महाशिवरात्रि पर विशेष : परम कल्याणमय हैं आशुतोष शिव

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इस प्रकार योगेश्वर शिव बिना किसी बाहरी ताम-झाम के मन की शक्तियों के ग्राहक-अधिष्ठाता हैं। इसीलिए वे शरीररूपी गाड़ी को खींचने के लिए मन:शक्ति और प्रा‍ण-शक्ति दो बैलों के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

बाहरी आडम्बर कुछ नहीं, अमंगलकारी रूपधारी अपने भक्तों के लिए औघड़दानी बने रहे हैं। इतने औघड़दानी कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण हेतु हलाहल गटककर नीलकंठधारी हो गए। जरा-सी पूजा-आराधना से प्रसन्न होने वाले भोले बाबा इसीलिए 'आशुतोष' कहलाए।

पूजन की सामग्री भी कितनी सार्वकालिक, सार्वदेशिक और सार्वभौमिक कि मिट्टी उठाइए, शिवलिंग की स्थापना कीजिए, चढ़ाने के लिए उप‍ेक्षित धतूरा एवं कल्याणकारी श्रीवृक्ष के पत्ते बिल्वपत्र (एकसाथ उपेक्षित एवं स्‍थापित वस्तुओं का समन्वय) जल का अभिषेक जल न भी हो तो आंखों के पानी से भी योगेश्वर शिव पिघल जाते हैं।

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