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Written By अनिरुद्ध जोशी
Last Modified: बुधवार, 19 अगस्त 2020 (22:10 IST)

Shri Krishna 19 August Episode 109 : द्वारिका से विदा होते वक्त श्रीकृष्ण जब सुदामा को कुछ नहीं देते हैं तब होता चमत्कार

Shri Krishna 19 August Episode 109 : द्वारिका से विदा होते वक्त श्रीकृष्ण जब सुदामा को कुछ नहीं देते हैं तब होता चमत्कार - Shri Krishna on DD National Episode 109
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 19 अगस्त के 109वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 109 ) में सुदामा को जब अपने बच्चों की याद आती है तो वह शयन कक्ष में चला जाता है। तब श्रीकृष्ण रुक्मिणी के सामने बांसुरी बजाते हैं तो रुक्मिणी पूछती है- क्या बात है प्रभु! आज आप फिर से उदास धुन बजा रहे हैं? सुदामा के दुख तो अब दूर हो चुके हैं। कहीं ऐसा तो नहीं प्रभु की आपने उसे चने चुराने और खीर चुराने का दंड दिया है। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं- नहीं मैं किसी को दंड नहीं देता, मैं तो इसलिए दुखी हूं कि अब उससे बिछड़ने का का समय आ गया है।
 
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 
 
सुदामा की पत्नी श्रीकृष्ण मंदिर के समक्ष बैठकर अपने पति सुदामा के आने का इं‍तजार करती है। उसका संकल्प रहता है कि जब तक सुदामा नहीं आएंगे तब तक वह इसी मंदिर में रहेंगी जहां से उन्हें विदा दी थी। यहीं से उनके साथ राजमहल में उनका हाथ थामें जाऊंगी। 
 
उधर, श्रीकृष्ण सुदामा की विदाई करते हैं। वे कहते हैं कि इतनी जल्दी जा रहे हो ये ठीक नहीं कर रहे हो। तब सुदामा कहते हैं कि मन तो मेरा भी नहीं कर रहा है पर क्या करूं जाना ही पड़ेगा। वसुंधरा राह तक रही होगी। रुक्मिणी, सत्यभामा और जामवंती सभी उन्हें रोकने का प्रयास करती है। तब सुदामा कहते हैं- इन चार दिनों में इतना आनंद आया की तृप्त हो गया हूं मैं। एक साथ इतना सत्कार और इतना प्यार तो मुझे कभी भी नहीं मिला था। सच! बड़ा सुख मिला है इस विराट राजमहल में। ईश्वर करे तुम्हारा ये सुखी परिवार और भी फले-फुले।
 
यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि ईश्वर से मेरे लिए ही मांगोगे अपने लिए कुछ नहीं? तब सुदामा कहते हैं कि अरे कृष्णा! ईश्वर की कृपा तो सदा मेरे साथ बनी रही है। अब अपने लिए उससे क्या मांगना। एक ब्राह्मण तो अपने सीमित साधनों में ही सुखी रहता है शिक्षा देना और भिक्षा लेना, इसी में अपना सारा जीवन आनंद से गुजार देता है। बस मित्र अब आज्ञा दो। 
 
श्रीकृष्ण भावुक होकर हर प्रकार से उसे रोकना का प्रयास करते हैं परंतु वह कहता हैं कि इतने भावुक होकर रोकने का प्रयास न करो मित्र। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि ठीक है यदि यही तुम्हारी इच्छा है तो यही सही। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं- परंतु मेरी एक विनती है कि अपने मित्र को भूल ना जाना अपने हृदय में मेरे लिए थोड़ी-सी जगह हमेशा रखना। इस पर सुदामा कहता है कि मेरी भी विनती है मित्र की अपने इन श्री चरणों में मेरे लिए भी थोड़ी-सी जगह रखना। ऐसा कहकर सुदामा पैर छूने लगता है तो श्रीकृष्ण उसे गले लगाकर कहते हैं कि अरे चरणों में नहीं मित्र, तुम्हारा वास सदा मेरे हृदय में रहेगा। 
 
फिर श्रीकृष्ण एक सेवक से कहते हैं कि सुदामा को वृंदापुरी तक छोड़ने के लिए रथ का प्रबंध करो। यह सुनकर सुदामा कहता है कि अरे नहीं नहीं रथ की कोई आवश्यकता नहीं और फिर वृंदापुरी की गलियां इतनी तंग है कि वहां रथ जा ही नहीं सकता। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- अच्छा चलो तो फिर मैं द्वारिका की सीमा तक तुम्हें छोड़ आता हूं। इस पर भी सुदामा कहता है- नहीं नहीं मैं अकेले ही चला जाऊंगा। रास्ता मेरा देखा भाला है। ईश्‍वर का नाम जपते-जपते जैसे आया था वैसा ही चला जाऊंगा। वसुंधरा मेरा राह तक रही होगी।
 
उधर, वसुंधरा अपने स्वामी की राह में मंदिर से लेकर कुछ दूर तक फूलों की बिछात बिछाकर रखती है। 
तभी वहां चक्रधर आकर उन्हें भोजन देता है। वसुंधरा कहती है- देवरजी ये कष्ट आपने क्यों उठाया? फिर चक्रधर भोजन को एक ओर रखकर कहता है कि सेवा को आप कष्ट कह रही है। वसुंधरा कहती है- वो तो ठीक है पर मुझे तो भूख ही नहीं लग रही है। तब चक्रधर कहता है कि थोड़ा बहुत खा लो अन्यथा कमजोरी आ जाएगी। मैं बच्चों को खिलाकर ही आया हूं। फिर वसुंधरा मान जाती है तब वह कहता है- लीजिये आप खाना खाइये मैं कुएं से पानी लेकर आता हूं। चक्रधर के जाने के बाद वसुंधरा सोचती है- भगवन! मेरे पति इस समय कहां हैं, कब लौटेंगे?
 
इधर, सुदामा को द्वारिकापुरी के बाहर पैदल चलते हुए बताया जाता है और चलते-चलते वह सोचता है कि मैं तो आया खाली हाथ था और खाली हाथ ही जा रहा हूं। वह सोचता है कि कैसे दीनदयाल है और कैसे दीनानाथ। वसुंधरा क्या सोचेगी, किसलिए भेजा था मुझे। वह सोचता है कि यहां आकर क्या पाया और क्यूं आया? इस तरह कई तरह के उसके मन में विचार चलते रहते हैं।
 
तभी उसे वही मुरली मनोहर (श्रीकृष्ण) की गीत गाने की आवाज सुनाई देती है। वह पलटकर देखता है तो मुरलीधर मनोहर एक बैलगाड़ी लिए चला आ रहा होता है गाना गाते हुए कि 'दुल्हन बिना रहा जाए ना ओ रामा।'.. उसे देखकर सुदामा प्रसन्न होकर उसे रोकता है। मुरलीधर मनोहर बैलगाड़ी रोककर देखता और कहता है- अरे! ओ ब्राह्मण देवता। सुदामा भी कहता है- अरे मुरली मनोहर तुम!.. मुरली मनोहर बैलगाड़ी से नीचे उतरकर पास आकर कहता है- अरे प्रणाम ब्राह्मण देवता। सुदाम कहता है- खुश रहो। तुम यहां कैसे निकल पड़े? तब मुरली मनोहर कहता है- अरे मैं तो अपनी लक्ष्मी को लेने जा रहा हूं। पूरे सात दिन हो गए उससे बिछड़े हुए। बस अब अपनी बैलागाड़ी में बिठाकर ले आऊंगा। आप भी चलिये आपको आपके गांव तक छोड़ दूंगा। मैं आपके गांव वृंदापुरी से आगे प्रेम नगर तक जा रहा हूं चलिये। यह सुनकर सुदामा प्रसन्न होकर कहता है- अरे वाह।
 
तब मुरलीधर कहता है- चलिये, फिर वह सुदामा के इधर-उधर देखकर पूछता है- पर अरे! ब्राह्मण देवता आपका सामान किधर है? तब सुदामा कहता है- सामान कैसा भाई? तब मुरलीधर कहता है- कमाल है द्वारिकाधीश ने विदाई के समय आपको कुछ भी भेंट नहीं दिया। आप तो उसे अपना मित्र बता रहे थे।...यह सुनकर सुदामा निराश होकर कहता है कि इसी दुविधा में तो पड़ा था परंतु... तब मुरलीधर हंसते हुए कहता है- अरे दुविधा-वुविधा छोड़िये और चलिये हमारी बैलगाड़ी में। ये धनवान लोग ऐसे ही होते हैं। अपनी आन-बान दिखाने के लिए धन लुटा देंगे पर वैसे कुछ ना पूछिये एक-एक पैसा अपने दांतों के तले दबाकर रखते हैं। 
 
यह सुनकर सुदामा कहता है- नहीं नहीं मेरे श्रीकृष्ण ऐसे नहीं हैं, वो तो दीनदयाल हैं। यह सुनकर मुरलीधर कहता है- अरे कहे के दयाल है। दयाल होते तो आपको कुछ दे नहीं दिया होता? तब सुदामा कहता है कि मैंने मांगा जो नहीं था। तब मुरलीधर कहता है कि मांगने से दिया तो क्या दिया। मित्र को तो बिन मांगे ही समझ लेना चाहिए कि मित्र को क्या चाहिए और फिर धनवान का मित्र एक गरीब हो तो उस बैचारे के मुंह में जुबान थोड़ी ना होती है। यह सुनकर सुदामा कहता हैं- हां तुम ठीक कह रहे हो मुरलीधर लेकिन... यह सुनकर मुरलीधर कहते हैं- लेकिन ये द्वारिकाधीश ने ठीक नहीं किया। अरे! उनको कुछ सोचना चाहिए था। आखिर एक ब्राह्मण मनुष्य जन-जनार्दन में ज्ञान दान करता है फिर वह ज्ञान के बदले में धन थोड़ी ले सकता है बैचारा? यह सुनकर सुदामा कहता हैं कि हां तुम्हारी ये बात सच है परंतु असल में मुझे धन नहीं दिया तो उपकार ही किया है। यदि मुझे धन दे देते तो माया के फंदे में फंसा देते। अच्छा किया कि मेरी मुक्ति का मार्ग बंद नहीं किया। 
 
यह सुनकर मुरली मनोहर कहते हैं कि अब ऐसा कहते हो तो ये तो आपकी उदारता है परंतु सच तो ये है कि संपन्न और धनवान लोगों से गरीब लोगों को मित्रता करनी ही नहीं चाहिए। यह सुनकर सुदामा कहता है कि मैंने कब की मित्रता, उन्होंने ने ही कहा कि हम मित्र हैं। मित्रता की पहल उन्होंने की थी। मैंने तो उन्हें उसी पल समझा दिया था। इस पर मुरली मनोहर कहते हैं कि तब उन्होंने क्या कहा था? इस पर सुदामा कहता है कि कहा था कि मैंने मित्र कहा है ना, सो मित्रता का उत्तरदायित्व निभाना मेरा ही काम होगा। कभी आवश्यकता आन पड़ी तो इस मित्रता को मैं ही निभाऊंगा। मैं वचन देता हूं कि तुम्हारी मित्रता की परीक्षा कभी नहीं लूंगा। अब बोलो मुझे अपना मित्र बनाओगे की नहीं? 
 
इस पर मुरली मनोहर कहते हैं- छी छी छी छी। ये निभाई मित्रता, ऐसी मित्रता निभाई जाती है? यह सुनकर सुदामा कहता है- अरे अब जाने भी दो। यह सुनकर मनोहर कहता है- अरे क्या जाने दो। अरे ब्राह्मण देवता आप ही अपने हृदय पर हाथ रखकर कहें कि जो उन्होंने किया वह ठीक किया? तब सुदामा कहता है कि ठीक तो नहीं किया परंतु मैं उसमें उनका कोई दोष नहीं समझता। यदि मैं मांगता और वे ना दे देते तब तो मैं उन्हें दोषी भी समझता। परंतु मैंने तो उनसे मांगा ही नहीं था। यह सुनकर मुरली मनोहर कहते हैं कि आप क्यों अपने मित्र के विरुद्ध के संबंध में बातें सुनने लगे। चलिये छोड़िये जाने दीजिये, चलिये हमारी बैलगाड़ी में। 
 
यह देखकर रुक्मिणी कहती है कि वाह प्रभु वाह! अब समझ में आई आपकी बात। मित्र पैदल यात्रा नहीं करे इसलिए आप बैलगाड़ी लेकर पहुंच गए।... फिर मुरली मनोहर अपनी दुल्हनिया की याद में विरह गीत गाते हुए निकल पड़ते हैं। बैलगाड़ी में सुदामा को नींद आ जाती है तब रात्रि में मुरली मनोहर सुदामा को जागकर कहते हैं- अरे देखिये, उठिये वीप्रवर आपका गांव आ गया। सुदामा आंख खोलता है तो वे कहते हैं- हां हां उठिये, उठिये। सुदामा कहता है- अरे बड़ी जल्दी गांव आ गया। तब मुरलीधर कहते हैं- अरे ये तो मेरे हीरा-मोती का कमाल है रातभर हवा से बातें करते रहे हैं वीप्रवर। फिर सुदामा बैलगाड़ी से उतर जाते हैं तो मुरलीधर कहते हैं कि अच्‍छा वीप्रवर अब मुझे आज्ञा दीजिये। तब सुदामा कहते हैं- अरे भाई घर चलो रात यहीं रुकना और प्रात: चले जाना। यह सुनकर मुरलीधर कहते हैं कि अरे आप कैसी बातें कर रहे हो अब तो मैं अपनी लक्ष्मीदेवी से मिलने के लिए एक रात भी नहीं रुक सकता। यह कहकर मुरली मनोहर रूपी श्रीकृष्‍ण वहां से चले जाते हैं।
 
फिर सुदामा चलते हुए गांव के बाहर के उसी श्रीकृष्‍ण मंदिर के पास चला जाता हैं। रात में वह देखता है कि मार्ग में ये फूल किसने बिछा रखे हैं। मंदिर में उनकी पत्नी वसुंधरा द्वार पर सिर टिकाए सोई रहती हैं। फिर वह सोचता है कि जाने किसने रास्ते में फूल बिछा दिए। उसे कुछ समझ में नहीं आता फिर वह मंदिर में जाकर नमन करता है। पास में ही वसुंधरा सोई रहती है। नमन करने के बाद वह श्रीकृष्ण की मूर्ति से कहता है- प्रभु द्वारिका जाते समय मैंने अपने बीबी-बच्चे आप ही की शरण में दिए थे। वो सब कुशल तो है ना प्रभु? मेरी वसुंधरा अच्छी तो है ना भगवन?
 
यह सुनकर वसुंधरा की नींद खुल जाती है। वह अपने पति सुदामा को देखकर प्रसन्न हो जाती है और कहती है- स्वामी! सुदामा यह सुनकर वसुंधरा की ओर देखने लगता है। तब वसुंधरा फिर से कहती है- स्वामी आप आ गए, आप आ गए स्वामी। यह कहती हुए वसुंधरा उनके पैर छूने लगती है तो सुदामा उठकर खड़ा होकर कहता है- अरे ये आप क्या कर रही हैं देवी, कौन हैं आप? फिर वसुंधरा भी खड़ी होकर कहती है- स्वामी आपने मुझे नहीं पहचाना, अपनी दासी को? यह सुनकर सुदामा वसुंधरा को उपर से नीचे तक देखता है जो सुंदर मुख और सुंदर राजसी वस्त्रों में रहती है फिर वह कहता है- मेरी दासी? आपको अवश्य कोई धोखा हुआ है देवी।
 
यह सुनकर वसुंधरा कहती है कि धोखा मुझे नहीं आपको हुआ है, मैं आपकी पत्नी वसुंधरा हूं। यह सुनकर सुदामा आश्चर्य से कहता है वसुंधरा! ये कैसे हो सकता है देवी? तब वसुंधरा कहती हैं- स्वामी भ्रम ना ‍कीजिये मैं ही आपकी पत्नी वसुंधरा हूं। परंतु सुदामा को विश्वास नहीं होता है और वह कहता है कि मेरी वसुंधरा ऐसी नहीं हो सकती। तभी वहां पर भोजन लेकर चक्रधर आ जाता है और वह सुदामा को गले लगाकर कहता है- सुदामा, सुदामा तुम आ गए मेरे मित्र। मैं कितने दिनों से तुम्हारी राह देख रहा था और ये वसुंधरा भाभी भी कब से तुम्हारे लिए परेशान थीं। यह सुनकर सुदामा कहता है- वसुंधरा भाभी? यह सुनकर वसुंधरा कहती हैं- देखिये ना देवर जी ये मुझे पहचान ही नहीं रहे हैं। 
 
फिर चक्रधर कहता है कि अरे ये वसुंधरा भाभी ही है तुम्हारी धर्मपत्नी। सुदामा फिर से वसुंधरा को देखता है जो राजसी वस्त्रों में आभूषण धारण किए चंद्रमुख जैसी नजर आती हैं। फिर चक्रधर हंसते हुए कहता है- तुम्हें विश्वास नहीं होता ना। ये तो सब माता लक्ष्मी का चमत्कार है उन्होंने स्वयं प्रकट होकर भाभी को चिरयौवना का वरदान दिया है। यह सुनकर सुदामा कहता है कि ये तो सचमुच चमत्कार हो गया।
 
तब चक्रधर कहता है- अरे तुम्हारे जाने के बाद यहां कैसे-कैसे चमत्कार हुए हैं- पूछो मत। यह सुनकर सुदामा आश्चर्य से कहते हैं- आच्छा। इस पर चक्रधर कहता है- और नहीं तो क्या सबसे पहले यहां विश्वकर्मा पधारे श्रीकृष्‍ण ने उन्हें तुम्हारे घर को राजमहल में बदलने के लिए भेजा था। यह सुनकर सुदामा आश्चर्य से कहता है- श्रीकृष्ण ने? तब चक्रधर कहता है- हां पर भाभीजी ने आज्ञा नहीं दी। कहा कि मेरे स्वामी ने इस बस्ती के घर-घर जाकर भिक्षा ली है। बड़े उपकार है उन सबके इसलिए उन सबके घर टूटे-फूटे रहे और केवल अपना घर राजमहल बने ये इन्हें स्वीकार नहीं है। यह सुनकर सुदामा कहता है- वाह वसुंधरा वाह। आगे चक्रधर कहता है कि तब, तब श्रीकृष्ण ने क्या किया पता है? उन्होंने देवशिल्पी विश्‍वकर्मा को वंदापुरी के हर घर को राजमहल में बदलने की आज्ञा दी। 
 
यह सुनकर सुदामा हैरान रहा जाता है। तब चक्रधर कहता है- उधर देखो उधर बस्ती की ओर। सुदामा उधर देखने लगता है तब चक्रधर कहता है- हर घर राजमहल में बदल गया है। यह देख और सुनकर सुदामा कहता है- हर घर राजमहल बन गया? तब चक्रधर कहता है हां हां और वो तुम्हारा घर। तब सुदामा उस ओर देखता है तो एक भव्य महल खड़ा दिखाई देता है। यह देखकर वह अचंभित हो जाता है। चक्रधर कहता है- सबसे बड़ा, सबसे ज्यादा वैभवशाली, श्रीकृष्ण के राजमहल जैसा। 
 
यह सुनकर सुदामा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता है और वह कहता है- श्रीकृष्ण के राजमहल जैसा!! यह सुनकर चक्रधर कहता है- अरे अब वह महल कहां मंदिर है मंदिर। माता लक्ष्मी ने अपने दिव्य चरण चिन्ह छोड़े हैं वहां पर। यह देख और सुनकर सुदामा भावुक होकर श्रीकृष्ण की मूर्ति के समक्ष सिर झुकाकर कहता है- प्रभु! वाह प्रभु वाह। मेरे पीछे आप यहां लीलाएं दिखाते रहे और अपने मित्र को भनक भी नहीं लगने दी। मैं मूरख ये समझ रहा था कि आपने मुझे कुछ भी नहीं दिया। क्षमा करना प्रभु मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। ऐसा कहकर सुदामा रोने लगता है। फिर वह कहता है पर इसमें सब दोष मेरा नहीं है वो मुरली मनोहर है ना, वो पता नहीं क्या अनाश-शनाप बक रहा था। प्रभु उसे भी क्षमा कर देना वो क्या जाने आपकी अपार लीलाओं को। 
 
यह सुनकर श्रीकृष्‍ण रुक्मिणी से कहते हैं- देवी भक्तराज सुदामा के इस भोलेपन का तो स्वयं मैं भक्त हूं। तब रुक्मिणी कहती हैं- और मैं भी।
 
फिर सुदामा कहता है कि तो ये थी वसुंधरा और वृंदापुरी के काया पलटने की कथा? चक्रधर कहता है- हां। तब वसुंधरा कहती है कि पर काया पलटने की कथा यहीं समाप्त नहीं होती। तब सुदामा कहता है अच्छा और किसकी काया पलटी है? तब वसुंधरा कहती है- देवरजी की। चक्रधर अब बदल गए हैं और इन्होंने राजा का गुणगान करना बंद कर दिया है। तब राजा ने इस पर इन्हें भी वही दंड दिया था जो आपको दिया था। देवरजी भी अब केवल ईश्वर का ही गुणगान करते हैं। यह सुनकर सुदामा चक्रधर को गले लगा लेते हैं। 
 
फिर सुदामा कहते हैं कि प्रभु अब और कौन-सा अचंभा और कौन-सा चमत्कार बाकी है, वो भी बता दो।....यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं धैर्य रखो सुदामा अभी और भी चमत्कार बाकी है जरा घर तक तो पहुंचो, फिर देखो क्या होता है। 
 
सुदामा के गांव में प्रवेश करने के पूर्व ही गांव वालों को इसकी सूचना मिल जाती है कि सुदामाजी आ गए हैं तो सभी गांव के लोग उनके आने की खुशी में उनका भव्य स्वागत करते हैं। फिर वसुंधरा और सुदामा को गांव के लोग एक रथ में बैठाकर लाते हैं। ढोल-नगाड़े बजाकर उत्सव मनाते हैं, नृत्य करते और गीत गाते हैं।
 
फिर सभी सुदामा और वसुंधरा को उनके महल के सामने लाकर छोड़ देते हैं तभी उनके बच्चे महल के अंदर से निकल कर उनके पास पिताजी आ गए पिताजी आ गए पुकारते हुए आते हैं। सुदामा उनके नए वस्त्र और उनकी दशा देखकर प्रसन्न हो जाता है और चारों बच्चों को गले लगा लेता है।
 
तभी वहां पर राजा एक रथ में सवार होकर अपने घुड़ सैनिकों के साथ आ जाता है। गांव के सभी लोग यह देखकर चौंक जाते हैं। राजा रथ से उतरकर सुदामा को प्रणाम करता है और कहता है- क्षमा करें भक्तराज क्षमा करें। सुदाम उन्हें उठाकर कहता है- ये क्या राजन! आप एक गरीब की कुटिया पर इस तरह पधारे और सब नगरजनों के सामने मेरे पैर पकड़े ये आपको शोभा नहीं देता। तब राजा कहता है कि जिन चरणों की धूली से वृंदापुरी के भाग्य बदल गए। मैं उन्हीं चरणों की धूली अपने माथे से लगाकर अपने भाग्य बदलना चाहता हूं। आपके प्रति मैंने जो अन्याय और अत्याचार किया था उसके लिए मैं क्षमा मांगता हूं, मुझे क्षमा करें। तब सुदामा कहता है कि नहीं राजन आपको क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं। मैं देख रहा हूं कि आपके मन में पश्चाताप की अग्नि जल रही है। इस अग्नि में 
सरे पाप भस्म हो जाते हैं।
 
फिर राजा अपना मुकुट निकालकर कहता है कि आज से आप इस सुदामा नगर के राजा है। तब सुदामा कहता है कि नहीं राजन ब्राह्मण का कर्तव्य राज करना नहीं है बल्कि राजा को धर्म का मार्ग दिखाना होता है। यदि राजा भूल करे और गलत नीतियों को अपनाए तो उसे रोकना ब्राह्मर्ण का धर्म है। ये राज्य आपका है, राज आप ही करेंगे और धर्म के सिद्धांतों के अनुसार ही करेंगे। ऐसा कहकर सुदामा मुकुट को राजा को पहना देता है। तब राजा कहता है- ठीक है आज से आप ही हमारा मार्गदर्शन करेंगे। हम आपको आज ही से राजगुरु की पदवी देने की घोषणा करते हैं। यह सुनकर सुदामा की पत्नी प्रसन्न हो जाती है। फिर राजा जनता की ओर देखकर कहता है- बोलो राजगुरु सुदामाजी की जय..सभी जय जयकार लगाते हैं। फिर राजा प्रणाम करके चला जाता है। 
 
इसके बाद चक्रधर कहता है- मित्र! भाभी ने कहा था कि जब उनका ब्याह हुआ था तब जिस तरह तुम उनका हाथ पकड़कर टूटे-फूटे झोपड़े में लाए थे उसी तरह जब तक उनका हाथ पकड़कर राजमहल में नहीं ले जाओगे तब तक वह राजमहल में नहीं जाएंगी। फिर चक्रधर सुदामा का हाथ लेकर वसुंधरा के हाथ में रख देता है। तब सुदामा वसुंधरा का हाथ पकड़कर राजमहल में प्रवेश करता है। उसके साथ उसके पीछे उसके बच्चे और चक्रधर भी प्रवेश करते हैं। 
 
फिर बाद में सुदामा और उनकी पत्नी वसुंधरा के साथ श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की मूर्ति के समक्ष नमन करके कहता है- हे मेरे संकट मोचन, मुझे दर्शन चाहिए था तो मुझे दर्शन मिला। वसुंधरा को धन चाहिए थे सो उसे धन मिला। मेरी आपसे सिर्फ एक विनती है कि मेरे इस वैरागी मन को धन-दौलत के लालच से बचाए रखना। मोह-माया के जाल से हमेशा बचाकर रखना। फिर सुदामा रोते हुए कहता हैं कि मेरी आपसे केवल एक ही विनती है। अपने भक्त की अंतिम विनती को स्वीकार करना। प्रभु सुन रहे हैं ना? मेरी विनती को हां कह दीजिये।
 
तभी वहां श्रीकृष्ण चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर दोनों को दर्शन देते हैं और कहते हैं सुदामा मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि जीवन में तुम कभी भी माया के दास नहीं बनोगे बल्की हमेशा माया तुम्हारी दासी बनकर रहेगी। तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की सेवा करेगी। यह देख और सुनकर सुदामा और वसुंधरा धन्य हो जाते हैं। जय श्रीकृष्ण।
 
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