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Written By दीपक असीम

बार-बार चढ़ती काठ की हांडी...

एक्स फैक्टर
सिंगिग रियलिटी शो "एक्स फैक्टर" खत्म हो गया। ये शो कब आया कब गया किसी को पता नहीं चला। शुरुआत के केवल वे एपिसोड देखे गए जिसमें नमूने किस्म के प्रतिभागी आते हैं। जैसे ही प्रतियोगी चुन लिए गए वैसे ही दिलचस्पी खत्म हो गई।

इंडियन आइडल और जी सारेगामा ने इस तरह के कार्यक्रम की सारी संभावना निचोड़ डाली है, लिहाजा संजय लीला भंसाली के जज बनने पर भी शो की टीआरपी आसमान पर नहीं गई।

श्रेया घोषाल की खूबसूरती और सोनू निगम की चॉकलेटी सूरत से भी कुछ नहीं हुआ। इस तरह के शो दरअसल अब पुराने पड़ गए हैं। उन्हीं पुराने गानों को जनता कितने नए गलों से सुने, सहन करे?

अंदरखाने की बात यह है कि इस तरह के शो में लोग अब पहले की तरह एसएमएस भी नहीं करते। विज्ञापनों के अलावा सबसे बड़ी इन्कम तो ऐसे एसएमएस से है। दर्शकों का भावनात्मक शोषण ही इस तरह के शो में इन्कम का आधार होता है।

एक एसएमएस ५ रुपए का...। ज्यादा से ज्यादा एसएमएस कीजिए...। जवान और नौजवान पसंदीदा मूरत-सूरत पर बहुत से रिचार्ज वाउचर कुर्बान कर देते थे, मगर काठ की हांडी कितनी बार चढ़ेगी? इस शो में श्रेया घोषाल, सोनू निगम वगैरह को जजगुरु कहा गया।

इन जजगुरुओं ने इस आधार पर प्रतियोगियों को नहीं चुना कि कौन कैसा गाता है, बल्कि इस आधार पर चुना कि किसे कितने वोट मिल सकते हैं। एक छोटी-सी लड़की... क्यूट-सी मासूम-सी... बमुश्किल वयस्क...। यह लड़की जब अपील करेगी (कहना चाहिए भीख माँगेगी) तो खूब वोट आएँगे।

यह लड़का हैंडसम है, इसे लड़कियाँ वोट दे सकती हैं...। काहे के गुरु और काहे के जज। गुरु सिखाता है। ये लोग माथा देखकर तिलक लगाते हैं। कौन-सा प्रतियोगी कितनी "गुरु दक्षिणा" अर्थात वोट माँगकर ला सकता है। फिर अच्छा गाने वाले को जज करने का काम इनका नहीं रहता।

जनता के वोट से प्रतियोगी आगे बढ़ते हैं। जनता कोई गाने की पारखी तो होती नहीं खासकर टीवी देखने वाली जनता। वह तो सूरत देखती है और फिदा होती है। तो गुरु भी नहीं, जज भी नहीं... केवल सुंदर मुखौटे...।

इस बार श्रेया घोषाल की टीम के गीत को सागर ने फाइनल जीत लिया, जो हर बार कथित जजगुरुओं से डाँट खाता था। केवल इसी शो का नहीं ये हर शो का रोना है। बहुत अच्छे गायकों को उतने वोट नहीं मिलते, पर ज्यादा डाँट खाने वाले को मिल जाते हैं।

शायद सहानुभूति से। ...और इस शो की सबसे छोटी प्रतिभागी और सोनू निगम की टीम की सीमा झा नहीं जीतीं जिसकी हर बार जजगुरु तारीफ करते थे। अंधेर नगरी, चौपट राजा...। एक बार संजय लीला भंसाली की टीम की "सजदा सिस्टर्स" भी जीत जातीं तो बात हजम होती, लेकिन गीत सागर का जीतना तो शायद किसी भी संगीत की समझ वाले ने सिरे से नकार दिया होगा।

यही कारण है कि इस तरह के रियलिटी शो अब उतार पर हैं। 5 रुपए का एक एसएमएस किसी गायक के लिए क्यों किया जाए? जबकि इसी 5 रुपए से घर बैठे 3 लाख रुपए तक का इनाम केबीसी के जरिए जीता जा सकता है। तो लोग अब सयाने हो गए हैं। इंडियन आइडल को देखें कि इस बार कितनी टीआरपी मिल पाती है।