता। मुमताज आपा का असल नाम है हिना दिलपजार...। टीवी की किसी भी एक्ट्रेस ने शायद ही इतना बढ़िया हास्य रचा हो।

एक बात और... ये अलग सामाजिक बुनावट का हास्य है। हमारे यहाँ विधवा का, सो भी अधेड़ विधवा का दूसरा विवाह कर लेना हजम होने वाली बात नहीं है। मगर यहाँ जवान बेटे की अधेड़ माँ ने दूसरा विवाह किया है और जवान बेटा अपने नए बाप के साथ एक ही घर में रह रहा है। अपने नए पिता को ये पिताजी, अब्बा और डैडी वगैरह नहीं कहकर मेहमूद साहब ही कहता है। नए पिता और पुरानी माँ में कुछ रोमांस भी होता है। इसी सब से जो हास्य पैदा होता है, वो बहुत ही अलग-सा और ताजगीभरा लगता है।

"तारक मेहता..." में यदि हिन्दुस्तानी मूल्यों के दर्शन होते हैं तो "बुलबुले" में पाकिस्तान की सामाजिक स्थितियाँ नजर आती हैं। पाकिस्तान में महिला पुरुष की दूसरी-तीसरी शादी कोई बड़ी बात नहीं है। वहाँ बुढ़ापे में भी अकसर जीवनसाथी मिल जाते हैं। जाहिर है इसी सब से पाकिस्तान के कलाकार हास्य निकालते हैं। हमें विदेशी हास्य अकसर ज्यादा पल्ले नहीं पड़ता, मगर इस पाकिस्तानी हास्य को हम आसानी से हजम कर सकते हैं और उस पर हँस सकते हैं। टीवी के जरिए हँसाने की शुरुआत दरअसल पाकिस्तानी कलाकार उमर शरीफ के ड्रामों ने ही की थी। हँसने-हँसाने में पाकिस्तानी अब भी हमसे पीछे नहीं हैं।
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दीपक असीम