जानिए सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न

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(4) वेताल भट्ट

विक्रमादित्य के रत्नों में वेताल भट्ट के नामोल्लेख से आश्चर्य होता है कि एक व्यक्ति का नाम वेताल भट्ट अर्थात भूत-प्रेत के पंडित कैसे हो गया? इनका यथार्थ नाम यही था या अन्य कुछ विदित नहीं हो पाया है। भूत-प्रेतादि की रोमांचक कथाओं के मध्य वेताल भट्ट की ऐतिहासिकता प्रच्छन्न हो गई है। विक्रमादित्य और वेताल से संबंधित अनेक कथाएं मिलती हैं।

प्राचीनकाल में भट्ट अथवा भट्टारक, उपाधि पंडितों की होती थी। वेताल भट्ट से तात्पर्य है भूत-प्रेत-पिशाच साधना में प्रवीण व्यक्ति। प्रो. भट्टाचार्य के मत से संभवत: वेताल भट्ट ही 'वेताल पञ्चविंशतिका' नामक ग्रंथ के कर्ता रहे होंगे। वेताल भट्ट उज्जयिनी के श्मशान और विक्रमादित्य के साहसिक कृत्यों से परिचित थे। संभवत: इसलिए उन्होंने 'वेताल पञ्चविंशतिका' नामक कथा ग्रंथ की रचना की होगी।
वेताल कथाओं के अनुसार विक्रमादित्य ने अपने साहसिक प्रयत्न से अग्निवेताल को वश में कर लिया था। वह अदृश्य रूप से उनको अद्भुत कार्यों को संपन्न करने में सहायता देता था।

वेताल भट्ट साहित्यिक होते हुए भी भूत-प्रेत-पिशाचादि की साधना में निष्णात तथा तंत्र शास्त्र के ज्ञाता होंगे। यह भी संभव है कि वेताल भट्ट आग्नेय अस्त्रों एवं विद्युत शक्ति में पारंगत होंगे तथा कापालिकों एवं तांत्रिकों के प्रतिनिधि रहे होंगे। इनकी साधना शक्ति से राज्य को लाभ होता होगा। विक्रमादित्य ने वेताल की सहायता से असुरों, राक्षसों और दुराचारियों को नष्ट किया होगा।







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