ज्येष्ठ अमावस्या के दिन शनि जयंती भगवान शनिदेव के प्राकट्य का उत्सव मनाया जाता है। शनिदेव को लेकर समाज में कई भ्रांतियां हैं, लेकिन असल में वे न्याय के देवता हैं। इस बार 16 मई 2026 को शनि जयंती मनाई जाएगी। इसे शनिश्चरी अमावस्या भी कहते हैं। इसी दिन वट सावित्री का व्रत भी रखा जाता है। यहां शनिदेव के संबंध में 10 रोचक और महत्वपूर्ण बातें दी गई हैं।
1. सूर्य पुत्र और छाया के लाल
शनिदेव भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया के पुत्र हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, माता छाया के कठिन तप के कारण शनिदेव का रंग श्याम (काला) हो गया था, जिसे देखकर प्रारंभ में सूर्य देव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया था।
2. मुख्य न्यायाधीश (Magistrate)
शनिदेव को देवताओं में 'न्यायाधीश' का पद प्राप्त है। वे व्यक्ति के कर्मों के आधार पर उसे फल देते हैं। वे न तो किसी के दुश्मन हैं और न ही दोस्त; वे केवल निष्पक्ष न्याय करते हैं।
3. शिव के शिष्य
शनिदेव भगवान शिव के अनन्य भक्त हैं। उन्होंने शिवजी की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें नवग्रहों में सबसे शक्तिशाली स्थान और 'कर्म फलदाता' होने का वरदान दिया।
4. शनिदेव की दृष्टि का रहस्य
मान्यता है कि शनिदेव की दृष्टि में अत्यधिक तेज है। उनकी पत्नी के श्राप के कारण उनकी दृष्टि को कष्टकारी माना जाता है, इसीलिए पूजा के समय उनकी आँखों में सीधे न देखकर उनके चरणों के दर्शन करने की परंपरा है।
5. केवल अशुभ नहीं होते शनि
अक्सर लोग शनि से डरते हैं, लेकिन शनिदेव मोक्ष के कारक भी हैं। यदि कुंडली में शनि शुभ स्थिति में हों, तो वे रंक को राजा बना सकते हैं और व्यक्ति को अपार धैर्य, अनुशासन और सफलता प्रदान करते हैं।
6. हनुमानजी और शनिदेव:
रामायण काल के दौरान, जब हनुमान जी ने शनिदेव को रावण के बंधन से मुक्त कराया था, तब शनिदेव के घावों पर हनुमान जी ने सरसों का तेल लगाया था जिससे उन्हें पीड़ा से मुक्ति मिली। तभी से शनिदेव पर तेल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।
एक बार भक्ति में बाधा डालने पर हनुमान जी ने शनिदेव को अपनी पूंछ में लपेट लिया था, जिससे शनिदेव को अपनी भूल का आभास हुआ। साथ ही, हनुमान जी ने उन्हें रावण की कैद से भी मुक्त कराया था। इन कारणों से शनिदेव ने वचन दिया कि वे राम-भक्तों और हनुमान-भक्तों पर कभी अपनी कुदृष्टि नहीं डालेंगे और उन पर सदैव अपनी कृपा बनाए रखेंगे।
7. पीपल के वृक्ष में वास
शनिदेव ने पिप्पलाद ऋषि को वचन दिया था कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल के वृक्ष की पूजा करेगा और दीपक जलाएगा, उसे शनि की पीड़ा का सामना नहीं करना पड़ेगा।
8. अनुशासन के प्रेमी
शनिदेव उन लोगों पर सदैव प्रसन्न रहते हैं जो मेहनती, अनुशासित, ईमानदार होते हैं और वृद्धों व असहायों की मदद करते हैं। दिव्यांग, विधवा, कमजोर, सफाईकर्मियों और मज़दूरों का सम्मान करने वालों को शनि कभी दंडित नहीं करते।
9. श्री कृष्ण और शनिदेव:
श्री कृष्ण के बाल रूप के दर्शन हेतु शनिदेव मथुरा आए, किंतु अमंगल के भय से नंदबाबा ने उन्हें रोक दिया। शनिदेव की विनती पर श्री कृष्ण ने उन्हें नंदगांव के समीप वन में तपस्या करने को कहा। शनिदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर प्रभु ने उन्हें कोयल (कोकिल) के रूप में दर्शन दिए। आज भी वह स्थान 'कोकिलावन' के नाम से प्रसिद्ध है।
10. शनिदेव और गणेशजी:
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार जब माता पार्वती ने गणेशजी को जन्म दिया, तो सभी देवता उन्हें आशीर्वाद देने आए। शनिदेव भी वहां पहुंचे, लेकिन वे अपना सिर झुकाए खड़े थे। माता पार्वती के पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी पत्नी से श्राप मिला है कि वे जिस पर भी दृष्टि डालेंगे, उसका अहित हो जाएगा।
माता पार्वती के अत्यधिक आग्रह पर जैसे ही शनिदेव ने बालक गणेश पर दृष्टि डाली, शनि की तीव्र दृष्टि के प्रभाव से गणेशजी का मस्तक उनके धड़ से अलग होकर आकाश में विलीन हो गया।
माता पार्वती को विलाप करते देख भगवान विष्णु तुरंत उत्तर दिशा की ओर गए और वहां सबसे पहले मिले एक हाथी (गज) का मस्तक लाकर गणेशजी के धड़ से जोड़ दिया। इस प्रकार गणेशजी 'गजानन' कहलाए।
विशेष: शनि जयंती के दिन "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का जाप करना और हनुमान चालीसा का पाठ करना सबसे उत्तम माना जाता है। धातुओं में लोहा और रत्नों में नीलम शनिदेव को अत्यंत प्रिय हैं। शनि जयंती या शनिवार के दिन लोहा दान करना या काले तिल का दान करना दोषों से मुक्ति दिलाता है। शनि ग्रह को सौरमंडल का सबसे धीमा ग्रह माना जाता है। वे एक राशि को पार करने में लगभग ढाई वर्ष ($2.5$ वर्ष) का समय लेते हैं। इसीलिए उनकी महादशा और 'साढ़ेसाती' का प्रभाव लंबे समय तक रहता है।